डीएम सविन बंसल पर गंभीर आरोप: महिला अधिकारियों पर अनावश्यक दबाव?, सवालों से दूरी और डीएम की रहस्यमयी गतिविधियां

देहरादून, जिले के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी जिलाधिकारी (DM) सविन बंसल इन दिनों गंभीर आरोपों और सवालों के घेरे में हैं। मामला अब सिर्फ प्रशासनिक कार्यशैली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिला अधिकारियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने, वेतन रोकने, बार-बार स्पष्टीकरण मांगने और जवाबदेही से बचने जैसे आरोपों ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है।

महिला अधिकारियों पर कार्रवाई: प्रक्रिया या दबाव?

सूत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, एक महिला अधिकारी का वेतन बिना किसी विभागीय जांच के अंतिम निष्कर्ष के रोका गया, जबकि सेवा नियमों के तहत यह एक गंभीर और असाधारण कदम माना जाता है।
इसके अलावा, एक अन्य महिला अधिकारी से एक ही विषय पर बार-बार लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया।

सवाल उठता है—
क्या यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है? या फिर मानसिक दबाव बनाकर “अनुशासन” के नाम पर डर पैदा करने की रणनीति? प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि बार-बार नोटिस और वेतन रोकना सुधार का नहीं, बल्कि नियंत्रण और भय का तंत्र बनता जा रहा है।

सवालों से दूरी: न फोन उठा, न बयान

जब इस पूरे मामले पर डीएम सविन बंसल से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया,तो फोन कॉल रिसीव नहीं की गई,और कार्यालय में भी किसी तरह का आधिकारिक बयान देने से बचते नजर आए। हालांकि यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि जिलाधिकारी का कोई पक्ष या बयान सामने आता है, तो उसे पूरी निष्पक्षता के साथ प्रकाशित किया जाएगा।

डीएम कैंप में SDM की मौजूदगी: प्रशासनिक रहस्य

मामले ने उस वक्त और गंभीर मोड़ ले लिया जब यह जानकारी सामने आई कि डीएम की गैरमौजूदगी में SDM हरिगिरी डीएम ऑफिस के आमीन के साथ डीएम कैंप में बैठे पाए गए। इससे कई सवाल खड़े होते हैं—डीएम के अनुपस्थित रहते हुए SDM किस अधिकार या आदेश के तहत डीएम कैंप में कार्य कर रहे थे?क्या इसके लिए कोई लिखित या मौखिक आदेश मौजूद है? यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक अनुशासन की खुली अवहेलना नहीं तो और क्या है? इस संबंध में अब तक न तो डीएम कार्यालय और न ही SDM हरिगिरी आमीन की ओर से कोई स्पष्ट जवाब सामने आया है।

सुशासन या तानाशाही?

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि सवालों से बचना, फोन न उठाना,जवाब न देना, और बिना स्पष्ट आदेश के अधिकारों का प्रयोग— ये सभी सुशासन के नहीं, बल्कि प्रशासनिक तानाशाही की ओर इशारा करते हैं।

अब जनता और प्रशासनिक गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है— इसे जवाबदेही से भागना कहा जाए या सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन?

अब निगाहें शासन पर

अब देखना यह होगा कि क्या शासन इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएगा? या फिर एक प्रभावशाली IAS अधिकारी को बचाने के लिए सवालों को दबा दिया जाएगा? यदि आरोप निराधार हैं, तो डीएम सविन बंसल को चाहिए कि वे वेतन रोकने के आदेशों का कानूनी आधार स्पष्ट करें,डीएम कैंप में SDM की मौजूदगी पर स्थिति साफ करेंऔर यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ एक जिले का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और महिला सम्मान का राज्यस्तरीय सवाल बन जाएगा।

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