देहरादून में संडे बाजार शिफ्टिंग बना प्रशासनिक हठधर्मिता का उदाहरण — जनता की अनदेखी, भू-माफियाओं को खुला संरक्षण, डीएम के फैसले पर उठे गंभीर सवाल

देहरादून। संडे बाजार को रेंजर्स ग्राउंड से हटाकर आईएसबीटी के पास शिफ्ट करने का जिला प्रशासन का फैसला अब केवल एक “प्रशासनिक आदेश” नहीं रहा, बल्कि यह जनता बनाम प्रशासन की सीधी टकराहट का रूप लेता जा रहा है। इस फैसले ने न सिर्फ शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर प्रशासन की समझ पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी उजागर किया है कि कैसे जमीनी सच्चाई और जनहित को ताक पर रखकर निर्णय थोपे जा रहे हैं।

जिलाधिकारी सविन बंसल के निर्देश पर जारी आदेश में जिस भूमि को “खाली” बताया गया है, वहां हकीकत में एमडीडीए की नर्सरी संचालित है। सवाल यह है कि क्या जिलाधिकारी को अपने ही विभागों की जमीनी स्थिति की जानकारी नहीं, या फिर जानबूझकर तथ्यों को नजरअंदाज किया गया? जिस नर्सरी को स्थानीय नागरिक ग्रीन बेल्ट मानते हैं, उसी को उजाड़कर वहां संडे बाजार लगाने की तैयारी प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाती है।

एक जाम हटाकर दूसरा जाम थोपने की तैयारी
रेंजर्स ग्राउंड से संडे बाजार हटाने का तर्क ट्रैफिक जाम बताया गया, लेकिन आईएसबीटी क्षेत्र पहले से ही देहरादून का सबसे बड़ा जाम ज़ोन है। रोज़ाना घंटों वाहन रेंगते हैं, आम जनता त्रस्त है और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। अब उसी क्षेत्र में हजारों दुकानदारों और ग्राहकों वाला संडे बाजार थोपना किस सोच का परिणाम है?
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे शुरू होते ही इस क्षेत्र पर वाहनों का दबाव और बढ़ेगा, लेकिन जिला प्रशासन मानो शहर को ट्रैफिक नरक बनाने पर आमादा है।

जनता की आपत्ति, प्रशासन की हठधर्मिता
एमडीडीए कॉलोनी की रेजिडेंट्स वेलफेयर सोसाइटी खुलकर विरोध कर रही है। उनका कहना साफ है कि बाजार से अव्यवस्था, कूड़ा, शोर और असुरक्षा बढ़ेगी। बावजूद इसके प्रशासन ने न तो जनसुनवाई की, न आपत्तियों को महत्व दिया। यह साफ संकेत है कि फैसले जनता के लिए नहीं, बल्कि कागज़ी सुविधा और कुछ खास हितों को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं।

रिंग रोड क्यों नहीं? क्योंकि वहां भू-माफिया बैठे हैं!
सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि जब रिंग रोड जैसे खुले, चौड़े और कम आबादी वाले क्षेत्र उपलब्ध हैं, तो प्रशासन वहां संडे बाजार क्यों नहीं लगाता? जवाब सीधा है—क्योंकि वहां भू-माफियाओं का कब्जा है।
रिंग रोड क्षेत्र की अधिकांश जमीनें सीलिंग एक्ट के तहत सरकार में निहित हैं, लेकिन आज भी उन पर माफिया कब्जा जमाए बैठे हैं। प्रशासन न तो कब्जे हटवा पाया, न ही फर्जी रजिस्ट्री और सेल डीड रद्द करवा सका। आरोप है कि इन्हीं भू-माफियाओं को संरक्षण देने के लिए प्रशासन जानबूझकर रिंग रोड विकल्प से भाग रहा है।

यदि प्रशासन में इच्छाशक्ति होती तो इन सरकारी जमीनों को मुक्त कर संडे बाजार के लिए अधिसूचित किया जा सकता था। इससे न सिर्फ माफियाओं पर लगाम लगती, बल्कि शहर को स्थायी समाधान भी मिलता। लेकिन ऐसा करना शायद कुछ लोगों के हितों के खिलाफ चला जाता।

डीएम सविन बंसल की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न
इस पूरे प्रकरण ने जिलाधिकारी सविन बंसल की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि वे समस्या का समाधान नहीं, बल्कि विवाद खड़ा करने वाले फैसले ले रहे हैं। न तो वैकल्पिक स्थलों पर गंभीर अध्ययन हुआ, न ट्रैफिक विशेषज्ञों की राय ली गई, और न ही आम जनता की सुनी गई।

आज स्थिति यह है कि एक गलत फैसले ने हजारों नागरिकों को सड़क पर विरोध के लिए मजबूर कर दिया है। सवाल उठता है—क्या जिला प्रशासन भू-माफियाओं के डर से काम कर रहा है, या फिर जानबूझकर आम जनता की परेशानी बढ़ाई जा रही है?

अब यह मुद्दा सिर्फ संडे बाजार का नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और जनहित की कसौटी बन चुका है। यदि प्रशासन ने समय रहते फैसला नहीं बदला, तो यह विरोध आने वाले दिनों में और उग्र रूप ले सकता है।

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