Political – बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या क्यों घट रही है? 15 साल में पहली बार इतनी गिरावट- #INA

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए योजनाओं की बारिश हो रही है. मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना, मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना और अब लाडली बहना जैसी योजनाओं की एक के बाद एक घोषणाएं हो रही हैं, लेकिन अब एक चौंकाने वाला सच सामने आया है. पंद्रह साल में पहली बार बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों की तुलना में घट गई है. क्या ये महज संयोग है, या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश?
बिहार में महिला सशक्तिकरण की बात हर मंच पर होती है. सरकार की योजनाओं से लेकर चुनावी भाषणों तक – सब कहते हैं महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. लेकिन जमीनी आंकड़े कुछ और कह रहे हैं. इतनी योजनाओं, वादों और प्रचार के बावजूद – महिलाएं वोटर लिस्ट से गायब क्यों हो रही हैं?
क्या है आंकड़ों की हकीकत?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने बिहार के वोटर डेटा में एक चौंकाने वाला ट्रेंड उजागर किया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन ड्राइव के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची में बिहार में कुल 7.43 करोड़ मतदाता हैं. इनमें 3.92 करोड़ पुरुष, 3.5 करोड़ महिलाएं और 1725 तीसरे लिंग के मतदाता शामिल हैं.
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार हर एक हजार पुरुष मतदाताओं पर अब सिर्फ 892 महिला मतदाता हैं. 2020 के विधानसभा चुनाव में यह संख्या 899 थी. यानी पांच साल में सात महिला मतदाताओं की कमी प्रति हजार पुरुष मतदाता हो चुकी है. रिपोर्ट बताती है कि जिन जिलों का डेटा उपलब्ध है, उनमें से लगभग आधे जिलों में महिला मतदाताओं की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है. पंद्रह साल में पहली बार ऐसा हुआ है, जब बिहार में महिला-पुरुष मतदाता अनुपात घटा है. यह सिर्फ संख्याओं का खेल नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर सवाल है.
घटते आंकड़ों पर राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, “यह चिंताजनक है कि जब देश भर में महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ रही है, तब बिहार में यह घट रही है. इसके पीछे व्यवस्थागत खामियां हो सकती हैं.” वहीं कुछ जानकारों का मानना ये भी है कि बिहार में महिलाओं की गतिशीलता सीमित है. कई महिलाएं शादी के बाद दूसरे राज्यों में चली जाती हैं, लेकिन उनका नाम पुराने पते पर ही रहता है. जब सत्यापन होता है, तो वे मतदाता सूची से बाहर हो जाती हैं.
स्पेशल इंटेंसिव रिविजन को लेकर उठ रहे कई सवाल
चुनाव आयोग ने बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) ड्राइव की शुरुआत मतदाता सूची को अपडेट और सटीक बनाने के लिए की थी, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इस अभियान में कई जगहों पर सत्यापन प्रक्रिया में खामियां पाई गईं. कई परिवारों ने शिकायत की कि उनके घर कोई अधिकारी आया ही नहीं, लेकिन उनके नाम मतदाता सूची से गायब हो गए. खासकर प्रवासी मजदूरों और शादीशुदा महिलाओं के मामले में यह समस्या ज्यादा देखी गई.
बिहार के अट्ठाईस जिलों में से तेरह जिलों में महिला मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है. पटना, गया, मुजफ्फरपुर और दरभंगा जैसे बड़े जिलों में यह गिरावट ज्यादा चिंताजनक है. चुनाव विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं, “जब आप मतदाता सूची से नाम हटाते हैं, तो यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वास्तव में वह व्यक्ति फर्जी है या कहीं और रहने लगा है, लेकिन अगर प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है.”
महिला मतदाताओं का महत्व और राजनीतिक प्रभाव
बिहार की राजनीति में महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभाती हैं. पिछले कई चुनावों में देखा गया है कि महिलाओं का वोट बैंक किसी भी पार्टी की जीत-हार तय कर सकता है. यही वजह है कि सभी राजनीतिक दल महिलाओं के लिए खास योजनाएं लाते हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं के लिए साइकिल योजना, कन्या उत्थान योजना जैसी कई पहल की हैं. केंद्र सरकार भी उज्ज्वला योजना और दूसरी कई योजनाओं के जरिए महिलाओं को लुभाने की कोशिश करती है.
लेकिन सवाल यह है कि जब महिलाओं के लिए इतनी योजनाएं हैं, तो उनकी संख्या मतदाता सूची में क्यों घट रही है? क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही है, या इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति है? राजनीतिक रणनीतिकार और इस बार बिहार चुनाव में किस्मत आज़मा रहे प्रशांत किशोर ने एक बार कहा था, “बिहार में महिला मतदाता किसी भी चुनाव का गेम चेंजर हो सकती हैं.”
2015 और 2020 के चुनावों में महिला मतदान प्रतिशत लगातार बढ़ा था, लेकिन अब जब मतदाता सूची से ही महिलाओं के नाम कम हो रहे हैं, तो यह चिंता का विषय है. इससे न सिर्फ महिलाओं के मताधिकार पर असर पड़ेगा, बल्कि चुनाव के नतीजे भी प्रभावित हो सकते हैं.
जमीनी हकीकत और समस्याएं
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां महिलाओं को अपना नाम मतदाता सूची में न मिलने की शिकायत है. पटना की रहने वाली सुनीता देवी कहती हैं, “मैं पिछले बीस साल से यहीं रह रही हूं. हर चुनाव में वोट डाला है, लेकिन इस बार मेरा नाम सूची में नहीं है. जब पूछा तो कहा गया कि सत्यापन में आप घर पर नहीं मिलीं.”
ऐसे कई मामले हैं जहां महिलाएं काम पर जाने या घरेलू जिम्मेदारियों के चलते वेरिफिकेशन के समय घर पर नहीं थीं, और उनके नाम हटा दिए गए. कई जगहों पर नोटिस भी ठीक से नहीं दिए गए. बिहार के 28 जिलों में से तेरह जिलों में महिला मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है. पटना, गया, मुजफ्फरपुर और दरभंगा जैसे बड़े जिलों में यह गिरावट ज्यादा चिंताजनक है.
दरअसल, बिहार में महिलाओं की साक्षरता दर कम है. कई महिलाओं को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं है. जब उनका नाम सूची से हटता है, तो वे विरोध भी नहीं कर पातीं. यह एक सिस्टमैटिक भेदभाव है.
तुलनात्मक विश्लेषण और राष्ट्रीय परिदृश्य
जब हम राष्ट्रीय स्तर पर देखते हैं, तो तस्वीर अलग है. देश के ज्यादातर राज्यों में महिला मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. केरल, तमिलनाडु, और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में महिला-पुरुष मतदाता अनुपात बेहतर हो रहा है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर महिला मतदाताओं की भागीदारी में सुधार हुआ है. 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां महिला मतदान 65.3 प्रतिशत था, वहीं 2019 में यह 67.18 प्रतिशत हो गया है, लेकिन बिहार में यह उल्टी दिशा में जा रहा है. यह न सिर्फ राज्य के लिए, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है.
चुनाव विशेषज्ञ डॉ योगेंद्र यादव कहते हैं, “बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या में गिरावट एक खतरनाक संकेत है. यह दिखाता है कि हमारी चुनावी प्रक्रिया में कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं. इसे तुरंत ठीक करने की जरूरत है.”
चुनाव आयोग का पक्ष और सफाई
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) पूरी तरह से नियमों के अनुसार किया गया. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बयान में कहा, “हमने डुप्लिकेट, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं को हटाया है. यह एक नियमित प्रक्रिया है जो हर चुनाव से पहले होती है.”
आयोग का कहना है कि जिन लोगों के नाम गलती से हटे हैं, वे फॉर्म सिक्स भरकर दोबारा पंजीकरण करा सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर महिला मतदाता को इस प्रक्रिया की जानकारी है? क्या उनके पास इतना समय और संसाधन है?
चुनाव आयोग की तरफ से दावा किया गया कि हमने पूरी पारदर्शिता के साथ काम किया है. जो लोग सत्यापन में उपस्थित नहीं हुए, उनके नाम अस्थायी रूप से हटाए गए हैं. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और बयान करती है. कई इलाकों में नोटिस ठीक से नहीं पहुंचे. कई जगहों पर सत्यापन टीम ही नहीं आई.
आगे का रास्ता और समाधान
अब बिहार में घटती महिला मतदाताओं की संख्या का समाधान क्या है? विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया में और पारदर्शिता लानी होगी. राजनीतिक दलों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी.उन्हें अपने कार्यकर्ताओं के जरिए महिला मतदाताओं को जागरूक करना होगा. हर महिला को यह पता होना चाहिए कि उसका नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं.
बिहार सरकार को भी इस मुद्दे पर गंभीरता से काम करना होगा. महिला सशक्तिकरण की बात करने से पहले उनके मताधिकार की रक्षा करनी होगी. इसे लेकर कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं:
पहला – हर पंचायत और वार्ड स्तर पर मतदाता सहायता केंद्र खोले जाएं जहां महिलाएं अपनी शिकायतें दर्ज करा सकें.
दूसरा – जिन महिलाओं के नाम गलती से हटे हैं, उनके लिए फास्ट ट्रैक पंजीकरण की व्यवस्था हो.
तीसरा – स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाए, खासकर ग्रामीण इलाकों में.
चौथा – चुनाव आयोग को अपनी वेबसाइट पर हटाए गए मतदाताओं की पूरी सूची सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे.
पांचवा – महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी को इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभानी होगी.
यह सिर्फ बिहार का मुद्दा नहीं है. यह पूरे देश में मतदाता सूची की सफाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाता है. इस मामले में एक राष्ट्रीय नीति की जरूरत है जो यह सुनिश्चित करे कि किसी भी नागरिक का मताधिकार मनमाने तरीके से न छीना जाए.
तो बिहार में महिला मतदाताओं की घटती संख्या एक गंभीर मुद्दा है. यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव से जुड़ा सवाल है. क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है? या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति छिपी है? क्या आने वाले चुनावों में यह मुद्दा बड़ा विवाद बनेगा? और सबसे बड़ा सवाल – क्या बिहार की वो महिलाएं जिनके नाम मतदाता सूची से गायब हैं, समय रहते अपना मताधिकार वापस पा सकेंगी?
बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या क्यों घट रही है? 15 साल में पहली बार इतनी गिरावट
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