Technology, 6000 मीटर फतह करने वाला पहला ह्यूमनॉइड बना पेंबा: अब माउंट एवरेस्ट पर जाकर करेगा यह काम, क्या है पूरा प्लान? — INA

छह हजार मीटर ऊंचे ज्वालामुखी पर चढ़कर इतिहास रचने वाला ह्यूमनॉइड रोबोट अब माउंट एवरेस्ट की तैयारी में है। आपको बता दें Pemba (पेंबा) नाम के इस ह्यूमनॉइड रोबोट ने जमा देने वाली कंपाती ठंड और ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच ज्वालामुखी की ढलानों को पार किया, हालांकि सबसे दुर्गम और तकनीकी रूप से कठिन हिस्सों में टीम के सदस्यों को इसे सहारा भी देना पड़ा। इसे बनाने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तो बस शुरुआत है, उनके अगले बड़े लक्ष्यों में माउंट एवरेस्ट, फिर चांद और अंत में मंगल ग्रह पर कदम रखना शामिल है।

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1.32 मीटर ऊंचे और 35 किलोग्राम वजनी ह्यूमनॉइड रोबोट पेंबा ने इतिहास रचते हुए इक्वाडोर के बर्फीले और बेहद खतरनाक चिंबोराजो ज्वालामुखी पर छह हजार मीटर से अधिक की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक चढ़ाई पूरी कर ली है। इसी के साथ इतनी ऊंचाई पर पहुंचने वाला यह दुनिया का पहला ह्यूमनॉइड रोबोट भी बन गया है।

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अब अगला लक्ष्य क्या है?

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पेंबा को बनाने वाली टीम का कहना है कि अभी यह केवल शुरुआत है। अगला लक्ष्य माउंट एवरेस्ट पर इस ह्यूमनॉइड की क्षमता का परीक्षण करना है। इसके बाद इसकी तकनीक को चंद्रमा और मंगल ग्रह जैसे मिशनों में भी इस्तेमाल करने की योजना बनाई जा रही है।

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नेपाल में क्यों भेजा जाएगा यह रोबोट?

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नेपाल में प्रस्तावित इस परियोजना का उद्देश्य केवल रिकॉर्ड बनाना नहीं है। बल्कि पेंबा को एवरेस्ट पर कई महत्वपूर्ण काम भी सौंप जाएंगे। योजना के अनुसार इनमें यह काम शामिल हैं…

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  • पर्वत पर फैला कचरा इकट्ठा करना।

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  • पर्यावरण संबंधी डेटा जुटाना।

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  • खतरनाक इलाकों की निगरानी करना।

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  • अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रोबोट की क्षमता का परीक्षण करना।

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  • इस परियोजना को एक अमेरिकी गैर-लाभकारी संगठन और एक नेपाली एक्सपीडिशन कंपनी ने मिलकर प्रस्तावित किया है।

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एवरेस्ट पर कैसे पहुंचेगा रोबोट?

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  • प्रस्ताव के अनुसार, पेंबा को अलग-अलग हिस्सों में पर्वत पर ले जाया जाएगा। इसके बाद बेस कैंप (5,364 मीटर) से लेकर कैंप-IV (7,920 मीटर) तक विभिन्न स्थानों पर इसे दोबारा असेंबल किया जाएगा।

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  • फिर अनुमान के अनुसार यह अपनी मैकेनिकल भुजाओं की मदद से छोटे-छोटे कचरे जैसे पुराने उपकरण और खाने के पैकेट इकट्ठा करेगा।

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क्या कोई चुनौती भी हो सकती है?

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  • हां, बिल्कुल…उंट एवरेस्ट पर तापमान कई बार -20 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है। इतनी ठंड में रोबोट की बैटरियां प्रभावित हो सकती हैं।

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  • इसी वजह से इंजीनियर इसमें हीटेड बैटरी कंपार्टमेंट और स्पेसक्राफ्ट में इस्तेमाल होने वाले एक खास लुब्रिकेंट का उपयोग करने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि मशीन अत्यधिक ठंड में भी काम करती रहे।

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संतुलन कौन संभालेगा?

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  • पेंबा असमान और फिसलन भरी जमीन पर अपने कदम को खुद एडजस्ट या संतुलित कर सके, इसके लिए टीम मशीन लर्निंग आधारित सिस्टम पर काम कर रही है। 

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  • ऊंचाई वाले इलाकों में मोबाइल नेटवर्क नहीं होने की वजह से कम ऊंचाई पर सैटेलाइट कनेक्टिविटी का इस्तेमाल किया जाएगा, जबकि ऊंचाई बढ़ने पर रोबोट अपनी ऑटोनॉमस यानी स्वायत्त क्षमता के आधार पर काम करेगा।

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नेपाल के सामने कानूनी चुनौती

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  • इस परियोजना के सामने सबसे बड़ी बाधा तकनीक नहीं, बल्कि कानून है। फिलहाल नेपाल में गैर-मानवीय पर्वतारोहियों या रोबोट के लिए कोई कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं है। इसी वजह से पहले इस मिशन को अनुमति नहीं मिल सकी।

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  • नेपाल सरकार अब सुरक्षा मानकों, संचालन प्रक्रिया और परमिट शुल्क को लेकर नया कानूनी ढांचा तैयार करने पर विचार कर रही है।

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कितना खर्च आ सकता है?

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  • इससे जुड़े एक्सपर्ट्स का कहना है कि परमिट और अभियान की अवधिक के आधार पर इस मिशन की लागत करीब दो लाख से पांच लाख अमेरिकी डॉलर यानी  लगभग 1.7 करोड़ से 4.2 करोड़ रुपये तक हो सकती है।

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  • अगर नेपाल में जरूरी नियम लागू हो जाते हैं, तो इस रोबोट का परीक्षण अगले सितंबर-नवंबर या सर्दियों में (दिसंबर 2026 से फरवरी 2027) के दौरान किया जा सकता है।

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पेंबा को लेकर क्या उम्मीदें?

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इस ह्यूमनॉइड को लेकर डेवलपर्स के मन में कई उम्मीदें हैं। उनका मानना है कि अगर पेंबा सफलतापूर्वक एवरेस्ट जैसे चुनौतीपूर्ण वातावरण में काम कर लेता है, तो भविष्य में इसका इस्तेमाल केवल पर्वतारोहण तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसे रोबोटों का उपयोग बचाव अभियान, वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण निगरानी और भविष्य के चंद्रमा एवं मंगल मिशनों में भी किया जा सकता है।

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