Sport : EXPLAINER: क्या है साउथ अफ्रीका क्रिकेट में 'कोटा सिस्टम'? कब और क्यों हुई थी इसकी शुरुआत #INA

Quota System In South Africa Cricket: साउथ अफ्रीका क्रिकेट में कोटा सिस्टम चलता है, जिसके बारे क्रिकेट फैंस को शायद ही मालूम होगा. प्रोटियाज क्रिकेट में जब भी टीम में खिलाड़ियों के चयन, नस्लीय प्रतिनिधित्व या टेम्बा बावुमा जैसे खिलाड़ियों की भूमिका पर बहस होती है, तब यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ जाता है. कुछ लोग इसे ऐतिहासिक नस्लीय असमानता को दूर करने और अश्वेत खिलाड़ियों को अवसर देने का जरूरी प्रयास मानते हैं, जबकि आलोचकों का सवाल है कि क्या टीम में जगह देने का आधार केवल प्रदर्शन होना चाहिए या प्रतिनिधित्व भी मायने रखता है? शायद ही आपको इस बात की जानकारी हो कि टीम के टेस्ट कैप्टन टेम्बा बावुमा को भी शुरुआत में कोटा सिस्टम के तहत ही टीम में शामिल किया गया था. हालांकि, उन्होंने तो अफ्रीकी क्रिकेट का इतिहास ही बदलकर रख दिया और अपने देश को पहली आईसीसी ट्रॉफी जिताने वाले कप्तान बन गए. तो आइए इस आर्टिकल में हम आपको कोटा सिस्टम के बारे में विस्तार से बताते हैं.

क्या है साउथ अफ्रीका क्रिकेट का कोटा सिस्टम?

साउथ अफ्रीका क्रिकेट में जिस व्यवस्था को आमतौर पर ‘कोटा सिस्टम’ कहा जाता है, उसे क्रिकेट साउथ अफ्रीका की व्यापक ट्रांसफॉर्मेशन पॉलिसी के बारे में समझना चाहिए. इसका उद्देश्य राष्ट्रीय और घरेलू टीमों में देश की विविध आबादी का प्रतिनिधित्व बढ़ाना और उन खिलाड़ियों को अवसर देना है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से क्रिकेट के ढांचे में बराबरी के मौके नहीं मिले. 

इस नीति के तहत खिलाड़ियों के प्रतिनिधित्व से जुड़े लक्ष्य तय किए गए हैं. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि राष्ट्रीय टीम और घरेलू क्रिकेट के नियम एक जैसे नहीं हैं. राष्ट्रीय टीम के लिए निर्धारित लक्ष्य पूरे सीजन के मैचों के औसत के आधार पर देखे जाते हैं, जबकि घरेलू क्रिकेट में संबंधित प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार हर मैच की टीम पर शर्तें लागू हो सकती हैं. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर इंटरनेशनल मैच में एक ही संख्या में खिलाड़ियों को चुनना अनिवार्य है.

कोटा सिस्टम की शुरुआत क्यों हुई?

साउथ अफ्रीका में क्रिकेट का इतिहास नस्लीय भेदभाव से काफी प्रभावित रहा है. रंगभेद के दौर में अश्वेत खिलाड़ियों को क्रिकेट सहित कई खेलों में बराबरी के अवसर नहीं मिले. गेम की फैसिलिटीज, ट्रेनिंग और उच्च स्तर तक पहुंचने के रास्तों में भी असमानताएं थीं.

1994 में डोमेस्टिक चेंज के बाद खेलों में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई. साउथ अफ्रीका के इंटरनेशनल क्रिकेट में वापसी के बाद क्रिकेट प्रशासन ने ऐसी नीतियां बनानी शुरू कीं, जिनसे ऐतिहासिक असमानता को कम किया जा सके. 1998 में क्रिकेट में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए लक्ष्य तय किए गए थे. बाद में नीतियों में बदलाव हुए और 2007 में उस समय का पुराना कोटा लक्ष्य हटा दिया गया. इसके बाद भी ट्रांसफॉर्मेशन का मुद्दा क्रिकेट प्रशासन की प्राथमिकताओं में बना रहा.

इस नीति का मकसद सिर्फ राष्ट्रीय टीम में खिलाड़ियों की संख्या बदलना नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर टैलेंट प्लेयर्स को ट्रेनिंग, फैसिलिटीज और आगे बढ़ने के मौके देना भी है.

टीम में कितने खिलाड़ियों के प्रतिनिधित्व का लक्ष्य है?

साउथ अफ्रीका के राष्ट्रीय और घरेलू क्रिकेट में प्रतिनिधित्व से जुड़े लक्ष्य अलग-अलग हैं. रिपोर्ट्स की मानें, तो राष्ट्रीय टीम के लिए एक टीम में कम से कम 6 रंगभेद से प्रभावित समुदायों के खिलाड़ियों को शामिल करने का लक्ष्य था, जिनमें कम से कम दो अश्वेत अफ्रीकी (Black Players) खिलाड़ी होने चाहिए थे. यह लक्ष्य हर मैच की प्लेइंग इलेवन पर अलग से लागू होने के बजाय पूरे सीजन के औसत से आंका जाता था.

घरेलू क्रिकेट में ज्यादा साफ हैं. मार्च 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू टीमों के लिए छह अश्वेत खिलाड़ियों (Black Players) को शामिल करने का प्रावधान है, जिनमें कम से कम तीन अश्वेत अफ्रीकी खिलाड़ी होने चाहिए. नियमों का पालन नहीं करने पर टीमों को अंक गंवाने जैसी सजा भी मिल सकती है.

‘कोटा प्लेयर’ कहकर क्यों निशाना बनाया जाता है?

बावुमा को लेकर बहस का एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा है कि उनके प्रदर्शन पर सवाल उठने के साथ-साथ कई बार उन्हें ‘कोटा प्लेयर’ भी कहा गया. इस शब्द का इस्तेमाल यह संकेत देने के लिए किया जाता है कि किसी खिलाड़ी को उसकी प्रतिभा या प्रदर्शन के बजाय प्रतिनिधित्व के लक्ष्य वाले कोटा के कारण चुना गया है. 

बावुमा ने खुद इस तरह की आलोचना का अनुभव साझा किया है. BBC की एक रिपोर्ट में उन्होंने कहा कि जब रंगभेद से प्रभावित समुदायों के खिलाड़ी रन नहीं बनाते या विकेट नहीं लेते, तो उन्हें ‘कोटा प्लेयर’ कहे जाने का सामना करना पड़ सकता है. उनके मुताबिक, इससे प्रदर्शन पर होने वाली सामान्य आलोचना में नस्ल से जुड़ा अतिरिक्त दबाव भी जुड़ जाता है.

हालांकि, किसी खिलाड़ी को केवल उसकी नस्ल या प्रतिनिधित्व के आधार पर कमजोर मान लेना उचित नहीं है. खिलाड़ी के चयन और प्रदर्शन का आकलन उसके आंकड़ों, भूमिका, फिटनेस और टीम की जरूरतों के आधार पर होना चाहिए.

टेम्बा बावुमा ने साउथ अफ्रीका को जिताई ICC ट्रॉफी

टेम्बा बावुमा की कप्तानी में साउथ अफ्रीका ने इंतजार खत्म करते हुए 2025 में पहली बार ICC वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप का खिताब जीता. 14 जून 2025 को लॉर्ड्स में खेले गए फाइनल में साउथ अफ्रीका ने ऑस्ट्रेलिया को 5 विकेट से हराया. जीत के लिए मिले 282 रन के लक्ष्य को टीम ने 5 विकेट खोकर हासिल किया.

इस ऐतिहासिक जीत में एडेन मार्करम ने 136 रन की शानदार पारी खेली, जबकि बावुमा ने दूसरी पारी में 66 रन का अहम योगदान दिया. हैमस्ट्रिंग की परेशानी के बावजूद बावुमा ने संघर्ष जारी रखा. उनकी कप्तानी में मिली इस सफलता ने साउथ अफ्रीका को 1998 के बाद पहला सीनियर पुरुष ICC खिताब दिलाया.

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