Political – नीतीश कुमार ने कुर्मी-कोइरी को कैसा बना दिया बिहार का साइलेंट पावरहाउस? जानें पूरी कहानी- #INA

90 का दशक भारतीय राजनीति में बदलाव का बिगुल था. धर्म और आरक्षण की राजनीति का उभार हो रहा था और कांगेस के हाथों से सत्ता निकलकर नए क्षेत्रिय क्षत्रपों के संरक्षण में जा रही थी. इसी दशक के चौथे साल में बिहार की सियासत ने ऐसी करवट ली, जिसका असर पटना के 1 अणे मार्ग पर आज भी देखा जा सकता है.
12 फरवरी 1994 माहौल में ठंड थी, लेकिन पटना का गांधी मैदान उबल रहा था. यहां देखने में तो रैली का मंच सजा था, लेकिन असल में लाखों समर्थकों के सीने में ज्वालामुखी का लावा धधक रहा था. ऐसा लावा जो किसी भी वक्त फूट सकता था. समर्थकों की भावनाएं बेकाबू हो गई जैसे एक नारा फिजाओं में गूंजा”भीख नहीं, हिस्सेदारी चाहिए.”
31 साल पुरानी कुर्मी एकता रैली, राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी सभा थी, जिसमें बड़े बदलाव का झंडा बुलंद करते हुए…लाखों की भीड़ बिना बुलाए पहुंची थी. उस दौर में मंडल आयोग की रिपोर्ट ने पिछड़ेपन के पहाड़ को हिला दिया. राजनीति की शतरंज पर मोहरे बिछ रहे थे और इस बिसात पर दो मोहरे ऐसे थे, जो चुपचाप अपनी चाल चल रहे थे. उनका उदय, बिहार की तकदीर लिखने जा रहा था. ये कोई नेता नहीं, जाति थी.
बिहार का साइलेंट पावरहाउस
जाति व्यवस्था पर गहरी जानकारी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि कुर्मी और कोइरी जातियां खेती से जुड़ी रही हैं, लेकिन उनकी खेती करने का तरीका हमेशा से अलग और आधुनिक रहा है. कुर्मियों और कोइरियों का ये समीकरण सत्ता में बदला 1990 के बाद. जब लालू प्रसाद यादव के उदय ने यादवों को सत्ता के केंद्र में ला दिया, तो कुर्मी समाज में राजनीतिक असुरक्षा और महत्वाकांक्षा दोनों ने जन्म लिया.
उन्हें एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी, जो लालू के करिश्मे को टक्कर दे सके, वो चेहरा उन्हें मिला जेपी आंदोलन से निकले एक इंजीनियर में…..यानी- नीतीश कुमार.
पिछले 19 साल से बिहार का नेतृत्व कर रहे नीतीश कुमार, जब 15 साल के थे तो भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया. छात्र नीतीश ने ये घटना रेडियो पर सुनी, वो बैचेन हो गए. जब कुछ समझ ना आया तो भागकर अपने मास्टर साब के पास पहुंचे और उन्हें पूरी घटना सुनाई… छात्र नीतीश की ये बैचेनी युवा नीतीश तक बहुत बढ़ चुकी थी और मिट्टी माटी के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा उन्हें छात्र राजीनीति में खींच लाया. देखते देखते वो अपनी जाति कुर्मी के भविष्य बन गए.
कैसे नीतीश बने राजनीति के बाजीगर?
लालू और शरद ने यादव जाति का सिरमौर बनने की रेस शुरू कर दी थी, लेकिन कुर्मी अभी भी अपना लीडर खोज रहे थे. ये तलाश नीतीश पर आकर रुकी. नीतीश कुमार सिर्फ नेता नहीं, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार साबित हुए. उन्होंने समझा कि अकेले कुर्मी वोट से सत्ता नहीं मिलेगी. इसीलिए लव यानी कुर्मी और कुश यानी कोइरी को एक राजनीतिक समीकरण में ढाला. दो जातियों को जोड़ा और इतिहास की धारा को मोड़ दिया.
वो लव कुश समीकरण जो बिहार की 7% से ज्यादा वोट शक्ति साधता है, जिसमें कुर्मी की हिस्सेदारी 2.87% तो कोइरी की संख्या कुल आबादी का 4.2 फीसदी है. 50 से 60 सीटों पर असर डालते हैं. पटना, मुंगेर, समस्तीपुर, खगड़िया, सारण, आरा, बक्सर, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण वो सीटें हैं, जहां हार और जीत तय करने में कुर्मी और कोइरी समुदाय का बड़ा रोल है.
कुर्मी समुदाय प्राचीन भारत के कृषक समाज से जन्मा, जिनका नाम संस्कृत के ‘कृषि-कर्मी’ शब्द से आया है. ऐतिहासिक रूप से इन्हें क्षत्रिय और वैश्य वर्गों से जोड़ा जाता है और उन्होंने कृषक जीवन और सामाजिक नेतृत्व में अहम भूमिका निभाई है…पौराणिक आधार पर कई बार ये कहा जाता है कि कुर्मी भगवान राम के पुत्र लव के वंशज हैं.
इतिहासकार क्रिस्टोफर बेली के मुताबिक, कुर्मी किसान गांव के पास की जमीनों पर ही खेती करते थे. वो गांव के आस-पास अच्छी फसलें और बाहर बाजरे की फसल उगाते थे. उनकी बस्तियां और बाजार स्थानीय अर्थव्यवस्था को जल्दी मजबूत कर देते थे.
कोइरी और कुर्मी जाति का सियासी उदय
कोइरी जाति की उत्पत्ति कैसे हुई इस पर कोई विशेष दस्तावेज तो नहीं हैं, लेकिन ये प्रमुख रूप से किसान समुदाय रहा है. क्षत्रिय संबंधों पर कई काल्पनिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता. आज भी कोईरी जाति कृषि से जुड़े छोटे किसानों के रूप में बिहार में सबसे अधिक संख्या वाली जाति मानी जाती है. पौराणिक मान्यताओं के आधार पर कहा जाता है कि कोइरी भगवान राम के बेटे कुश के वंशज हैं.
कहा जाता है कि ब्रिटिश काल में जब जमींदारी व्यवस्था चरम पर थी, तो कुर्मी किसानों ने सबसे पहले एकजुट होकर अपने हक़ की आवाज बुलंद की. बिहार और उत्तर प्रदेश में ‘कुर्मी किसान सभाओं’ का गठन हुआ, जिसने आगे चलकर बड़े किसान आंदोलनों को जन्म दिया.
सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे हिस्सा हमारा है कोइरी समाज से आने वाले जगदेव प्रसाद का ये नारा खेतों की मेड़ से निकलकर विधानसभा तक गूंजा और यही से शुरू हुआ कोइरी-कुर्मी समाज का असली राजनीतिक सफर.
अब वापस 90 के दशक पर लौटते हैं, जहां ओबीसी वोटबैंक दो फाड़ हो चुका था. 1994 यानी वो साल जब नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस ने मिलकर समता पार्टी बनाई. ये पार्टी बनी थी कांग्रेस और आरजेडी दोनों के खिलाफ एक वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने के लिए. नीतीश कुमार के लिए समता पार्टी एक ऐसी नाव साबित हुई, जिसने उन्हें सीधे सत्ता के किनारे तक पहुंचा दिया.
और बिहार के सीएम बने नीतीश कुमार
नीतीश कुमार पहली बार साल 2000 में 7 दिन के लिए सीएम बने, क्योंकि विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाए. इसके बाद 2005 में पहली बार बतौर सीएम 5 साल पूरे किए. अब तक 9 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं.
नीतीश कुमार का सीएम बनना कुर्मी-कोईरी जाति के लिए विशेष दिन था. हजारों साल पुरानी जाति को शायद पहली बार सत्ता में उचित भागीदारी मिली थी, क्योंकि ये सत्ता लंबे समय तक चलने वाली थी. भले ही OBC में उच्च-पिछड़ी जाति की श्रेणी में आने वाले कुर्मियों के बड़े चेहरे और सीएम के तौर पर नीतीश पहचाने जाते हैं, लेकिन आप ये जान कर हैरान होंगे कि बिहार में OBC समाज के पहले सीएम नीतीश नहीं बल्कि सतीश प्रसाद सिंह थे. 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968 तक सिर्फ 4 दिनों तक ही पद पर बने रह सके और सबसे कम समय तक सीएम रहने का इतिहास रचा. मगर जाहिर है- ये सांकेतिक ताजपोशी से ज़्यादा कुछ नहीं था.
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने की कहानी कुर्मी कोईरी राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ थी. लेकिन इस कहानी की असली जड़ें जाती हैं नालंदा की उस मिट्टी तक, जहां उनका जन्म हुआ. वही नालंदा जिसे कुर्मिस्तान भी कहते हैं. 1 मार्च 1951 को नालंदा जिले के बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार, बचपन से ही अलग थे.
नीतीश के नेतृत्व में कोइरी-कुर्मी की बढ़ी ताकत
नालंदा में नीतीश के घर की देखरेख करने वाले सीताराम बताते हैं कि नीतीश हमेशा से शांत और सरल स्वभाव के रहे हैं. कोई विवाद होता, तो सबको समझा-बुझाकर सुलझा देते. बचपन से ही नेतृत्व क्षमता रहा है. मैं ही देखरेख करता था पहले, खेत वगैरह अभी देखरेक करते हैं, स्वाभाव के बहुत अच्छे थे, कोई लड़ाई झगड़ा होता था तो सबको समझाते थे.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद नीतीश कुमार ने बिजली विभाग में नौकरी की, लेकिन उनका मन नौकरी में नहीं, बल्कि लोगों के बीच लगा रहता था. बतौर छात्र नेता राजनीति में आए, फिर लोकदल औऱ समता पार्टी के बाद JDU बनाई. केंद्र में रेल और कृषि मंत्रालय संभाले. इस दौरान नीतीश कुमार की छवि एक कुशल प्रशासक और लोकप्रिय केंद्रीय मंत्री के तौर पर रही.
नालंदा जो सदियों पहले विश्व कल्याण का बीज था. अब कुर्मी कोईरी के लीडर नीतीश कुमार की राजनीति से राज्य का पावर सेंटर बन रहा था यानी इतिहास ने अपना चक्र पूरा किया. नालंदा फिर से बना केंद्र, लेकिन इस बार शिक्षा का नहीं, राजनीति का और जब जिक्र नालंदा का होता है तो एक कहानी बहुत प्रसिद्ध है.
कहते हैं, जब गांव में किसी आयोजन के लिए अनाज चाहिए होता था, तो कुर्मी अपने धान-गेहूं से मदद करते और जब सब्जी चाहिए होती, तो कोइरी के खेत सबसे पहले याद आते. यानी गांव की ज़िंदगी में भी और राजनीति में भी, दोनों का मेल अटूट रहा है. नीतीश कुमार के दौर में कुर्मी समाज की ताकत बढ़ी, तो कोइरी समाज ने भी अपने सम्मान का शिखर छुआ.
लव-कुश की सियासत को इन नेताओं ने भी दी मदद
2005 के चुनावों में जब नीतीश कुमार पहली बार पूरे दमखम के साथ सत्ता में आए, तो ये सिर्फ कुर्मी वोटबैंक का असर नहीं था. कोइरी समाज के नेताओं और उनके वोटबैंक ने भी नीतीश को सत्ता की चाबी सौंपी थी… जिसकी नींव रखी कर्पूरी ठाकुर ने रखी थी.
कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ी जातियों के राजनीतिक सशक्तिकरण का बड़ा आंदोलन खड़ा किया. उनके नेतृत्व में अति पिछड़ा वर्ग यानी EBC और पिछड़ा वर्ग यानी OBC की राजनीति को वैचारिक और संगठनात्मक आधार मिला. इसी दौर में कोइरी और कुर्मी समुदाय राजनीति में संगठित रूप से उभरने लगे. कर्पूरी ठाकुर के सामाजिक न्याय के एजेंडे से प्रेरित होकर कई कोइरी नेता राजनीति में सक्रिय हुए.
1970 से 90 के दशक तक जॉर्ज फर्नांडीस, बिहार के पूर्व सीएम रामसुंदर दास, शकुनी चौधरी, महाबली सिंह जैसे नेताओं ने कोइरी समाज को सशक्त किया तो अब उपेंद्र कुशवाहा और सम्राट चौधरी जैसे नेताओं ने इसी सामाजिक आधार को आगे बढ़ाया. नीतीश कुमार ने इस सामाजिक आधार को संस्थागत रूप दिया और इसे विकास + सामाजिक न्याय के मॉडल से जोड़ा.
सुशील कुमार मोदी ने BJP-जेडीयू गठबंधन में नीतीश के लिए वो भूमिका निभाई, जिसे कोई स्थायी साथी कह सकता है. उपेंद्र कुशवाहा ने अलग दल बनाकर भले ही राजनीति में अपनी राहें तलाशीं, लेकिन कई मौकों पर उन्होंने नीतीश के समीकरण को मजबूत करने में मदद की. यानी, कोइरी समाज और उनके नेताओं ने न सिर्फ अपना वजूद बनाए रखा, बल्कि नीतीश कुमार के उदय में भी अहम योगदान दिया.
अलग सोच के साथ नीतीश ने की राजनीति
यानी साफ है कि नीतीश कुमार का सफर अकेला नहीं था. उनके साथ हमेशा कोइरी नेताओं का मजबूत कंधा रहा। अगर राजनीति को किसी नाव से तुलना करें, तो कुर्मी समाज उस नाव की कील है, और कोइरी समाज उसकी पतवार – दोनों के तालमेल ने ही पटना की गंगा पार की.
बिहार के सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे नीतीश की सोच हमेशा से ही अलग रही है. दहेज लेना उस दौर में आम बात थी, लेकिन अपनी शादी में नीतीश ने इससे इनकार कर दिया. साफ था कि सोचने कहने और करने वाले लीडर का जन्म हो चुका था. भले ही परंपराओं को तोड़ना पड़े. नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा एक पहेली की तरह रही है. कभी उन्हें सुशासन बाबू कहा गया- तो कभी पलटूराम, लेकिन नीतीश कुर्सी पर बने रहे. इसका कारण जानते हैं.
कारण है नीतीश को मिला कोइरी, अति पिछड़ों और दलितों का साथ. लालू यादव के M-Y यानी मुस्लिम-यादव संगठित वोट बैंक को तोड़ने के लिए नीतीश ने कोइरी- कुर्मी के साथ बीजेपी से गठबंधन का सहारा लिया, लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल सर्वे के मुताबिक- मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए गठबंधन को बिहार विधानसभा चुनाव में कई प्रमुख जातीय समूहों का मजबूत समर्थन मिला.
सुशासन बाबू और पलटूराम…का मिला उपनाम
कोइरी समुदाय के 51 प्रतिशत, कुर्मी समुदाय के 81 प्रतिशत और अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के करीब 58 प्रतिशत मतदाताओं ने एनडीए के पक्ष में वोट डाले, वहीं महादलितों में मुसहर जाति के 65 प्रतिशत वोट भी गठबंधन को मिले. सवर्ण समाज में ब्राह्मणों के 52%, भूमिहारों के 51%, राजपूतों के 55% और अन्य सवर्णों के 59% वोट नीतीश कुमार के साथ रहे. यानी अगर नीतीश सत्ता में हैं तो इसके पीछे कोइरी-कुर्मी-अति पिछड़ा वर्ग, महादलित और सवर्णों का साथ अहम कड़ी है.
कुर्मी कोइरी समाज की शक्ति से सत्ता के शीर्ष पर नीतीश जरूर पहुंचे, लेकिन इस लंबे शासनकाल में नीतीश की छवि बदलती रही. 2005 में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने बिहार को जंगलराज से निकालकर कानून-व्यवस्था और विकास की राह पर लाने का वादा दिया था. महिलाओं को पंचायत में 50% आरक्षण, साइकिल योजना, सड़क-बिजली-पानी जैसी नीतियों ने उन्हें जनता के बीच सुशासन बाबू की पहचान दी.
लेकिन राजनीति में फैसले हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलते. 2013 में नीतीश ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ा. 2015 में लालू यादव के साथ महागठबंधन में चले गए. 2017 में अचानक फिर बीजेपी के साथ लौट आए. 2022 में वापस RJD की ओर चले गए. 2024 में फिर से बीजेपी के साथ मिलकर नई सरकार बनाई यानी, बार-बार पाला बदलने की वजह से विरोधियों ने उन्हें पलटूराम कहना शुरू कर दिया
भले ही नीतीश आरजेडी के साथ भी सत्ता साझा कर चुके हैं, लेकिन सबसे लंबी पारी खेली NDA के साथ. और यहां भी कुर्मी-कोइरी गठजोड़ ही बड़ा फैक्टर है. नीतीश के रूप में बड़ा कुर्मी चेहरा बीजेपी के पास है… तो सम्राट चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा, जैसे बड़े कोइरी चेहरे भी हैं. यही वजह है कोइरी और कुर्मयिों के एकमुश्त वोट NDA को पड़ते हैं.
देश के कई राज्यों में अहम भूमिका
बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और गुजरात तक… कुर्मी समाज के लोग राजनीति, प्रशासन और कारोबार हर क्षेत्र में ऊंचे पदों पर पहुंचे. पूर्व गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल भी कुर्मी समाज से ही आते हैं तो कोइरी समाज भी बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक समेत देश के 20 राज्यो को अपनी मेहनत और हुनर से नया आकार दे रहा है. पूरे देश में इस समुदाय के लोग बसे हुए हैं, ये कहीं भी रहें हमेशा तरक्की और खुशहाली के लिए सोचते हैं.
सरकारी नौकरियों में भी कुर्मी समाज की हिस्सेदारी अहम है. जाति सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक यादव आबादी 14.27% होने के बावजूद सिर्फ 1.55% लोग सरकारी नौकरी में हैं, वहीं 2.87% आबादी वाले कुर्मी समाज के 3.11% लोग सरकारी सेवा दे रहे हैं. यानी आबादी के अनुपात से सरकारी नौकरी में इनकी हिस्सेदारी सबसे मजबूत है.
कुर्मी-कोइरी समाज सिर्फ एक जाति नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति को दिशा देने वाली सामूहिक इच्छाशक्ति है. नीतीश कुमार इस इच्छाशक्ति के प्रतीक हो सकते हैं, पर इसकी ऊर्जा समाज की संगठित एकता से ही निकलती है या यूं कह लीजिए कि ये बिहार की सियासत की वो खामोश शक्ति है, जो मुखर होती है तो सिंहासन बदलता है, और जब शांत रहती है तो भविष्य में बड़ी हलचल होती है.
इनपुटः TV9 भारतवर्ष ब्यूरो
नीतीश कुमार ने कुर्मी-कोइरी को कैसा बना दिया बिहार का साइलेंट पावरहाउस? जानें पूरी कहानी
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