Nation- बालासाहेब की विरासत के वास्ते एक होंगे ‘ठाकरे’, मातोश्री में महाभारत की क्या है कहानी?- #NA

उद्धव & राज ठाकरे
सफेद कुर्ता… कंधे पर ब्राउन अचकन… माथे पर लाल टीका… और काले फ्रेम वाला चश्मा… बाल पूरी तरह से पीछे की ओर कढ़े हुए और एक उंगली सामने की ओर आक्रामक अंदाज बयां करती हुई. जब हाथ में ब्रश पकड़ते तो कार्टून के जरिए बड़ी से बड़ी बातों पर बखूबी तंज कसते. भले ही ये सारी बातें शिवसेना के संस्थापक और हिंदुत्व आइकन बालासाहेब केशव ठाकरे से मिलती हों लेकिन ऐसा ही हूबहू अंदाज एक और शख्स का है जिसका नाम है ‘स्वराज’ यानी ‘राज ठाकरे’.
बालासाहेब ठाकरे जैसे तेवर और उनके व्यक्तित्व की तरह ही राज ठाकरे के गरम मिजाज को देखते हुए हर कोई यही मान बैठा था कि बालासाहेब के सियासी वारिस राज ठाकरे ही होंगे, लेकिन इसी बीच एक ऐसी घटना घटी जिसने राज ठाकरे के सियासी सफर में ऐसा ब्रेक लगाया जो उनकी जिंदगी का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. हालात ऐसे बने की राज ठाकरे ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और पार्टी की तरह मुड़कर भी नहीं देखा. आज भले ही एक बार फिर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के एक होने की चर्चा उठ रही हो लेकिन एक वक्त था जब बालासाहेब ठाकरे के बाद दूसरे नंबर पर कहे जाने वाले राज ठाकरे को पार्टी से बेआबरू होकर निकलना पड़ा था.
उम्र के साथ ‘स्वराज’ को मिली नई पहचान ‘राज’
राज ठाकरे
राज ठाकरे के पिता श्रीकांत ठाकरे को संगीत से विशेष लगाव था. उन्होंने अपने संगीत प्रेम की वजह से ही अपने बेटे का नाम ‘स्वराज’ रखा था. स्वराज यानी ‘सुरों का बादशाह’. राज ठाकरे के पिता ने बचपन में अपने बेटे को तबला, गिटार और वायलिन की शिक्षा दी थी. राज ठाकरे बचपन से ही अपने चाचा बालासाहेब से काफी नजदीक थे. चाचा जब भी घर पर होते तब राज ठाकरे उनकी गोद में ही दिखाई पड़ते. इसी दौरान साल 1969 में कर्नाटक बॉर्डर पर हुए विवाद की आंच मुंबई तक आ पहुंची और देखते ही देखते मुंबई में भी दंगे भड़क गए. इन दंगों में बालासाहेब का नाम आया और उन्हें, उनके सहयोगी मनोहर जोशी और दत्ताजी साल्वी के साथ तीन महीने के लिए जेल जाना पड़ा. बालासाहेब के जेल जाने के बाद उनके भाई श्रीकांत उनसे मिलने जेल गए. उस वक्त राज ठाकरे भी उनके साथ थे. चाचा बालासाहेब को लगा था कि राज उन्हें देखकर उनके पास आ जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस पर बालासाहेब ने कहा, मुझे उसका (राज) दूर जाना अच्छा नहीं लगा लेकिन मुझे यकीन है वह मेरा प्यार फिर से हासिल करेगा.
उद्धव थे शांत स्वभाव तो राज थे गर्म मिजाज
राज और उद्धव
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे साथ ही बड़े हुए. दोनों एक साथ दादर के बाल मोहन विद्या मंदिर में पढ़ाई करते थे. पढ़ाई में हमेशा से ही उद्धव से पीछे रहने वाले राज ने कम उम्र में ही चाचा बालासाहेब के तौर तरीकों को सीखना शुरू कर दिया था. जबकि उद्धव को अपने ताऊ श्रीकांत के साथ वक्त बिताना अच्छा लगता था. वक्त का पहिया इसी तरह से आगे बढ़ता गया और ठाकरे परिवार के दोनों बच्चे अब सियासी गलियारे में कदम रखने को तैयार थे. साल 1988 में बालासाहेब के भतीजे राज ठाकरे ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर लिया था. उस वक्त बालासाहेब के बेटे उद्धव भले ही पार्टी की सभी जनसभाओं में जाते थे लेकिन वहां मौजूद भीड़ और अपने पिता और भाई की तस्वीर खींचने में मशगूल रहते थे. चार साल के अंदर ही उद्धव, शिवसेना में सक्रिय भूमिका में आ गए थे. उद्धव और राज ठाकरे के कामकाज के तरीकों में फर्क साफ दिखाई पड़ता था. उद्धव जहां काफी शांत स्वभाव के थे वहीं राज अपने चाचा की तरह ही गर्म मिजाज थे. राज को उस वक्त शिवसेना की छात्र इकाई भारतीय विद्यार्थी सेना और शिव उद्योग सेना का प्रमुख बनाया गया था. इनका काम मराठी युवाओं को रोजगार दिलाना था. ये वही वक्त था जब दुनिया में पॉप स्टार माइकल जैक्सन की दीवानगी बढ़ती जा रही थी. मराठी युवाओं में माइकल जैक्सन का क्रेज देखते हुए राज ठाकरे ने उन्हें भारत आने का निमंत्रण दिया और साल 1996 में पॉप स्टार माइल जैक्सन ने मुंबई में अपना शो किया था.
भीड़ देख ‘किंग ऑफ पॉप’ ने दिया 4 करोड़ का फंड
1 नवंबर 1996 को मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भारी भीड़ हाथों में गुलदस्ता लिए खड़ी थी. हर कोई एक नजर किंग ऑफ पॉप यानी माइकल जैक्सन का दीदार करना चाहता था. ऐसा पहली बार था जब माइकल भारत में कोई शो करने के लिए आए थे. उन्हें रिसीव करने राज ठाकरे खुद वहां पहुंचे थे. राज ठाकरे के साथ एयरपोर्ट पहुंची सोनाली बेंद्रे ने माइकल का गुलदस्ता देकर स्वागत किया और उनका काफिला सीधे बालासाहेब के घर ‘मातोश्री’ में जाकर रुका. माइकल से मुलाकात के दौरान बालासाहेब ने उन्हें चांदी का तबला और तानपूरा भेंट किया था. बताया जाता है कि माइकल का शो अंधेरी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में था. वहां पर 16 हजार लोगों की कैपेसिटी थी लेकिन शो देखने के लिए 70 हजार लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी. इस कॉन्सर्ट का उद्देश्य 27 हजार युवाओं को रोजगार दिलाना था. इस शो के बाद माइकल जैक्सन ने राज को 4 करोड़ रुपए का फंड दिया था. इस कॉन्सर्ट के बाद हर किसी को लग रहा था कि बालासाहेब ठाकरे अपनी विरासत आगे राज ठाकरे को ही सौंपेंगे लेकिन बालासाहेब के मन में कुछ और ही चल रहा था.
रमेश किनी हत्याकांड बना टर्निंग प्वाइंट
बालासाहेब और राज ठाकरे
शिवसेना में राज ठाकरे का कद धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था. साल 2000 के आते-आते शिवसेना में बालासाहेब के बाद उनके भतीजे राज ठाकरे दूसरे नंबर के नेता हो गए थे. हर किसी को इस बात का अंदाजा था कि राज ठाकरे ही शिवसेना को अब आगे ले जाएंगे. लेकिन किसी को ये नहीं मालूम था कि रमेश किनी हत्याकांड राज ठाकरे के लिए उनके सियासी करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित होगा. बता दें कि पुणे के अलका टॉकीज में एक शव मिला था. ये शव मुंबई के माटुंगा निवासी रमेश किनी का था. दूसरे दिन विपक्ष के नेता छगन भुजबल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई जिसमें उनके साथ की कुर्सी पर रमेश किनी की पत्नी शीला मौजूद थीं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में शीला ने पति की हत्या के लिए राज ठाकरे को जिम्मेदार बताया. उन्होंने कहा कि राज ठाकरे के इशारे पर मेरे पति का अपहरण और हत्या हुई है. जिस समय ये घटना घटी उस वक्त महराष्ट्र में शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री थे जबकि भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे उप मुख्यमंत्री थे. रमेश किनी हत्याकांड ने महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल तेज कर दी थी.
BMC चुनाव में उद्धव को बड़ी जिम्मेदारी मिलना बड़ा इशारा था
साल 2002 में पिता के कहने पर उद्धव ठाकरे शिवसेना में पूरी तरह से सक्रिय हो गए थे. वह पार्टी के सभी कार्यक्रम और सभाओं में शामिल होते थे. उद्धव ठाकरे अपने पिता के इशारे को समझ चुके थे. जैसा सोचा जा रहा था हुआ भी कुछ वैसा ही. बालासाहेब ने सुनियोजित तरीके से मुंबई महानगर पालिका के चुनाव की जिम्मेदारी उद्धव को सौंप दी. इस बात से राज ठाकरे बेहद नाराज हुए लेकिन कुछ कह नहीं सके. इस चुनाव में शिवसेना-बीजेपी को 227 में से 133 सीटें मिलीं थीं. जबकि कांग्रेस के खाते में 60 और NCP को 12 वहीं सपा को महज 10 ही सीटें हासिल हुईं थी. इस चुनाव के साथ ही राजनीति में उद्धव की पकड़ मजबूत हो गई. इस जीत के साथ ही ये तय हो गया था कि उद्धव ठाकरे ही शिवसेना के प्रमुख होंगे.
महाबलेश्वर अधिवेशन में शिवसेना का तय हुआ भविष्य
30 जनवरी 2003 को महाराष्ट्र के महाबलेश्वर में शिवसेना का अधिवेशन हुआ. शिवसेना नेताओं से भरे हॉल में उस वक्त हर कोई हैरान रह गया जब राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव दिया. राज ठाकरे ने उस दिन ऐसा क्यों किया ये आज तक कोई समझ नहीं सका है. इसी अधिवेशन में सर्वसम्मति से बालासाहेब ने बेटे उद्धव ठाकरे को शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. उद्धव के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद से ही राज ठाकरे और उनके चाचा के बीच दरार बढ़ने लगी जो बाद में पार्टी के कई कार्यक्रमों में दिखाई भी दी.
बालासाहेब भांप गए थे भतीजे के बदलते तेवर
राज ठाकरे
राज ठाकरे के बदलते हुए तेवर हर किसी को दिखने लगे थे. बाला साहेब भी समझ गए थे कि राज ठाकरे उनके फैसलों से खुश नहीं हैं और बगावती तेवर दिखाने लगे हैं. इसी बीच 10 दिसंबर 2005 को शिवसेना के मुख्य पत्र ‘सामना’ में बाला साहेब ठाकरे का एक कॉलम प्रकाशित हुआ. जिसमें शिवसेना कार्यकर्ताओं से कहा गया था कि क्या शिवसेना दो हिस्सों में बंट जाएगी? पार्टी का बंटवारा किस तरह का होगा. उन्होंने कहा पार्टी के भविष्य के बारे में आप सभी चिंता करना छोड़कर महाराष्ट्र के बारे में सोचें. हम अपने किले की रक्षा करना जानते हैं, क्योंकि शिवसेना अजेय और अविनाशी है.
मेरा झगड़ा मेरे विट्ठल के साथ नहीं है, बल्कि उसके आसपास मौजूद पुजारियों से है: राज
राज ठाकरे
दो गुट में बंटती शिवसेना में उद्धव ठाकरे का कद लगातार बढ़ रहा था. पार्टी के हर फैसले में उद्धव की धमक साफ देखी जा सकती थी. साल 2005 में जब पार्टी में हलचल तेज हो गई थी, तब उद्धव ठाकरे ने बालासाहेब ठाकरे को पत्र लिखकर ये कह दिया कि चापलूसों की चौकड़ी आपको गुमराह कर रही है. यही नहीं कोंकण लोकसभा सीट हारने का जिम्मेदार भी इसी चौकड़ी को ठहराया. हर किसी को पता था कि उद्धव किसकी ओर इशारा कर रहे हैं. उद्धव और राज के बीच टशन बढ़ती ही जा रही थी. बालासाहेब का झुकाव जिस तरह से उद्धव की ओर था उसे देखने के बाद राज ये बात तो समझ गए थे कि बिना बालासाहेब के समर्थन के वो कभी भी शिवसेना के निशान और पार्टी पर कब्जा नहीं कर पाएंगे. ऐसे में दिसंबर साल 2005 में उन्होंने शिवसेना छोड़ने का फैसला कर लिया. पार्टी छोड़ने से पहले उन्होंने कहा, मेरा झगड़ा मेरे विट्ठल के साथ नहीं है, बल्कि उसके आसपास मौजूद पुजारियों से है. कुछ लोग राजनीति की एबीसी भी नहीं जानते हैं, वो पार्टी की कमान छीनने को आतुर हैं. इसलिए मैं शिवसेना के पद से इस्तीफा दे रहा हूं. बालासाहेब ठाकरे मेरे भगवान थे, हैं और हमेशा रहेंगे.
फिर हुई ‘मराठी मानुस की पार्टी’ की शुरुआत
राज ठाकरे
शिवाजी पार्क मैदान में 9 मार्च 2006 की शाम खचाखच भीड़ थी. हर ओर एक नए रंग का झंडा दिखाई पड़ रहा था. जिसमें चार रंग थे. भगवा रंग हिंदुत्व का प्रतीक था जबकि हरा रंग मुसलमानों के लिए और नीला रंग दलितों का प्रतीक था. झंडे के बीच में सफेद रंग की दो पट्टी थी जो शांति के प्रतिक के रूप में लगाई गई थी. शिवाजी पार्क को चुनने के पीछे भी वजह थी. दरअसल 1966 में दादा प्रबोधकर ने इसी मैदान में शिवसेना की कमान बालासाहेब ठाकरे को सौंपी थी. पार्टी के गठन के साथ ही राज ठाकरे ने ऐलान कर दिया कि यही पार्टी महाराष्ट्र में राज करेगी. राज ठाकरे ने महाराष्ट्र की जनता से विकास के वादे किए. उन्होंने कहा कि अब वे महाराष्ट्र के विकास के लिए नए तरीके से काम करेंगे. राज ने मनसे को ‘मराठी मानुस पार्टी’ बताया.
बालासाहेब की विरासत के वास्ते एक होंगे ‘ठाकरे’, मातोश्री में महाभारत की क्या है कहानी?
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