Nation- अंकिता हत्याकांड की क्या है ‘VIP थ्योरी’, आखिर 3 साल बाद फिर क्यों सुलग रहा आक्रोश?- #NA

अंकिता हत्याकांड की क्या है 'VIP थ्योरी', आखिर 3 साल बाद फिर क्यों सुलग रहा आक्रोश?

अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर आक्रोश बढ़ गया है.

उत्तराखंड की शांत पहाड़ियों में 18 सितंबर 2022 की वह रात आज भी लोगों के जेहन में एक जख़्म की तरह दर्ज है, जब एक साधारण परिवार की बेटी अंकिता भंडारी की हत्या ने न सिर्फ एक परिवार को तोड़ दिया, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. छह दिन तक लापता रहने के बाद 24 सितंबर को जब उसका शव मिला, तो ये मामला सिर्फ एक अपराध तक सीमित नहीं रहा बल्कि इस दर्दनाक हत्या ने सत्ता से लेकर सिस्टम तक पर सवाल खड़े कर दिए.

अंकिता हत्याकांड में 3 साल 4 महीने की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद मई 2025 में अदालत ने फैसला सुनाया. बीजेपी नेता के बेटे पुलकित आर्य, उसके सहयोगी अंकित गुप्ता और सौरभ भास्कर को उम्रकैद की सजा मिली. फैसले के साथ यह माना गया कि कानून ने अपना काम कर दिया, दोषियों को सजा मिल गई और अंकिता को इंसाफ मिल चुका है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि उम्रकैद के करीब आठ महीने बाद, उत्तराखंड की सड़कों पर फिर से वही नारे गूंजने लगे, ‘अंकिता को इंसाफ दो’.

ये वो प्वाइंट था, जहां कहानी एक बार फिर से शुरू होती है. सवाल उठता है कि अगर इंसाफ मिल चुका था, तो फिर जनता क्यों सड़कों पर उतर आई? क्या अदालत का फैसला लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाया? या फिर कहीं न कहीं ऐसा महसूस किया जा रहा है कि सच का कोई हिस्सा अब भी परदे के पीछे छिपा हुआ है?

इंसाफ मिला, लेकिन भरोसा क्यों नहीं?

अदालत के फैसले के बाद आमतौर पर ऐसे मामलों में सामाजिक उबाल धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है. लेकिन अंकिता भंडारी का मामला अपवाद बन गया है. वजह यह नहीं थी कि दोषियों को सजा नहीं मिली, बल्कि यह भावना गहराती चली गई कि शायद पूरी सच्चाई अभी भी कहीं छुपी हुई है. लोगों के मन में यह सवाल लगातार बना रहा कि क्या इस हत्या के पीछे केवल वही तीन लोग थे, जिन्हें सजा मिली या फिर कोई और भी था, जिसे बचा लिया गया? क्या ताकतवर लोगों ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कानून की दिशा मोड़ दी? यही अविश्वास धीरे-धीरे आंदोलन में बदलता चला गया.

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29 दिसंबर का वीडियो और एक नया तूफान

इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया, जब 29 दिसंबर को उर्मिला सनावर नाम की एक महिला ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया. इस वीडियो में उसने दावा किया कि अंकिता की हत्या की असली वजह कुछ और थी. उसके अनुसार, अंकिता ने एक वीवीआईपी को रिज़ॉर्ट में ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ देने से इनकार कर दिया था और यही इनकार उसकी मौत का कारण बना.

वीडियो सामने आते ही यह मामला फिर से सुर्खियों में आ गया. लोगों ने महसूस किया कि जिस बात को पहले सिर्फ अफवाह माना जा रहा था, वह अब एक ठोस आरोप के रूप में सामने आ रहा है. इसके कुछ समय बाद उर्मिला ने एक ऑडियो भी जारी किया, जिसमें कथित तौर पर एक राजनीतिक व्यक्ति की आवाज थी. इस ऑडियो में हत्या के पीछे के कारण और कथित वीवीआईपी की भूमिका का जिक्र किया गया.

अदालत की रोक और नाम न लेने की मजबूरी

ऑडियो-वीडियो सामने आते ही विवाद और तेज हो गया. जिस वीवीआईपी नेता का नाम इन रिकॉर्डिंग्स में लिया गया था, उसने तुरंत दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया. अदालत ने 7 जनवरी को आदेश दिया कि इस मामले में उस नेता का नाम सार्वजनिक रूप से नहीं लिया जाएगा. इस आदेश के बाद मीडिया और आम लोगों के सामने एक अजीब स्थिति पैदा हो गई. लोग आरोप सुन सकते थे, कहानी जान सकते थे, लेकिन नाम नहीं ले सकते थे. यही चुप्पी और रहस्य आंदोलन को और हवा देने लगा. लोगों को लगा कि अगर सब कुछ साफ है, तो नाम छिपाने की जरूरत क्यों पड़ी?

उर्मिला सनावर ने किए कई बड़े दावे

उर्मिला सनावर खुद को एक अभिनेत्री बताती हैं और यह दावा भी करती हैं कि वह हरिद्वार से बीजेपी के एक पूर्व विधायक की दूसरी पत्नी हैं. उसने जो ऑडियो जारी किया, उसमें उसकी अपनी आवाज के अलावा दूसरी आवाज उसी नेता की बताई जा रही है. इस बातचीत में हत्या के पीछे के कारणों और कथित वीआईपी की भूमिका की बात कही गई है.

इन दावों के सामने आते ही उत्तराखंड में माहौल बदल गया. लोग सड़कों पर उतर आए, धरना-प्रदर्शन शुरू हो गए और मांग उठने लगी कि इस पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जाए. यह सिर्फ विपक्ष या आम जनता की मांग नहीं थी, खुद सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर से भी आवाजें उठने लगीं.

Uttarakhand Cm Meets Parents Of Anikta Bhandari

पिता की पीड़ा और फिर से जांच की मांग

अंकिता के पिता, जिन्होंने अपनी बेटी को खोया और वर्षों तक इंसाफ के लिए संघर्ष किया, उन्होंने भी मुख्यमंत्री से फिर से जांच की मांग की है. उनका कहना है कि अगर नए सबूत सामने आए हैं, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उनके लिए यह सिर्फ न्याय का सवाल नहीं था, बल्कि उस भरोसे का भी था, जो उन्होंने सिस्टम पर किया था.

पहले भी जांच हुई थी, फिर क्यों उठ रहे सवाल?

इस मामले की जांच के लिए पहले ही एक विशेष जांच दल यानी SIT बनाई गई थी. उस टीम के एक सदस्य और हरिद्वार ग्रामीण एसपी रहे शेखर सुयैल ने हाल ही में कहा कि जांच के दौरान वीआईपी एंगल को भी खंगाला गया था, लेकिन उस समय कोई ठोस सबूत नहीं मिला था.

यही बयान अब बहस का केंद्र बन गया है. सवाल यह उठा कि अगर तब कोई सबूत नहीं मिला, तो क्या इसका मतलब यह है कि कोई सबूत था ही नहीं, या फिर जांच अधूरी रह गई? लोगों का भरोसा यहीं डगमगाने लगा.

सरकार की मजबूरी और नई SIT का गठन

ऑडियो-वीडियो के सामने आने और बढ़ते जनदबाव के बाद उत्तराखंड सरकार को एक बार फिर एसआईटी गठित करनी पड़ी. इस नई एसआईटी ने उर्मिला सनावर से लंबी पूछताछ की. जांच का फोकस सिर्फ ऑडियो-वीडियो की प्रामाणिकता पर नहीं था, बल्कि इस सवाल पर भी था कि इतने साल बाद यह खुलासा क्यों किया गया. पहले कहा गया कि उर्मिला गायब हो गई हैं, लेकिन बाद में वह खुद एसआईटी के सामने पेश हुईं. इस पूरे घटनाक्रम ने संदेह और उत्सुकता दोनों को और बढ़ा दिया है.

मैंने सच देर से नहीं, सही वक्त पर बोला- उर्मिला

5 जनवरी 2026 को उर्मिला ने सोशल मीडिया पर एक और पोस्ट किया. उसने कहा कि जो नया खुलासा हुआ, वह एक नवंबर 2025 को हुआ था और उसी दिन ऑडियो रिकॉर्ड किया गया था. उसने यह आशंका भी जताई कि कहीं उसका मोबाइल गायब न कर दिया जाए. इस बयान ने एक और परत जोड़ दी. लोग पूछने लगे कि अगर यह सच है, तो क्या जांच एजेंसियां इस सबूत को सुरक्षित रखेंगी? या फिर यह भी किसी फाइल में दब कर रह जाएगा?

मुख्यमंत्री की सफाई, दोषियों को बचाया नहीं जाएगा

इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ी. उन्होंने कहा कि जिस वीवीआईपी नेता का नाम लिया जा रहा है, वह 10 से 20 सितंबर के बीच उत्तराखंड में मौजूद ही नहीं थे. उन्होंने बार-बार उस व्यक्ति को ‘प्रभारी’ कहकर संबोधित किया और साफ किया कि सरकार किसी भी दोषी को नहीं बचाएगी. उत्तराखंड पुलिस ने भी मीडिया के सामने आकर यही दोहराया कि कानून अपना काम करेगा और किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा. लेकिन जनता के मन में बैठा संदेह इतनी आसानी से दूर नहीं हुआ.

आंदोलन की आग और उत्तराखंड बंद का ऐलान

सरकार और पुलिस की सफाई के बावजूद आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है. प्रदर्शनकारियों ने 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का ऐलान किया है. इस बंद को अंकिता के पिता का समर्थन भी मिला है. यह समर्थन सिर्फ एक पिता का नहीं था, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक था, जो अब भी पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है. सड़कों पर उतरते लोग यह कह रहे हैं कि वे किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि अधूरे सच के खिलाफ खड़े हैं. उनके लिए यह आंदोलन सिर्फ अंकिता का नहीं, बल्कि उस हर बेटी का है जो सिस्टम से इंसाफ की उम्मीद करती है.

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