Nation- वो कश्मीरी पंडित जिन्हें अलगाववादियों ने गले लगाया और पाकिस्तान ने भी अपने दर पर बुलाया- #NA

वो कश्मीरी पंडित जिन्हें अलगाववादियों ने गले लगाया और पाकिस्तान ने भी अपने दर पर बुलाया

कश्मीर पंडित भूषण बजाज का मुसलमान भी देते थे बराबर का सम्मान

आज जिस तरह का माहौल है, उसमें यह सोचना भी मुश्किल है कि कोई ऐसा कश्मीरी पंडित होगा, जिसे हिंदू और मुसलमान दोनों बराबर सम्मान देते हों. सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि भारत और पाकिस्तान में वह समान रूप से लोकप्रिय हों. सोमवार 12 जनवरी को जब पंडित भूषण बजाज के निधन की सूचना आई तो सभी के मुंह से एक ही वाक्य निकला, कश्मीरियत का सच्चा पुजारी चला गया. उन्होंने जीवन भर कश्मीर में हिंदू-मुस्लिम एकता की बात की और जम्मू कश्मीर डेमोक्रेटिक फ़्रंट (JKDF) बनाया.

वे यह कतई नहीं मानते थे कि कश्मीरी हिंदू और कश्मीरी मुस्लिम कोई अलग-अलग हैं. यही कारण है कि दोनों तरफ के कश्मीरी उनके नहीं रहने की सूचना से सन्न हैं. वे कश्मीर की साझा संस्कृति को बचाये रखना चाहते थे. भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद को शांत करने के वे सबसे बड़े पैरोकार थे.

मीरवाइज उमर फारूख की संवेदना

उनके निधन पर जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट (JKLF) के नेता मीर वाइज उमर फारूख ने X पर लिखा है, Deeply saddened by the passing of Pandit Bhushan Bazaz, son of legendary Pandit Prem Nath Bazaz. A dear friend of my father, Bhushan Uncle was a father-like presence in my life. A true upholder of Kashmiri ethics, his sincere love, warmth, and affection will always stay with me. His passing is a great personal loss to me and the family. My deepest Condolences to his son Kalhan and the Bazaz family. पंडित भूषण बजाज लंबे समय से बीमार चल रहे थे. सोमवार की रात 91 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हो गई.

कश्मीर कश्मीरियों का है!

उनके पिता प्रेमनाथ बजाज ने कश्मीर के इतिहास पर काफी काम किया था. कश्मीर और कश्मीरियत पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था, कश्मीर कश्मीरियों का है. उनका मानना था कि जम्मू कश्मीर के डोगरा राजाओं ने कश्मीर को कभी अपना घर नहीं माना. प्रेम नाथ बजाज ने ही सर्वप्रथम यह नारा बुलंद किया था कि कश्मीर कश्मीरियों का है. एक तरह से प्रेम नाथ बजाज कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच एक अलग संस्कृति और अलग सभ्यता वाला क्षेत्र मानते थे.

यह बात अलग है कि वे इस कश्मीर में हिंदुओं और मुसलमानों को बराबर का साझीदार मानते थे. लेकिन उनकी पूरी सियासत तभी तक थी जब तक कि कश्मीर की धर्मांधता उसे मुस्लिम स्टेट बनाने का ख्याल मन में न लाती. परंतु पाकिस्तान से जिस तरह आतंकवादी तत्त्व कश्मीर की सीमा से घुसते रहे वे क्या कश्मीर को आजाद रहने देते!

रामचंद्र काक की कुटिल दृष्टि

आजाद कश्मीर का विचार डोगरा महाराजाओं का नहीं था. यह विचार लाने वाले एक अन्य कश्मीरी पंडित रामचंद्र काक का था जो 1945 से 1947 तक जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के प्रधानमंत्री थे. उन्होंने ही राजा को सलाह दी थी कि जम्मू कश्मीर राज्य का विलय न भारत के साथ करिये न पाकिस्तान के साथ. इसको एक स्वतंत्र देश के तौर पर बनाये रखिए.

इस क्षेत्र की रणनीतिक और भू राजनैतिक स्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण है. भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन और रूस तक आपसे मिलने को लालायित रहेंगे. इसीलिए महाराजा न तो नेहरू की सुन रहे थे न पटेल की और न ही लॉर्ड माउंटबेटन की. काक के शेख अब्दुल्ला से संबंध बहुत खराब थे. 1946 में जब शेख की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस ने महाराजा के विरुद्ध कश्मीरी छोड़ो आंदोलन चलाया तो काक ने वहां मार्शल लॉ लगवा दिया और 20 मई 1946 को शेख को जेल में डाला था.

काक ने पंडित नेहरू को नहीं घुसने दिया

पंडित नेहरू स्वयं शेख अब्दुल्ला के वकील बन कर श्रीनगर कोर्ट जाने वाले थे, किंतु उनको रियासत के प्रधानमंत्री राम चंद्र काक ने रियासत में प्रवेश ही नहीं करने दिया. कांग्रेस के नेताओं के दबाव के बावजूद काक ने शेख अब्दुल्ला को रिहा नहीं किया. काक कांग्रेस के नेताओं में से सरदार पटेल को पसंद करते थे इसलिए वे इस मुद्दे पर पटेल से मिले. पटेल ने उनसे कहा कि शेख़ अब्दुल्ला को रिहा कर दो किंतु राम चंद्र काक ने इस मामले में उनकी भी अनसुनी कर दी.

पर शेख के समर्थन में जनता के आक्रोश को देखते हुए अंततः महाराजा हरि सिंह ने उन्हें सितंबर 1947 में जेल से आजादी दी. रामचंद्र काक के बारे में कहा जाता है कि वे जिन्ना के प्रति सॉफ़्ट थे. किंतु कश्मीर पाकिस्तान के साथ मिल नहीं सकता था और काक भारत के साथ विलय नहीं चाहते थे. इसीलिए काक कश्मीर की स्वायत्तता के पक्ष में थे.

काक और प्रेम नाथ के तरीकों में अंतर

बाद में महात्मा गांधी ने रियासत का दौरा किया तब काक ने अपने पद से इस्तीफा देने की बात कही थी. इस तरह रामचंद्र काक वह शख़्स से जो जम्मू कश्मीर विवाद के खलनायक बने. यदि वे शुरू में ही भारत के साथ विलय की बात महाराजा से करते तो संभवतः यह विवाद उस समय ही खत्म हो जाता और पूरा कश्मीर हमारा होता. उनके बाद कश्मीर की आजादी का विचार रखने वाले प्रेमनाथ बजाज थे.

प्रेम नाथ भी पूरा जीवन कश्मीर की आजादी की बात करते रहे. मगर काक महाराजा के अधीन जम्मू कश्मीर देश चाहते थे और बजाज एक लोकतांत्रिक कश्मीर, जिसमें जनता की भागीदारी हो और वही अपना शासक चुने. इसलिए आजाद कश्मीर के संदर्भ में मकसद भले एक हो किंतु दोनों की नीयत में बहुत भारी अंतर था. भूषण बजाज को अपने पिता से कश्मीरियत की समझ मिली थी.

अलगाववादियों के बीच हिंदू चेहरा

लेकिन भूषण बजाज द्वारा लगातार कश्मीर की आजादी की बात किये जाने से यह शक सदैव पैदा होता रहा कि भूषण बजाज और उनके पिता प्रेम नाथ बजाज कश्मीर में अलगाववादियों के बीच हिंदू चेहरे के रूप में ख्यात थे. जब भी कश्मीर घाटी में अलगाववादी तत्त्वों पर कार्रवाई होती तो भूषण बजाज फ़ौरन मानवाधिकार को लेकर उनके पक्ष में खड़े हो जाते.

यह भी दिलचस्प है कि रामचंद्र काक हों या प्रेम नाथ बजाज अथवा उनके भूषण बजाज रहे सदैव दिल्ली में. कश्मीर घाटी में रहना उन्होंने लिए अपने लिए सभीते का नहीं समझा. दिल्ली में सुरक्षा है और दिल्ली में रह कर वे कश्मीर के मामले में अपने विवादित बयान दे सकते थे इसलिए उन्होंने रहने के लिए दिल्ली को ही चुना. यद्यपि उन्हें नरमपंथी ही कहा जा सकता है किंतु उन्होंने सदैव कश्मीर को अलग समझा.

पाकिस्तान से भी आया बुलावा!

यह भी कहा जाता है कि परवेज़ मुशर्रफ़ के समय उनको पाकिस्तान उच्चायोग की तरफ से पाकिस्तान आने का न्योता मिला था. पर इसका कभी खुलासा नहीं हुआ. कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के संबंध सदैव तीखे बने रहे. जब भी कश्मीर की बात होती तब-तब वहां के हिंदू पंडितों का मसला भी उठता. कश्मीरी ब्राह्मण बहुत समय से कश्मीर से बाहर हैं पर उनकी पहचान कश्मीरी पंडितों की ही है.

कश्मीरी पंडितों का एक बड़ा समुदाय अब इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुका है. खुद फ़ारूख अब्दुल्ला ने कहा था कि उनके पुरखे कश्मीरी पंडित थे. तब क्या कश्मीरी पंडितों की पहचान अलगाववादियों के साथ रह कर स्पष्ट होगी या भारत की मुख्य धारा से जुड़ कर? यह प्रश्न सदैव खड़ा होगा. कश्मीर में यदि कश्मीरी पहचान सर्वोपरि है तो 1989-90 में वहां से कश्मीरी पंडितों के पलायन को रोका क्यों नहीं गया?

वो कश्मीरी पंडित जिन्हें अलगाववादियों ने गले लगाया और पाकिस्तान ने भी अपने दर पर बुलाया

[ad_2]


देश दुनियां की खबरें पाने के लिए ग्रुप से जुड़ें,

[ad_1]

#INA #INA_NEWS #INANEWSAGENCY
Copyright Disclaimer :-Under Section 107 of the Copyright Act 1976, allowance is made for “fair use” for purposes such as criticism, comment, news reporting, teaching, scholarship, and research. Fair use is a use permitted by copyright statute that might otherwise be infringing., educational or personal use tips the balance in favor of fair use.
Credit By :-This post was first published on https://www.tv9hindi.com/, we have published it via RSS feed courtesy of Source link,

Back to top button