Political – क्या बिहार में किंगमेकर बनेंगे निषाद? ऐसे ही नहीं डिप्टी सीएम का नाम अनाउंस करा ले गए मुकेश सहनी- #INA

क्या बिहार में किंगमेकर बनेंगे निषाद? ऐसे ही नहीं डिप्टी सीएम का नाम अनाउंस करा ले गए मुकेश सहनी

बिहार विधानसभा चुनाव में निषाद समुदाय की निर्णायक भूमिका होगी.

गंगा, गंडक और कोसी के किनारों बसे गांवों से निकल रही एक नई सियासी लहर अब पूरे बिहार के राजनीतिक नक्शे को हिला रही है. वो समाज, जो दशकों तक सिर्फ नाव चलाता रहा, अब सत्ता की पतवार थामने की तैयारी में है. निषाद, यानी मल्लाह, बिंद, केवट, कश्यप और मछुआरा जातियों से जुड़ा यह समुदाय, अब बिहार की राजनीति में ऐसा वोट बैंक बन गया है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए जोखिम भरा होगा.

2023 की जातिगत जनगणना ने इस समुदाय की संख्या और ताकत दोनों को साबित कर दिया. करीब 5.5% निषाद आबादी को अगर उनके व्यापक स्वरूप में देखा जाए तो यह 9% तक पहुंचती है. यानी, बिहार की हर तीसरी विधानसभा सीट पर निषाद वोट किसी भी गठबंधन के भाग्य का फैसला कर सकता है. जो समाज कभी नदी की धारा के साथ बह जाता था, वही आज राजनीतिक धारा को मोड़ने की ताकत रखता है.

निषाद समाज: मछुआरे से मतदाता तक का सफर

निषाद समाज सदियों से जलजीवी पेशों से जुड़ा रहा है. मछली पकड़ना, नाव चलाना या नदी के किनारे व्यापार करना. यही इनकी असली पहचान है. हालांकि हालात अब बदल चुके हैं. उनकी पहचान सिर्फ ‘मल्लाह’ तक नहीं रही. वे बिहार की नई राजनीतिक चेतना का चेहरा बन चुके हैं. इस समाज ने धीरे-धीरे सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से बाहर निकलकर अपनी राजनीतिक हैसियत गढ़ी है.

जातिगत जनगणना के अनुसार, बिहार में निषाद समाज की आबादी यादव (14%) और मुस्लिम (16%) की तुलना में कम है, लेकिन उनकी एकजुटता और अनुशासित वोटिंग पैटर्न उन्हें ‘छोटा लेकिन निर्णायक’ वर्ग बनाता है. मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी, खगड़िया और भागलपुर जैसे जिलों में, जहां नदियां लोगों की जीवनरेखा हैं, वहीं निषाद वोट किसी भी प्रत्याशी के लिए जीवनदान साबित होते हैं.

Mukesh Sahani

निषाद वोट बैंक: जहां एक नाव बदल देती है समीकरण

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार की करीब 30-40 सीटों पर निषाद वोटरों की मौजूदगी निर्णायक है. 2020 के विधानसभा चुनाव में यह वोट बैंक एनडीए के पक्ष में गया था. विकासशील इंसान पार्टी (VIP) ने एनडीए के साथ मिलकर चार सीटें जीतीं और सरकार में शामिल हुई. यह पहली बार था जब निषाद समुदाय ने अपनी सामूहिक ताकत से विधानसभा में अपनी पहचान दर्ज कराई थी. अब 2025 के चुनाव की दहलीज पर खड़े बिहार में यही सवाल है कि यह नाव किस किनारे लगने वाली है. एनडीए के तट पर या महागठबंधन की धारा में.

सन ऑफ मल्लाह और नए दावेदार

निषाद राजनीति की सबसे बड़ी पहचान आज मुकेश सहनी हैं- जिन्हें पूरे बिहार में ‘सन ऑफ मल्लाह’ कहा जाता है. उन्होंने 2018 में विकासशील इंसान पार्टी बनाई और पहली बार निषाद समाज को एक मंच पर लाने में सफल रहे. उनका नारा ‘हम हैं बिहार के असली मालिक’ सीधे-सीधे उस वर्ग के आत्मसम्मान को छूता था, जो अब तक राजनीतिक चर्चाओं के हाशिए पर था.

2020 में सहनी एनडीए के साथ आए, चार सीटें जीतीं और मंत्री भी बने. 2022 में उनके रास्ते अलग हो गए और उन्होंने महागठबंधन का साथ चुनना पसंद किया. उनकी यह ‘राजनीतिक पलटी’ भले ही विवादों में रही, पर इससे यह साफ हो गया कि निषाद वोट अब किसी एक दल की ‘जेब’ में नहीं हैं. एनडीए खेमे में मदन सहनी, हरि सहनी और जेडीयू के अरविंद निषाद जैसे नेता हैं, जो स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखते हैं. वहीं कांग्रेस और राजद ने भी अपने जिलास्तरीय संगठन में इस समाज को मजबूत प्रतिनिधित्व देना शुरू किया है.

Voteee

जब नाविकों ने उठाई सियासी पतवार

बिहार में निषादों की राजनीति कोई अचानक बनी ताकत नहीं है. इसकी जड़ें सत्तर के दशक के जयप्रकाश आंदोलन और मंडल राजनीति तक जाती हैं. जेपी आंदोलन ने पिछड़े वर्गों को आवाज दी, और मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद यह समुदाय EBC (अति पिछड़ा वर्ग) के तहत आरक्षण पाने लगा. फिर भी, वर्षों तक निषाद समाज बड़े नेताओं के साए में रहा. कभी यादवों की राजनीति में दब गया, कभी सवर्ण गठजोड़ में खो गया. लेकिन बीते एक दशक में मुकेश सहनी जैसे नेताओं ने इस समाज को अपनी अलग राजनीतिक पहचान दी, जिसे अब कोई पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती.

सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका

बिहार विधानसभा की 243 सीटों में बहुमत का आंकड़ा 122 का है. 5.5% की निषाद आबादी देखने में भले छोटी लगे, लेकिन 30 से अधिक सीटों पर ये वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं. 2020 के चुनाव में एनडीए को मिली 125 सीटों में से कम से कम 20 सीटें ऐसी थीं, जहां निषाद वोटों ने परिणाम तय किए. 2025 के चुनाव में यह प्रभाव और भी गहरा होने वाला है, क्योंकि अब यह समुदाय अपने मुद्दों और मांगों को लेकर अधिक मुखर हो चुका है. राजनीतिक दलों के लिए यह समुदाय ‘किंगमेकर’ बन गया है. जो चाहे तो राजग की नाव डुबो दे या महागठबंधन को तैराकर किनारे पहुंचा दे.

निषादों की मांगें: आरक्षण, पहचान और सम्मान

निषाद समाज की प्रमुख मांगों में एक है. EBC श्रेणी में उन्हें अलग उपवर्ग के रूप में आरक्षण दिया जाए. उनका कहना है कि EBC के भीतर यादव और कुशवाहा जैसी जातियों का वर्चस्व है, जिससे छोटे समुदायों को उनका हिस्सा नहीं मिल पाता. इसके अलावा, यह समाज ‘नदी आधारित विकास बोर्ड’ की स्थापना चाहता है, जिससे मछुआरों और नाविकों के पारंपरिक व्यवसाय को आधुनिक रूप दिया जा सके. युवाओं के लिए मछली पालन, जल परिवहन और पर्यटन से जुड़े स्टार्टअप योजनाएं उनकी नई प्राथमिकता हैं.

EBC समीकरण में बढ़ती चुनौती

2023 की जातिगत जनगणना के मुताबिक, बिहार में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) की आबादी 36% है, और यदि OBC को जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 63% तक पहुंचता है. यानी, बिहार की राजनीति में अब ऊपरी जातियों या केवल यादव-मुस्लिम समीकरण की नहीं,
बल्कि EBC की भूमिका सबसे निर्णायक है. नीतीश कुमार लंबे समय से इस वर्ग के भरोसे सत्ता में बने हैं, लेकिन अब कांग्रेस-राजद गठबंधन ने भी EBC वोट बैंक में सेंध लगा दी है. निषाद वोट इसी टकराव का केंद्र बन चुके हैं और यही वोट बैंक तय करेगा कि 2025 में पटना की गद्दी किसके हिस्से आती है.

क्या बिहार में किंगमेकर बनेंगे निषाद? ऐसे ही नहीं डिप्टी सीएम का नाम अनाउंस करा ले गए मुकेश सहनी

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