Political – कौन है लालू यादव का सिपाही, जिसके कारण दूसरी बार सत्ता से दूर हो गए तेजस्वी- #INA

अख्तरुल ईमान ने किया खेल
बिहार चुनाव में महागठबंधन की करारी हार में एनडीए की जहां बड़ी भूमिका है. वहीं असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने भी मुस्लिम इलाकों में आरजेडी और कांग्रेस का खेल खराब किया है. बिहार में बिना संगठन वाली एआईएमआईएम ने 5 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि 8 सीटों पर उसने महागठबंधन के उम्मीदवारों हरवाने में अहम रोल अदा की.
एआईएमआईएम की वजह से ही आरजेडी के कोर वोटर्स मुस्लिम और यादव इंटैक्ट नहीं रह पाए, जिसका खामियाजा तेजस्वी यादव को भुगतना पड़ा है. 2020 के चुनाव में भी तेजस्वी यादव एआईएमआईएम की वजह से ही सत्ता से दूर हो गए थे.
दिलचस्प बात है कि दोनों ही बार उन्हें सत्ता से दूर करने वाले लालू यादव के सिपाही अख्तरुल ईमान हैं. अख्तरुल वर्तमान में एआईएमआईएम के बिहार प्रदेश अध्यक्ष पद पर काबिज हैं. 4 बार के विधायक अख्तरुल सीमांचल के मजबूत नेता माने जाते हैं. 2015 में आरजेडी से टिकट कटने की वजह से अख्तरुल ओवैसी की पार्टी में शामिल हो गए.
अख्तरुल ईमान राजनीति में कैसे आए?
1964 में जन्मे अख्तरुल ईमान ने छात्र जीवन में ही राजनीति में आ गए. मगध यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के दौरान ही वे सीमांचल में होने वाले अलग-अलग आंदोलनों से जुड़ गए. 1985 में सीमांचल इलाके में चोर और डकैतों के खिलाफ नेताओं ने एक मुहिम शुरू की थी. अख्तरुल भी इस मुहिम से जुड़ गए.
अख्तरुल बाद में राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो गए. 2005 तक अख्तरुल राष्ट्रीय जनता दल के स्थानीय लीडरशिप में बड़ी भूमिका में रहे. अपने बयानों की वजह से वे मुस्लिम इलाकों में काफी लोकप्रिय भी रहे.
अख्तरुल ईमान की सियासत 2005 में तब परवान चढ़ी, जब लालू यादव ने उन्हें किशनगंज सीट से उम्मीदवार बनाया. 2005 में किशनगंज से अख्तरुल जीतकर सदन पहुंचे. हालांकि, तब तक आरजेडी की सरकार चली गई. अख्तरुल 2010 में कोचाधामन सीट से मैदान में उतरे.
उन्होंने इस सीट से भी जीत हासिल कर ली. साल 2015 में अख्तरुल ईमान के साथ आरजेडी ने खेल कर दिया. अख्तरुल की सीट को जेडीयू कोटे में डाल दिया गया. इस चुनाव में जेडीयू और आरजेडी मिलकर लड़ रही थी. अख्तरुल ने इसके बाद असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम का दामन थाम लिया. हालांकि, 2015 के चुनाव में वे जीतने में असफल रहे.
फिर शुरू हुआ ईमान का मिशन बदलापुर
2015 में चुनाव हारने के बाद अख्तरुल एआईएमआईएम को सीमांचल में मजबूत करने में जुट गए. ओवैसी ने एआईएमआईएम की कमान भी अख्तरुल को ही सौंप दी. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. अख्तरुल खुद अमौर सीट से मैदान में उतरे.
2020 के चुनाव में एनडीए और आरजेडी गठबंधन के बीच कांटे की टक्कर हुई. एनडीए को 126 तो आरजेडी गठबंधन को 110 सीटों पर जीत मिली. 5 पर एआईएमएम ने जीत हासिल कर ली. 5 सीटों पर एआईएमआईएम ने गठबंधन का खेल भी बिगाड़ा, जिसके कारण तेजस्वी यादव कांटे की लड़ाई में सरकार बनाने से चूक गए.
2022 में आरजेडी ने ओवैसी की पार्टी में सेंध लगा दी. तेजस्वी यादव ने ईमान को छोड़कर पार्टी के 4 विधायकों को तोड़ लिया. 2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार में ओवैसी की पार्टी को बड़ी सफलता नहीं मिल पाई. 2025 में एआईएमआईएम ने आरजेडी से अपने गठबंधन में शामिल कर लेने का प्रस्ताव भेजा, लेकिन आरजेडी ने उसे खारिज कर दिया.
AIMIM ने 13 सीटों पर सीधा खेल बिगाड़ा
2025 में मुस्लिम बहुल सीटों पर ओवैसी ने उम्मीदवार उतारे. 5 पर ओवैसी की पार्टी को जीत मिली है. ओवैसी की पार्टी ने जोकीहाट, बहादुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी सीट पर जीत दर्ज की है. ओवैसी की पार्टी ने 8 सीटों पर महागठबंधन का खेल भी खराब किया है.
जिन सीटों पर महागठबंधन का खेल खराब हुआ है, उनमें ठाकुरगंज, कस्बा, मधुबनी, दरभंगा ग्रामीण और केवटी की सीट प्रमुख है. इन सीटों पर महागठबंधन की हार हुई है. एआईएमआईएम की वजह से ही इस चुनाव में आरजेडी के कोर वोटर्स मुस्लिम उससे दूर चले गए, जिसका असर अन्य कई सीटों पर भी देखने को मिली है.
कौन है लालू यादव का सिपाही, जिसके कारण दूसरी बार सत्ता से दूर हो गए तेजस्वी
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