Political – Bihar Election 2025: जब तक बने रहेंगे नीतीश कुमार और लालू यादव…बिहार में क्या कर सकेंगे प्रशांत किशोर जैसे नेता?- #INA

Bihar Election 2025: जब तक बने रहेंगे नीतीश कुमार और लालू यादव...बिहार में क्या कर सकेंगे प्रशांत किशोर जैसे नेता?

बिहार का चुनावी युद्ध

बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी नई उम्मीद की तरह उभरी है. ताजा सर्वे की सुर्खियों में पार्टी एनडीए और महागठबंधन को टक्कर देती दिखाई दे रही है. लेकिन सत्ता में भी आ सकेगी, इसका आकलन फिलहाल कोई नहीं कर पा रहा. खुद प्रशांत किशोर भी संशय में हैं. पहले तो उन्होंने खुद चुनाव लड़ने की हामी भरी लेकिन फिर कदम पीछे खींच लिया. अब पूरी तरह से संरक्षक और सलाहकार की भूमिका निभाना चाहते हैं. उनका सपना बिहार में विकास को पटरी पर लाना और यहां के युवाओं को रोजगार देना है ताकि पलायन रुक सके. अपनी भाषण शैली और हाजिरजवाबी से बड़े पैमाने पर मीडिया से लेकर आम जन तक को उन्होंने प्रभावित किया है.

प्रशांत किशोर बिहार की जनता को जागृत करने के अभियान में तीन साल से जुटे हैं. उन्होंने उस वर्ग को सब्जबाग दिखाकर अपनी ओर ध्यान खींचने सफलता भी पाई है जो ना तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदा राजनीति को पसंद करता है और ना ही लालू प्रसाद यादव की आरजेडी के कल के शासनकाल को. वैसे यह सच है कि बिहार में एक बड़ा तबका ऐसा है. यही वजह है कि प्रशांत किशोर एक फिल्मी नायक की तरह चुनावी पटल पर नजर आते हैं. उन्होंने इस तबके के दिलों दिमाग पर नशा सा असर किया है.

कई सर्वे में प्रशांत किशोर दूसरे नंबर पर

हाल के कई सर्वे में उन्हें और उनकी पार्टी को इसका फायदा मिलता दिख रहा है. बिहार में भावी मुख्यमंत्री के योग्य चेहरे के तौर प्रशांत किशोर प्रदेश के मुखिया नीतीश कुमार से ऊपर हैं. सी-वोटर का सबसे ताजा सर्वे बताता है कि पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को सबसे ज्यादा 36.2 फीसदी लोग मुख्यमंत्री के रूप में देखना पसंद करेंगे तो मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सिर्फ 15.9 फीसदी लोग ही बतौर मुख्यमंत्री बने रहने देना चाहते हैं. जबकि प्रशांत किशोर को 23.2 फीसदी लोग मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं.

जाहिर है यह आंकड़ा पीके के पक्ष में है. लेकिन यह आंकड़ा केवल उनके अपने चेहरे को लेकर है, पार्टी को लेकर नहीं. एनडीए और महागठबंधन को जन सुराज चुनौती देकर सुर्खियां तो बटोर रही हैं, यहां तक कि एक पार्टी के इंटरनल सर्वे के मुताबिक अभी तक जन सुराज को करीब 10 फीसदी तक वोट मिल सकते हैं लेकिन यह आंकड़ा सत्ता में आने के लिए नाकाफी प्रतीत होते हैं.

जन सुराज से किसे नफा और नुकसान?

अब अहम सवाल ये है कि अगर प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज सत्ता में नहीं आ पाती तो किसे नफा और नुकसान कराएगी. गौर करें तो पीके बिहार में सभी दलों पर सीधा हमला कर रहे हैं. उनके निशाने पर बीजेपी के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी हैं तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी और लालू यादव और तेजस्वी यादव भी. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब-जब बिहार आए और नई ट्रेन आदि की सौगात दे गए तो प्रशांत किशोर ने निशाना साधा. उन्होंने तंज कसा कि बिहार में ही ऐसी व्यवस्था ऐसी क्यों नहीं होनी चाहिए कि यहां की जनता को इन ट्रेनों से सूरत या अहमदाबाद न जाना पड़े.

प्रशांत पर कोई पलटवार करने से क्यों बचता है

लेकिन प्रशांत किशोर पर केवल उन्हीं नेताओं ने पलटवार किया है, जिन पर उन्होंने आरोप लगाए हैं. वो बीजेपी के खिलाफ बोलते तो हैं लेकिन बीजेपी की तरफ कोई बड़ा चेहरा उनके खिलाफ किसी तरह की बयानबाजी करते नहीं देखे जा रहे हैं. इसी तरह प्रशांत किशोर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की वर्तमान सत्ता और नीति पर जोरदार हमले करते हैं लेकिन नीतीश कुमार ने आज तक पीके को लेकर कुछ भी नहीं कहा. यही हाल कांग्रेस का भी है. पीके ने ना तो कांग्रेस पर हमला किया और ना ही कांग्रेस की तरफ से कोई पलटवार हुआ. यहां तक कि प्रशांत लालू और तेजस्वी पर भी लगातार हमलावर हैं लेकिन पीके पर तेजस्वी की ओर कोई पलटवार नहीं.

फिलहाल ये समझ पाना मुश्किल है कि बिहार में पक्ष और विपक्ष के नेता प्रशांत किशोर पर पलटवार क्यों नहीं कर रहे हैं. क्या प्रशांत और जनसुराज को अपने मुकाबले कोई पार्टी नहीं मानते, उनकी पहल को गंभीरता से नहीं लेते या कोई और माजरा है. सोशल मीडिया पर इस बाबत कई तरह की बातें लिखी जा रही हैं. प्रशांत पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वो परोक्ष तौर पर बीजेपी को फायदा पहुंचाना चाहते हैं. इस वजह से जातीय समीकरण को देखते हुए जन सुराज के उम्मीदवार उतारे जा रहे हैं. जिसका फायदा बीजेपी को हो सके.

पीके ने अति आत्मविश्वास का राज क्या है?

वैसे पीके चाहे जितना इनकार करें लेकिन जब वो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं और तीसरे विकल्प की ताल ठोकते हैं तो उनकी तुलना दिल्ली में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल से हो ही जाती है. पीके ने अपने हरेक इंटरव्यू में दावा किया है कि प्रदेश की जनता नए विकल्प पर मुहर लगाने के लिए तैयार है. वे जहां भी जाते हैं, उनको भारी जनसमर्थन मिल रहा है. पीके ने अति आत्मविश्वास जताते हुए यह भी दावा किया कि सरकार उनकी पार्टी की बन सकती है. 243 में 150 से कम सीटें आईं तो ये उनकी हार होगी.

गौरतलब है कि प्रशांत किशोर प्रत्यक्ष राजनीति में अभी नए खिलाड़ी हैं लेकिन राजनीतिक दांव पेच को बखूबी जानते हैं. पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर सीएम नीतीश कुमार, सीएम ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू जैसे दिग्गजों के चुनावी रणनीतिकार रह चुके हैं और जिताने का भी ट्रैक रिकॉर्ड है. लेकिन जैसा कि अक्सर होता है कोच बनकर मशविरा देना और पिच पर खुद बल्लेबाजी करने में अंतर होता है. पीके अब तक सलाहकार और रणनीतिकार की भूमिका में रहे हैं लेकिन अब नेता बनकर उन्हीं नेताओं को चुनौती दे रहे हैं, जिनको उन्होंने सत्ता दिलाने में सफलता पाई.

क्या है प्रशांत किशोर की असली रणनीति?

ऐसे में पीके का यह राजनीतिक युद्ध थोड़ा अलग किस्म का दिखता है. लेकिन बिहार ऐसा प्रदेश है, और यहां की राजनीति ऐसी बनी हुई है जहां के केंद्र में जब तक लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बने हुए हैं, तब तक प्रशांत किशोर जैसे नेताओं की दाल गलेगी-इसकी संभावना कम ही नजर आती है. वैसे फिलहाल प्रशांत किशोर की रणनीति यही है कि किसी तरह इस चुनाव में अपनी बिसात बिछा सकें, जिसकी फसल अगले चुनाव में काट सकें.

यह भी पढ़ें: विकास, बदलाव या जाति-समाज, 20 साल में कितना बदला बिहार का मिजाज?

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