Political – कम लड़ो-ज्यादा जीतो… बिहार चुनाव का पैटर्न क्या इस बार भी बीजेपी के लिए लाएगा गुड न्यूज?- #INA

कम लड़ो-ज्यादा जीतो... बिहार चुनाव का पैटर्न क्या इस बार भी बीजेपी के लिए लाएगा गुड न्यूज?

एनडीए में हो गया सीटों का बंटवारा

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में सीटों का बंटवारा हो गया है. भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (यूनाइटेड) 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी. वहीं लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास पासवान) को 29 सीटें मिली हैं. इसके अलावा राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) को 6-6 सीटें मिली हैं. यहां गौर करने वाली बात है कि इस गठबंधन की सभी पार्टियां पिछले चुनाव की तुलना में कम सीटों पर लड़ रही हैं. हालांकि, जीतनराम मांझी से लेकर उपेंद्र कुशवाहा तक में इस बात को लेकर नाराजगी है. दोनों अपने लिए ज्यादा सीटें चाहते हैं. इस बीच बिहार के पिछले 2 चुनावों (2015 और 2020) के नतीजों पर गौर किया जाए तो ये सामने आता है कि गठबंधन का हिस्सा बनकर और कम सीटों पर लड़कर पार्टियों ने बिहार में अच्छा काम किया है.

नतीजों से सामने आया है कि गठबंधन से अलग होकर पार्टियां ज्यादा सीटों पर तो लड़ ली हैं, लेकिन उनका स्ट्राइक रेट अच्छा नहीं रहा है. 2015 और 2020 के चुनाव में ऐसे कई उदाहरण मिले हैं. ऐसे में कहा जा सकता है कि बीजेपी इस बात को समझकर कम सीटों पर लड़कर समीकरणों के सहारे बेहतर परिणामों की उम्मीद कर रही है. 2015 में कांग्रेस भी कम सीटों पर लड़ी और अच्छी सीटें जीती, 2020 में उसका स्ट्राइक रेट खराब रहा. वहीं 2020 में CPIML का भी स्ट्राइक रेट अच्छा रहा. 2015 विधानसभा चुनाव में गठबंधन से बने समीकरणों के सहारे ही जेडीयू और आरजेडी को बड़ी जीत मिली. 2020 में इसका फायदा बीजेपी और जेडीयू को मिला.

15 की तुलना में 20 में BJP का प्रदर्शन बेहतर

शुरुआत बीजेपी से करें तो 2015 वो 157 सीटों पर चुनाव लड़ी, वहीं 2020 में 110 सीटों पर लड़ी और इस बार 101 सीटों पर लड़ रही है. नतीजों की बात करें तो 2015 में उसे 53 सीटों पर जीत मिली. लेकिन 2020 में 110 सीटों में से उसे 74 सीटों पर जीत मिली. यानी सीटें कम लड़ी और ज्यादा पर जीत मिली. इसी पैटर्न के सहारे बीजेपी इस बार भी जीत खोज रही है. हालांकि यहां ध्यान देने वाली बात है कि 2015 में JDU एनडीए से अलग होकर महागठबंधन में चुनाव लड़ी थी. 2020 में जेडीयू और बीजेपी वापस साथ आ गए. इस बार भी दोनों साथ हैं. दोनों ने मिलकर जब-जब चुनाव लड़ा है उन्हें सत्ता मिली है. ऐसे में बीजेपी एक बार गुड न्यूज की उम्मीद लगाए बैठे है.

कांग्रेस पर भी पैटर्न का असर

बीजेपी के बाद कांग्रेस की बात करें तो ये पैटर्न और बेहतर समझ आता है. 2015 में कांग्रेस को महागठबंधन में 243 में से 41 सीटें मिली थीं, लेकिन नतीजे काफी बेहतर रहे. कांग्रेस को 27 सीटों पर जीत मिली और महागठबंधन सरकार में आ गई. वहीं 2020 की बात करें तो इस बार कांग्रेस ज्यादा सीटों यानी 70 विधानसभा में लड़ी, लेकिन नतीजे संतोषजनक नहीं रहे. उसे 19 सीटों पर ही जीत मिली. इस प्रदर्शन को महागठबंधन की हार की बड़ी वजह माना गया. इसी के चलते इस बार गठबंधन में कांग्रेस पर दबाव है.

2020 में गिर गया जेडीयू का प्रदर्शन

इसके बाद जेडीयू की बात करें तो 2015 में आरजेडी और कांग्रेस के साथ रहकर नीतीश की पार्टी 101 सीटों पर लड़ी और उसे 71 सीटों पर जीत मिली. लेकिन 2020 में बीजेपी के साथ मिलकर वो 115 सीटों पर लड़ी लेकिन जीत सिर्फ 43 सीटों पर ही मिल सकी. हालांकि बीजेपी के प्रदर्शन के दम पर एनडीए सत्ता में आ गया और नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन पार्टी का प्रदर्शन गिर गया. इस बार जदयू फिर 101 सीटों पर लड़ रही है.

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2020 में RJD की घट गईं सीटें

लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी पर भी इस पैटर्न का असर है. 2015 में आरजेडी 101 सीटों पर लड़कर 80 सीटों पर जीती और सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. महागठबंधन की सरकार भी बनी. 2020 में आरजेडी 144 सीटों पर लड़ी और 75 सीटें जीत पाई. इस बार भी वो सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सरकार बनाने से चूक गई. इस बार अभी तक महागठबंधन में सीटों का ऐलान नहीं हुआ है.

वोटकटवा पार्टी बनी LJP!

चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी (रामविलास पासवान) की बात करें तो 2020 के चुनाव में ये पार्टी अकेले चुनाव लड़ी. तब चिराग 134 सीटों पर चुनाव लड़े और सिर्फ एक सीट पर जीत हासिल कर पाए. 2015 में एलजेपी एनडीए के साथ 42 सीटों पर चुनाव लड़ी और 2 पर जीत हासिल कर पाई. इस बार LJP को एनडीए में 29 सीटें मिली हैं और उसे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. हालांकि, एलजेपी को लेकर कहा गया कि 2020 में इतनी सीटों पर लड़कर उसने जेडीयू का नुकसान किया.

महागठबंधन में सुधरा लेफ्ट का प्रदर्शन

मांझी की पार्टी HAM की बात करें तो दोनों चुनावों में HAM एनडीए का हिस्सा रहे. 2015 में HAM 21 सीटों पर लड़ी और सिर्फ 1 पर जीत पाई. हालांकि 2020 में प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन वो भी पैटर्न की वजह से. पार्टी सिर्फ 7 सीटों पर लड़ी और 4 पर जीत हासिल कर गई. अंत में लेफ्ट पार्टियों की बात करें तो वहां भी ये पैटर्न दिखाई देगा. 2015 में सभी लेफ्ट पार्टियां मिलकर 224 सीटों पर लड़ी थीं, लेकिन जीत सिर्फ 3 पर मिल पाई. 2020 में लेफ्ट पार्टियां महागठबंधन का हिस्सा बनीं और उसका असर रिजल्च पर भी दिखाई दिया. लेफ्ट को कुल 29 सीटें मिलीं और 16 पर जीत मिल गई.

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