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Women Voters: वोट भी महिलाओं का हक़, बिहार चुनाव में आधी आबादी की मुनादी के मायने

बिहार चुनाव और महिता मतदाता

साल 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव कई मायने में काफी अलग साबित हुआ है. पहली बार एसआईआर (SIR) की बात अब पुरानी पड़ चुकी है. फिलहाल बहस का सारा फोकस महिलाओं को दस-दस हजार रुपये दिये जाने पर आकर टिक गया है. पहले चरण के मतदान में रिकॉर्ड वोटिंग ने भी बिहार चुनाव की नई पहचान गढ़ दी. वहीं मतदान केंद्रों पर महिलाओं की लंबी-लंबी कतारें और उनके उत्साहजनक बयानों ने मूल्यांकन के समीकरण बदल दिए. पहले चरण में रिकॉर्ड करीब 64.66 फीसदी मतदान और महिलाओं के करीब 8 फीसदी ज्यादा मतदान से सत्ता किस करवट बैठेगी, ये तो 14 नवंबर को ही पता चलेगा लेकिन महिलाओं ने जिस तरह से बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, उससे सामाजिक ढांचा और लोकतंत्र को मजबूती मिली है.

बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या करीब 3.5 करोड़ है, सरकार के दावों के मुताबिक इनमें करीब डेढ़ करोड़ महिलाओं को दस-दस हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए गए हैं. बिहार में महिला साक्षरता की दर करीब 52 फीसदी है. बिहार की सामाजिक स्थिति बताती है गुजरे ज़माने में यहां महिलाएं वोट करने कम ही निकलती थीं. वोट के लिए महिलाओं का दहलीज लांघना और घूंघट उठाना घर के पुरुषों को गंवारा नहीं था. महिलाएं भी हिम्मत कम ही कर पाती थीं लेकिन मतदाता पहचान पत्र और ईवीएम क्रांति के बाद बूथ के नजारे तेजी से बदलने लगे.

2010 से ही बढ़ने लगी महिला वोटर्स की संख्या

गौर करें तो बिहार में साल 2025 के विधानसभा चुनाव में अचानक ही महिलाओं वोटर्स की संख्या नहीं बढ़ी है. महिलाओं का ऐसा टर्नआउट पिछले कई चुनावों में बिहार में देखा जा रहा है. पिछले पंद्रह साल में बूथों पर महिला वोटर्स की शक्ति लगातार बढ़ी है. महिला वोटर्स की बढ़ती संख्या को नीतीश कुमार की योजनाओं से जोड़कर देखा जाना गलत नहीं होगा. शराबबंदी, साइकिल और जीविका दीदी जैसी योजनाओं को महिलाओं ने खूब पसंद किया है. इन योजनाओं के आने के बाद बिहार की महिलाएं घरों से निकलकर वोट करने लगीं. इस बार महिलाओं की बढ़ोत्तरी को भी मुख्यमंत्री रोजगार योजना का करिश्मा बताया जा रहा है.

बिहार जातीय जनगणना की रिपोर्ट के मुताबिक यहां का लिंगानुपात 953 है. यानी 1000 पुरुषों पर 953 महिलाएं.पिछले चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो बिहार में सबसे पहले साल 2010 में महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले सबसे ज्यादा वोट किया था. इस साल पुरुषों ने 51.11 फीसदी वोट किए जबकि महिलाओं ने 54.44 फीसदी भागीदारी निभाई. वहीं साल 2015 में महिलाओं ने 60.57 फीसदी वोट किया था, जबकि पुरुषों ने 53.32 फीसदी वोट किया. इसी तरह साल 2020 के विधानसभा चुनाव में पुरुषों ने 54.68 फीसदी तो महिलाओं ने 59.58 फीसदी वोट किया था. अब दूसरे चरण के मतदान के बाद सारे आंकड़े देखने को मिलेंगे.

लोकसभा चुनाव में भी महिला वोटर्स बढ़ीं

बिहार के बाहर की बात करें तो लोकसभा का चुनाव हो या अन्य राज्यों के विधानसभा का चुनाव, महिला केंद्रित योजनाओं ने वोट फीसदी बढ़ाने में अपनी जबरदस्त भागीदारी दिखाई है. 2024 के लोकसभा चुनाव को ही देखें तो इलेक्शन कमीशन के मुताबिक इस साल कुल 64.4 करोड़ मतदाताओं ने वोट किया था, जिनमें पुरुषों ने 65.55 फीसदी तो महिलाओं ने 65.78 फीसदी मतदान दिया था. वहीं पिछले छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में 77.48 लाख पुरुषों ने वोट किए थे तो 78.12 लाख महिला मतदाताओं ने वोट डाले.

हालांकि इस तस्वीर का एक दूसरा रुख भी है. जिस मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना ने भाजपा सरकार बनाने में गेमचेंजर की भूमिका निभाई, वहां महिलाओं का मतदान फीसदी पुरुषों के मुकाबले कम ही रहा. मध्य प्रदेश में पुरुषों ने 78.2 फीसदी मतदान किए थे जबकि महिलाओं का मतदान 76.03 फीसदी रिकॉर्ड किया गया. यानी करीब 2 फीसदी महिलाओं का वोट कम था.

मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र में तकरीबन बराबरी

इसी तरह लाड़की बहना योजना को लेकर चर्चा में रहे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी 65 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले जबकि 66.84 फीसदी पुरुष मतदाताओं ने वोट किए थे. यह अंतर भी मामूली था. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इन दोनों ही राज्यों में भाजपा की जीत में महिला योजना का अहम योगदान था. अब पक्ष-विपक्ष की राजनीति के इतर सोचें तो महिलाओं के जागरूक होने, आत्मनिर्भर बनने और उनकी साक्षरता बढ़ने में पूरे समाज का ही विकास निहित है. महिलाओं का वोट फीसदी बढ़ना या पुरुषों के वोट फीसदी की बराबरी तक पहुंचना सामाजिक जागरुकता की पहचान है.

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