Political – छठ त्योहार और लोकतंत्र का पर्व, डबल फेस्टिवल की बेला में बिहार की चुनावी गपशप पर एक नज़र- #INA

छठ त्योहार और लोकतंत्र का पर्व, डबल फेस्टिवल की बेला में बिहार की चुनावी गपशप पर एक नज़र

बिहार में किसकी बाजी?

बिहार का आलम इन दिनों सबसे जुदा है. जिधर देखिए, उधर पर्व-त्योहार की ही बातें चल रही हैं. चुनाव और छठ- इन्हीं दो मु्द्दों की चर्चा गर्म है. एक तरफ बाजार में सूप से लेकर नारियल और केले के भाव की चर्चा तो दूसरी तरफ अबकी बार महागठबंधन कि एनडीए पर मंथन. जंगल राज कि मंगल काज. नीतीश कि तेजस्वी. कौन जीतेगा, कौन हारेगा. कौन किसके साथ, कौन किससे कितनी दूर. फ्रेंडली फाइट में किसकी हवा टाइट वगैरह वगैरह. बिहार की यह बेचैनी देश भर के बड़े रेलवे स्टेशनों पर भी देखी जा सकती है. किसी को छठ पूजा करनी है तो किसी को वोट देना है. किसी तरह जल्दी पहुंचना है. घाट डेकोरेट करना है तो बूथ मैनेजमेंट भी करना है.

यकीन मानिए साल 2025 बिहार के लिए दोहरे पर्व यानी डबल फेस्टिवल का मौका लेकर आया है. साल 2005 से ही लगातार हर पांच साल पर यह मौका आता है. लोक आस्था का पर्व छठ तो लोकतंत्र का पर्व चुनाव. प्रदेश में पांच सालों के बाद यह सुनहरा मौका आया है. पूरा परिवेश सांस्कृतिक और राजनीतिक हो चला है. संस्कृति और सियासत का ऐसा संगम शायद ही कभी देखने को मिलता है. बिहार को यह बेमिसाल मौका मिला है. दिलचस्प बात ये कि बिहार के लिए दोनों ही ऐसे आयोजन हैं जिसकी तैयारी काफी पहले से ही शुरू हो जाती है. बिहार इस बार वैसे भी पहले से तैयार है.

बिहार का जमीनी मिजाज बहुत दिलचस्प

पुराने बिहार को नया बिहार बनाने का जोर है. छठ त्योहार और लोकतंत्र के पर्व के इस डबल फेस्टिवल की बेला में बिहार का ये जमीनी मिजाज बहुत दिलचस्प है. अबकी बार आर-पार का वॉर है. जिन्होंने इतिहास में यहां लंबे समय तक राज किया, उनका वादा है मौका मिला तो नया बिहार बनाएंगे वहीं जो वर्तमान में लंबे समय से सत्ता में हैं, वे भी कह रहे हैं जीते तो विकास करना है. अब समझना मुश्किल है जब सत्ता में थे तो नया बिहार अब तक क्यों नहीं बनाए. जनता की गपशप में ये मुद्दा भी खूब गर्म है.

बहरहाल बिहार की चुनावी बेला में गॉसिप के दो-तीन मुद्दे और सबसे अहम हैं. गपशप का पहला मुद्दा है- नीतीश कुमार अगले मुख्यमंत्री होंगे या नहीं. विपक्षी दलों ने नीतीश कुमार की सेहत का मु्द्दा जोर-शोर से उठाया और एनडीए पर निशाना साधना शुरू कर दिया. तेजस्वी यादव, अशोक गहलोत, अजय साहनी, दीपांकर भट्टाचार्य ही नहीं बल्कि बिहार चुनाव के नए खिलाड़ी जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भी शक का माहौल बना दिया. जनता खुले शब्दों में जानना चाहती है- एनडीए के जीतने पर नीतीश अगले सीएम होंगे या नहीं. लेकिन बीजेपी के बड़े नेताओं की तरफ से भी इस बारे में कोई दो टूक शब्दों में जवाब नहीं मिल पा रहा है जैसा कि पिछले चुनावों में नारे लगे- एक बार फिर नीतीशे कुमार.

फ्रेंडली बनाम सत्ता की फाइट

बिहार चुनाव में गपशप का दूसरा अहम मुद्दा महागठबंधन और इसके अंदर फ्रेंडली फाइट है. फ्रेंडली फाइट क्या चीज़ होती है, ये बिहार चुनाव में पहली बार सुनने को मिला है. फाइट विद फ्रेंडली भला कैसा मुहावरा है. दोस्ती में लड़ाई कैसी. ये सवाल एनडीए के नेताओं ने उठाया. क्योंकि बिहार में महागठबंधन के ही कई दल कई जगहों पर एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस-आरजेडी आदि पार्टी के नेता सवाल पूछे जाने पर मीडिया में बयान जारी कर रहे हैं- ऑल इज़ वेल. लेकिन दूसरी तरफ फाइट भी जारी है. इस पर मतदाता गुमराह हैं. गपशप में इसकी भी गर्मी है. दूसरे चरण के लिए नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख खत्म होने के बाद भी महागठबंधन के दल 12 सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे है. भला ये कैसा दोस्ताना मुकाबला है.

सीएम फेस की रेस में तेजस्वी नंबर वन

हालांकि महागठबंधन की ओर से गुरुवार को संयुक्त प्रेस वार्ता करके तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री तो अजय साहनी को उप-मुख्यमंत्री के भावी चेहरे के तौर औपचारिक ऐलान कर दिया गया, जिसके बाद से महागठबंधन के सीएम फेस पर चल रही गपशप पर विराम लग गया है. लेकिन महागठबंधन में फ्रेंडली फाइट को लेकर ये गपशप खत्म होने का नाम नहीं ले रही. वैसे तमाम सर्वे में सीएम फेस की रेस में तेजस्वी के नंबर वन आने से महागठबंधन में आत्मविश्वास का माहौल भी है. तेजस्वी यादव की जनसभाओं में भीड़ उमड़ रही है, तो पीएम मोदी की रैलियों में भी उतनी ही भीड़ देखी जा रही है जबकि तीसरे विकल्प की हामी भरने वाले प्रशांत किशोर की रैलियों में भी युवाओं की भीड़ अच्छी खासी देखी जा रही है.

तो बिहार की जनता आखिर किसकी तरफ है. लोगों के दिल में क्या है. अब अहम सवाल ये भी है कि चुनावी धरती पर जारी गपशप की ये गूंज आखिर किस बिंदू पर आकर ठहरती है, भीड़ के मिजाज का मीटर कितना चढ़ता-उतरता है और छठ पूजा में जो प्रवासी बिहारी अपने-अपने गांव घर पहुंचे हैं, उनमें से कितने लोग 6 नवंबर और 11 नवंबर की वोटिंग में हिस्सा लेने के लिए वहां ठहरते हैं. ट

यह भी पढ़ें:जब तक बने रहेंगे नीतीश कुमार और लालू यादवबिहार में क्या कर सकेंगे प्रशांत किशोर जैसे नेता?

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