Nation- Saharanpur Ramleela: हथिनी ‘चंचल’ के बिना अधूरी सहारनपुर की रामलीला, भगवान राम-सीता और रावण की यही सवारी- #NA

Saharanpur Ramleela: हथिनी 'चंचल' के बिना अधूरी सहारनपुर की रामलीला, भगवान राम-सीता और रावण की यही सवारी

हथिनी पर सवार भगवान राम, सीता और लक्ष्मण

उत्तर भारत की प्राचीन रामलीलाओं में सहारनपुर की रामलीला का अलग ही स्थान है. हर साल विजयदशमी के अवसर पर यहां भव्य शोभायात्रा निकलती है, जिसमें भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण नगर भ्रमण करते हैं. लेकिन इस शोभायात्रा की असली पहचान और सबसे बड़ा आकर्षण हथिनी चंचल है. भगवान श्रीराम और माता सीता की सवारी के रूप में चंचल जब सज-धज होकर निकलती है, तो हजारों की भीड़ एक साथ उसकी ओर आकर्षित हो जाती है. यही कारण है कि लोग कहते हैं कि सहारनपुर की रामलीला, चंचल हथिनी के बिना अधूरी है.

चंचल के महावत नदीम पुत्र निशार अमरोहा जिले के ढका गांव के रहने वाले हैं. उनका परिवार कई पीढ़ियों से हाथी पालने का काम करता आया है. नदीम बताया कि उनके पूर्वजों के पास भी हाथी हुआ करते थे और धार्मिक आयोजनों से लेकर शादियों तक में वे शामिल होते थे. यह परंपरा आज भी जीवित है. नदीम ने बताया कि उनके पास पहले लक्की नाम की हथिनी थी. उसके जाने के बाद चंचल हमारे परिवार का हिस्सा बनी. अब चंचल ही हमारे घर की जान है और सहारनपुर रामलीला की शान भी.

एक दिन में कितना होता खर्च?

करीब 45 साल की उम्र की चंचल अब भी उतनी ही फुर्तीली और आकर्षक है जितनी किसी युवा हथिनी को होना चाहिए. उसकी देखभाल में काफी मेहनत और खर्च होता है. रोजाना उसके खाने में चारी, बाजरा, गन्ना, धान और गेहूं शामिल होता है. नदीम के अनुसार, हर दिन चंचल के भोजन पर लगभग एक हजार रुपए का खर्च आता है. नदीम और उनके तीन साथी मिलकर चंचल की देखभाल करते हैं. शोभायात्राओं और कार्यक्रमों में शामिल होकर उन्हें रोजाना दो से तीन हजार रुपए तक की मजदूरी मिल जाती है. वहीं नदीम ने कहा कि कमाई से ज्यादा चंचल के साथ हमारा रिश्ता भावनात्मक है. हम इसे अपने बच्चों की तरह मानते हैं.

रामलीला की शान

सहारनपुर की प्राचीन रामलीला में चंचल हथिनी का स्थान बेहद खास है. जब शोभायात्रा निकलती है और भगवान श्रीराम-सीता उसकी पीठ पर विराजमान होते हैं, तो पूरा दृश्य अद्भुत हो उठता है. सड़कों पर भीड़ उमड़ पड़ती है और लोग घंटों तक सिर्फ एक झलक पाने को खड़े रहते हैं. लोगों का कहना है कि अगर शोभायात्रा में चंचल न हो तो मानो कुछ अधूरा रह जाता है.

क्या बोले महावत?

चंचल की खासियत उसका स्वभाव है. नदीम बताते हैं कि वह कभी गुस्सा नहीं करती, न ही आक्रामक होती है. भीड़भाड़ वाले माहौल में भी वह पूरी तरह शांत रहती है. जुलूस में लोग उसके साथ फोटो खिंचवाते हैं, बच्चे उसे फल और गुड़ खिलाते हैं, और चंचल सबके साथ सहजता से पेश आती है. अगर हम कुछ देर के लिए उसकी आंखों से ओझल हो जाएं तो बेचैन हो जाती है. यह हमारे परिवार का हिस्सा है, बिल्कुल एक बच्चे की तरह.

Saharanpur Ramleela: हथिनी ‘चंचल’ के बिना अधूरी सहारनपुर की रामलीला, भगवान राम-सीता और रावण की यही सवारी

[ad_2]


देश दुनियां की खबरें पाने के लिए ग्रुप से जुड़ें,

[ad_1]

#INA #INA_NEWS #INANEWSAGENCY
Copyright Disclaimer :-Under Section 107 of the Copyright Act 1976, allowance is made for “fair use” for purposes such as criticism, comment, news reporting, teaching, scholarship, and research. Fair use is a use permitted by copyright statute that might otherwise be infringing., educational or personal use tips the balance in favor of fair use.
Credit By :-This post was first published on https://www.tv9hindi.com/, we have published it via RSS feed courtesy of Source link,

Back to top button