Political – बिहार: 23 की उम्र में ही शहाबुद्दीन ने जेल से लड़ लिया था पहला चुनाव, अब बेटे ओसामा का डेब्यू… कैसे हैं समीकरण?- #INA

बिहार: 23 की उम्र में ही शहाबुद्दीन ने जेल से लड़ लिया था पहला चुनाव, अब बेटे ओसामा का डेब्यू... कैसे हैं समीकरण?

सिवान में डॉन शहाबुद्दीन के बाद अब बेटा ओसामा भी आजमा रहा किस्मत

कभी देश के पहले राष्ट्रपति और अहिंसा के सिद्धांत के प्रबल समर्थक डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के नाम से जो धरती जानी जाती थी वो आगे चलकर डॉन मोहम्मद शहाबुद्दीन के नाम से खौफनाक पहचान रखने लगी. हालत यह हो गई कि शहाबुद्दीन का सिक्का जब तक सिवान में चला तब तक राजनीतिक दल अपने झंडे लगाने से डरते थे. चुनाव में उतरने वाले प्रत्याशी प्रचार तक नहीं करते थे. लेकिन अब न तो शहाबुद्दीन ही रहे और न ही 90 के बाद का वो खौफनाक दौर. विदेश में पढ़ाई करने वाले शहाबुद्दीन के बेटे पहली बार सियासी सरजमीं पर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

बाहुबली शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब पिछले साल अक्टूबर में अपनी मां हीना शहाब के साथ तेजस्वी यादव की मौजूदगी में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में शामिल हो गए थे. उनके शामिल होने के बाद से ही ये कयास लगने लगे थे कि ओसामा को चुनाव में उतरने का मौका मिलेगा. अब आरजेडी ने अपने मौजूदा विधायक हरी शंकर यादव का टिकट काटकर 30 साल के ओसामा को सिवान जिले की रघुनाथपुर विधानसभा सीट से मैदान में उतारा है. ओसामा के मैदान में उतरने से सिवान की सियासत को गरमा गई है. अब यहां पर शहाबुद्दीन का दौर और ओसामा के दौर की चर्चा होने लगी है. सिवान जिले में पहले चरण के तहत 6 नवंबर को वोट डाले जाएंगे.

‘A’ लेवल का अपराधी और जेल से नामांकन

पढ़ाई में अच्छा करने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन ने सिवान के डीएवी कॉलेज से राजनीति विज्ञान में मास्टर्स की पढ़ाई करने के बाद पीएचडी की डिग्री हासिल की. हालांकि पढ़ाई के साथ ही वह बेहद कम उम्र में ही यानी पढ़ाई के दौरान राजनीति और अपराध की दुनिया में आ गया. शहाबुद्दीन के खिलाफ पहला केस 1986 में महज 19 साल की उम्र में दर्ज हुआ था. फिर उसके खिलाफ लगातार आपराधिक मामले जुड़ते चले गए. इस बीच हुसैनगंज थाने में उसके नाम की हिस्ट्रीशीट खोली गई और उन्हें ‘ए’ लेवल का अपराधी घोषित कर दिया गया.

साल 1990 में पहली बार जब उसने चुनाव लड़ने का फैसला लिया तब वह जेल में बंद था. खास बात यह रही कि तब उनकी उम्र 23 साल थी. विधायकी का चुनाव लड़ने के लिए वह योग्य नहीं थे क्योंकि वह 25 के नहीं हुआ था.

निर्दलीय लड़ा चुनाव, शेर बना चुनाव चिन्ह

कहा जाता है कि शहाबुद्दीन के पर्चा दाखिला को लेकर प्रशासन की ओर से आपत्ति जताई गई क्योंकि तब उसकी उम्र 25 साल से कम है. वह चुनाव नहीं लड़ सकता. इस मसले पर शहाबुद्दीन के प्रशंसकों ने सिवान में दंगा करा दिया. उनके प्रशंसकों का कहना था कि अगर चुनाव लड़ने की उनकी उम्र नहीं थी तो फिर उन्हें पर्चा दाखिल क्यों करने दिया गया. लिहाजा वो जेल के अंदर से ही मैदान में उतरा.

फरवरी 1990 में अपने पहले चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे मोहम्मद शहाबुद्दीन को कड़ी चुनौती मिली. उनका चुनाव चिन्ह शेर था. शहाबुद्दीन के अलावा मैदान में एक महिला समेत 18 और प्रत्याशी थे. लेकिन शहाबुद्दीन को कड़ी टक्कर कांग्रेस के त्रिभुवन सिंह से ही मिली.

चुनाव जीतने के बाद मिली जेल से रिहाई

हालांकि मुकाबला इस कदर रहा कि 16 प्रत्याशियों की जमानत ही जब्त हो गई थी. इस सीट पर 64.44% यानी 94,276 वोट पड़े. इसमें से शहाबुद्दीन के खाते में 23,215 वोट आए तो त्रिभुवन सिंह को 22,837 वोट ही हासिल हो सके. बेहद कांटेदार मुकाबले में जेल में बंद शहाबुद्दीन 378 वोटों के अंतर से चुनाव जीत गए. चुनाव जीतने के बाद उन्हें जेल से रिहाई मिल गई.

इस बीच उनकी लालू प्रसाद यादव के बाद नजदीकियां बढ़ती चली गई. वह जनता दल में आ गए और युवा विंग से जुड़ गए.फिर 1995 के विधानसभा चुनाव में शहाबुद्दीन जनता दल के टिकट से मैदान में उतरे. उनकी दबंगई इस कदर बढ़ गई थी कि राजनीतिक दल उनके इलाके में प्रचार करने से डरने लगे. कहा जाता है कि अन्य राजनीतिक दल अपने झंडे तक उनके क्षेत्र में लगाने से डरते थे. 1995 के चुनाव में 25 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे और 23 की जमानत ही जब्त हो गई थी. 62 फीसदी पड़े वोटों में से शहाबुद्दीन को 42,710 वोट मिले तो दूसरे नंबर पर रहे समता पार्टी (एसएपी) के श्रृजय कुमार को 28,578 वोट आए. शहाबुद्दीन 14,132 मतों के अंतर से जिरादेई सीट से जीत हासिल हुई.

2004 के चुनाव के बाद शुरू हुए बुरे दिन

फिर वह केंद्र की राजनीति में आ गए और वह लोकसभा चुनाव में सिवान से 4 बार चुनाव में लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे. इस बीच शहाबुद्दीन का आपराधिक ग्राफ भी तेजी से ऊपर चढ़ता गया. लालू के सत्ता में आने के बाद से इसका आतंक बढ़ता चला गया. अब उसकी छवि डॉन वाली हो चुकी थी. लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव से करीब 8 महीने पहले सीपीआई-एमएल के नेता चंद्रशेखर प्रसाद की कीडनैपिंग और मर्डर के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया.

जेल से ही उसने लोकसभा चुनाव लड़ा. लेकिन उस पर चुनाव में भारी धांधली करने का आरोप लगा. फिर भी जीत उसके खाते में गई. इस चुनाव में विपक्षी दल जेडीयू के कई कार्यकर्ताओं की हत्या किए जाने के आरोप लगे. लेकिन 2004 के आम चुनाव के बाद से शहाबुद्दीन के बुरे दिन की शुरुआत हो गई. नवंबर 2005 में जब वह संसद सत्र में भाग लेने दिल्ली आया हुआ था तभी बिहार पुलिस की एक स्पेशल टीम ने उसे गिरफ्तार कर लिया. उसके यहां से अवैध हथियार और सेना के नाइट विजन उपकरण समेत कई आपत्तिजनक चीजें मिलीं.

पति के बाद पत्नी को नहीं मिली कामयाबी

कोर्ट ने हत्या, अपहरण, बम धमाकों के अलावा अवैध हथियार रखने तथा जबरन वसूली से जुड़े दर्जनों मामलों में उसे आजीवन कारावास की सजा सुना दी. साल 2009 में उसके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई. ऐसे में उसकी पत्नी हीना ने उसकी जगह भरने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी हार मिली. हीना ने 2 बार और प्रयास किया लेकिन तब भी कामयाबी नहीं मिली. इस बीच शहाबुद्दीन की 2021 में कोरोना की वजह से मौत हो गई.

पिछले लोकसभा चुनाव (2024) में हीना शहाब को आरजेडी से टिकट नहीं मिला तो वह निर्दलीय ही सीवान से मैदान में उतरी, लेकिन वह जेडीयू की उम्मीदवार विजयलक्ष्मी देवी के हाथों हार गईं.

लंदन से लौटे बेटे की सिवान पर नजर

सिवान जिला अब फिर से चर्चा में है क्योंकि पहले शहाबुद्दीन फिर उसकी पत्नी हीना शहाब के बाद अब उसका बेटा ओसामा शहाब चुनाव मैदान में उतर रहा है. शहाबुद्दीन ने सिवान जिले की जीरादेई सीट से 2 बार विधायकी के चुनाव में जीत हासिल की, तो ओसामा को आरजेडी ने जीरादेई की जगह इसी जिले की रघुनाथपुर सीट से मैदान में उतारा है.

रघुनाथपुर क्षेत्र को मुस्लिम और यादव बहुल क्षेत्र माना जाता है. ऐसे में पार्टी के लिए ओसामा जीत की बड़ी उम्मीद बनते दिख रहे हैं. ओसामा अपने पिता के उलट है और उन्होंने लंदन से लॉ की पढ़ाई पूरी की. लेकिन वह पिता की कोरोना से हुई मौत के बाद भारत लौट आए. हालांकि अपने पिता की तरह वह भी चुनाव लड़ने से पहले जेल जा चुके हैं. पिछले साल उन्हें जमीन विवाद के एक मामले में 3 महीने जेल की सजा काटनी पड़ी थी.

सत्ता में वापसी की कोशिशों में जुटी आरजेडी ने ओसामा के लिए एक तरह से सुरक्षित सीट का चयन किया है. वह 2015 से ही यहां से जीत रही है. आरजेडी के हरिशंकर यादव लगातार 10 साल से विधायक थे. लेकिन इस बार यादव का टिकट काट कर ओसामा को मैदान में उतार दिया. अब देखना है कि सिवान की जनता शहाबुद्दीन के पुराने खूंखार और खूनी दौर की जगह नए और आधुनिक दौर के नए ‘शहाबुद्दीन’ के साथ कैसा सलूक करती है.

बिहार: 23 की उम्र में ही शहाबुद्दीन ने जेल से लड़ लिया था पहला चुनाव, अब बेटे ओसामा का डेब्यू… कैसे हैं समीकरण?

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