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Bihar Elections: बीजेपी से नाराजगी छोड़िए, असल में चिराग से 2020 का बदला ले रहे नीतीश

चिराग पासवान और नीतीश कुमार

बिहार में अगले महीने होने वाले मतदान से पहले NDA और महागठबंधन के अंदर खींचतान मची है. चुनावी मुकाबले से पहले दोनों ही गठबंधन में शामिल पार्टियां अपनी-अपनी सहयोगियों से लड़ रही हैं. इस झगड़े की जड़ है सीटों का बंटवारा. महागठबंधन में अब तक सीटों पर बात ही चल रही है. वहीं NDA में सीटों का बंटवारा तो हो गया है, लेकिन रह-रहकर उपेंद्र कुशवाहा से लेकर नीतीश कुमार अपनी नाराजगी दिखा रहे हैं.

कुशवाहा का मुंह कम सीटें मिलने से फूला हुआ है तो नीतीश तारापुर सीट को लेकर नाराज बताए जा रहे. वह नहीं चाहते थे कि बीजेपी सम्राट चौधरी को तारापुर से टिकट दे. खैर नीतीश की नाराजगी को नजरअंदाज करते हुए बीजेपी ने सम्राट को तारापुर से मैदान में उतार दिया. मंगलवार को ये ऐलान होने के कुछ देर बाद ही नीतीश ने उन सीटों पर उम्मीदवार उतारे दिए जो चिराग पासवान की LJP को मिली थीं.

जेडीयू ने चिराग की जिन सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं वो हैं एकमा, गायघाट, राजगीर और सोनबरसा. ये वो सीटें हैं जहां 2020 के चुनाव में एलजेपी ने नीतीश की जेडीयू को चोट पहुंचाई थी. गायघाट में नीतीश कुमार ने न केवल चिराग की सीट ली है बल्कि उनका उम्मीदवार भी ले लिया है. उन्होंने उसे पार्टी का सिंबल दे दिया गया है.जेडीयू ने LJP सांसद वीणा देवी की बेटी कोमल सिंह को जेडीयू कैंडिडेट बनाया है. वहीं, राजगीर सीट से नीतीश ने कौशल किशोर को उतार दिया है. सोनबरसा सीट से जेडीयू रत्नेश सदा को पार्टी का सिंबल दे चुकी है.

नीतीश ने इन तीनों सीटों पर उम्मीदवार उतारकर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है. अब जान लेते इन 4 सीटों पर किस पार्टी ने दम दिखाया है. यहां पर किसको जीत मिलती रही है.

गायघाट में LJP ने पहुंचाई थी JDU को चोट

गायघाट बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में स्थित है. ये जनरल कैटेगरी की सीट है. यहां 14 बार चुनाव हो चुके हैं. गायघाट का चुनावी इतिहास उथल-पुथल और वापसी के पैटर्न को दर्शाता है. महेश्वर प्रसाद यादव ने यहां से कई बार चुनाव लड़ा है. 1990 में निर्दलीय के रूप में, 1995 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में और बाद में 2005 और 2015 के चुनावों में RJD का प्रतिनिधित्व करते हुए जीत उन्होंने हासिल की.

2010 के चुनाव में उन्हें हार मिली थी. बीजेपी की वीणा देवी ने उन्हें हराया था. 2020 में आरजेडी ने निरंजन रॉय को मैदान में उतारा. उन्होंने 7566 वोटों से जीत दर्ज की. 2020 के चुनाव में एलजेपी ने भी यहां से उम्मीदवार उतारा था. कोमल सिंह मैदान में थीं. उनकी उपस्थिति ने काफी प्रभावित किया. गायघाट उन सीटों में से एक थी जहां एलजेपी की वोट विभाजन रणनीति के कारण जेडीयू को हार का सामना करना पड़ा.

राजगीर में बीजेपी का जलवा

राजगीर सीट नालंदा जिले में आती है. अपने गठन के बाद से राजगीर में 16 चुनाव हुए हैं. यहां पर कई बार बीजेपी का दम देखने को मिला है. 9 चुनावों में उसने जीत हासिल की है. कांग्रेस, भाकपा और जेडीयू ने दो-दो बार जीत हासिल की है, जबकि जनता पार्टी को एक जीत मिली है. सत्यदेव नारायण आर्य ने बीजेपी के लिए राजगीर से आठ बार जीत हासिल की. उनका यह सिलसिला 2015 में टूट गया जब जेडीयू के रवि ज्योति कुमार ने उन्हें आरजेडी के गठबंधन के बाद 5,390 मतों से हरा दिया. बीजेपी-जेडीयू के फिर साथ आने के बाद 2020 के चुनाव में जेडीयू उम्मीदवार कौशल किशोर ने जीत हासिल की. उन्होंने कांग्रेस के रवि ज्योति कुमार को हराया था.

सोनबरसा में जेडीयू की पकड़

सोनबरसा बिहार के सहरसा जिले में आने वाली सीट है. यह निर्वाचन क्षेत्र 1951 से अस्तित्व में है और यहां विधानसभा के 17 चुनाव हो चुके है. परिसीमन आयोग की 2008 की सिफ़ारिशों के बाद सोनबरषा 2010 में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट बन गई. कांग्रेस ने यहां चार बार जीत हासिल की है, जबकि निर्दलीय, आरजेडी और जेडीयू ने तीन-तीन बार जीत हासिल की है.

जनता दल ने दो बार, जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और लोकदल ने एक-एक बार जीत हासिल की है. 1985 में सोनबरषा ने लोकदल के बैनर तले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को अपना विधायक चुना था. 2010 में आरक्षित होने के बाद से जेडीयू ने सोनबरषा पर मजबूत पकड़ बनाए रखी है.

रत्नेश सदा ने पिछले तीन चुनाव 2010, 2015 और 2020 में जीत हासिल की है. सदा की जीत का अंतर अलग-अलग रहा है. 2010 में 31,445, 2015 में 53,763 और 2020 में 13,466. एलजेपी 2010 और 2015 दोनों में यहां दूसरे स्थान पर रही थी. परिसीमन से पहले आरजेडी को यहां अच्छी सफलता मिली थी.

एकमा में LJP ने जेडीयू को दिया था दर्द

एकमा विधानसभा सीट सारण जिले में आती है. इसकी स्थापना पहली बार 1952 में हुई थी. यह 1957 से 2008 तक ये सीट वजूद में नहीं रही. परिसीमन आयोग की सिफारिशों के बाद इस निर्वाचन क्षेत्र को पुनर्जीवित किया गया और 2010 के विधानसभा चुनावों के बाद से यह एक नियमित निर्वाचन क्षेत्र रहा है. यह एक सामान्य श्रेणी की सीट है.

एकमा में तीन विधानसभा चुनाव हुए हैं. कांग्रेस पार्टी ने 1952 में यह सीट जीती थी, जबकि जेडीयू ने 2010 और 2015 में जीत हासिल की थी. 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के श्रीकांत यादव ने जेडीयू की सीता देवी को 13,927 मतों के अंतर से हराया. एलजेपी के उम्मीदवार कामेश्वर कुमार सिंह 29,948 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे, जो आरजेडी के जीत के अंतर से दोगुने से भी अधिक थे. एकमा में जेडीयू की हार पूरे बिहार में एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा थी.

Bihar Elections: बीजेपी से नाराजगी छोड़िए, असल में चिराग से 2020 का बदला ले रहे नीतीश

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