Technology, Smartwatch Heart Rate Accuracy: कलाई पर बंधी घड़ी कैसे गिनती है आपकी धड़कन? जानें हार्ट रेट सेंसर की तकनीक — INA

हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया था, जहां एक व्यक्ति ने अपनी जान बचाने का श्रेय एपल वॉच (Apple Watch) को दिया। उसका कहना था कि उसके बेहोश होते ही स्मार्टवॉच ने इमरजेंसी सेवाओं को कॉल कर दिया, जिससे समय पर इलाज मिलने से उसकी जान बच सकी।

यह घटना साबित करती है कि आजकल स्मार्टवॉच सिर्फ समय देखने की डिवाइस नहीं रह गई हैं, बल्कि हेल्थ और फिटनेस ट्रैकिंग इनकी सबसे बड़ी खूबी बन चुकी है। ये वॉच आपके कदमों की संख्या, कैलोरी बर्न, स्ट्रेस लेवल, नींद की क्वालिटी और हार्ट रेट जैसी कई चीज़ों को सटीकता से ट्रैक करती हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर कलाई पर बंधी एक छोटी-सी स्मार्टवॉच हमारे दिल की धड़कन का पता कैसे लगाती है? आइए समझते हैं।

Heart Rate स्मार्टवॉच कैसे मापती है ?


  • एक्सपर्ट्स कहते हैं कि स्मार्टवॉच में हार्ट रेट मापने के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें सबसे आम PPG यानी फोटोप्लेथिस्मोग्राफी (Photoplethysmography) ऑप्टिकल हार्ट रेट मॉनिटर है। इसके अलावा कई प्रीमियम स्मार्टवॉच में ECG यानी इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम सेंसर भी दिया जाता है।

  • PPG सेंसर खून के बहाव में होने वाले बदलाव को ऑप्टिकल तरीके से पहचानता है, जबकि ECG सेंसर दिल की धड़कन से जुड़े इलेक्ट्रिकल सिग्नल को मापता है।

पीपीजी सेंसर कैसे करता है काम?


  • पीपीजी स्मार्टवॉच में इस्तेमाल होने वाली सबसे सामान्य हार्ट रेट मॉनिटरिंग तकनीकों में से एक है। इसमें स्मार्टवॉच की पिछली तरफ लगे सेंसर त्वचा पर रोशनी डालते हैं और वापस आने वाली रोशनी में होने वाले बदलाव को रिकॉर्ड करते हैं।

  • दिल की प्रत्येक धड़कन के साथ शरीर में ब्लड फ्लो बदलता है। इसी वजह से त्वचा के नीचे मौजूद कैपिलरीज यानी बेहद छोटी रक्त वाहिकाएं फैलती और सिकुड़ती हैं।

स्मार्टवॉच इसी बदलाव को पकड़ती है।


  • वॉच त्वचा पर ग्रीन लाइट डालती है और सेंसर यह देखता है कि कितनी रोशनी वापस लौट रही है। जब कैपिलरीज में खून की मात्रा बढ़ती है तो ज्यादा ग्रीन लाइट अवशोषित होती है। जब खून की मात्रा कम होती है तो अपेक्षाकृत ज्यादा रोशनी वापस सेंसर तक पहुंचती है।

  • इस बदलाव को लगातार रिकॉर्ड करके स्मार्टवॉच यह अनुमान लगाती है कि दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है और फिर इसे हार्ट रेट के रूप में स्क्रीन पर दिखाती है।

पीपीजी में ग्रीन लाइट का ही इस्तेमाल क्यों?


  • इसके पीछे खून और रोशनी के बीच होने वाली प्रतिक्रिया अहम है। हमारे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर लाल दिखाई देता है और कुछ खास वेवलेंग्थ की रोशनी को ज्यादा अवशोषित करता है।

  • ग्रीन लाइट इस बदलाव को पहचानने के लिए उपयोगी होती है। जब कैपिलरी में खून की मात्रा बढ़ती है, तो ग्रीन लाइट का ज्यादा हिस्सा अवशोषित हो जाता है और सेंसर तक कम रोशनी लौटती है।

  • जब कैपिलरी में खून की मात्रा कम होती है, तो ज्यादा ग्रीन लाइट वापस सेंसर तक पहुंच सकती है। इसी अंतर को रिकॉर्ड करके पीपीजी सेंसर हार्ट बीट का पैटर्न तैयार करता है।

  • ग्रीन लाइट का एक और फायदा यह है कि यह त्वचा में दूसरी कुछ रंगों की रोशनी की तुलना में ज्यादा गहराई तक नहीं जाती। इससे सेंसर त्वचा की सतह के पास होने वाले ब्लड-फ्लो बदलावों को पकड़ सकता है।

ECG सेंसर क्या करता है?


  • ECG यानी इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम तकनीक PPG से अलग तरीके से काम करती है। इसमें स्मार्टवॉच दिल की धड़कन से जुड़े इलेक्ट्रिकल सिग्नल को मापती है।

  • इसके लिए सेंसर का त्वचा के संपर्क में रहना जरूरी होता है। जब सेंसर त्वचा से संपर्क में रहता है, तब यह दिल की धड़कन के साथ होने वाले इलेक्ट्रिकल बदलावों को रिकॉर्ड करता है।

  • इसके आधार पर हार्ट रेट की गति और उसकी टाइमिंग का पता लगाया जा सकता है।

  • ECG तकनीक का एक बड़ा फायदा यह है कि यह हार्ट रेट में होने वाली कुछ अनियमितताओं को भी पहचान सकती है। जैसे मान लीजिए यह एट्रियल फिब्रिलेशन जैसी अनियमित हार्ट रिदम का पता लगाने में मदद कर सकती है।

  • पीपीजी मॉनिटर में यह क्षमता उसी तरह उपलब्ध नहीं होती।

ईसीजी और पीपीजी में कौन बेहतर?


  • सटीकता की बात करें तो ईसीजी हार्ट रेट मॉनिटर को आम तौर पर ज्यादा सटीक माना जाता है। हालांकि, रोज के हेल्थ और फिटनेस ट्रैकिंग में पीपीजी भी काफी उपयोगी है।

  • पीपीजी सेंसर की रीडिंग कुछ बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है। हाथ की ज्यादा हलचल, त्वचा पर टैटू और डार्क स्किन जैसे फैक्टर इसकी सटीकता को प्रभावित कर सकते हैं।

  • इसलिए अगर किसी यूजर की प्राथमिकता ज्यादा सटीक हार्ट रेट मॉनिटरिंग और इलेक्ट्रिकल हार्ट रिदम से जुड़ी जानकारी है, तो ECG सेंसर वाली स्मार्टवॉच पर विचार किया जा सकता है।

स्मार्टवॉच की हार्ट रेट रीडिंग हमेशा सही क्यों नहीं होती?

स्मार्टवॉच शरीर से सेंसर के जरिए डेटा लेती है, इसलिए सेंसर और त्वचा के बीच संपर्क, हाथ की हलचल और त्वचा की स्थिति जैसे फैक्टर रीडिंग को प्रभावित कर सकते हैं। इसी वजह से स्मार्टवॉच की हार्ट रेट रीडिंग को हर परिस्थिति में मेडिकल टेस्ट का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

स्मार्टवॉच में हार्ट रेट ट्रैकिंग क्यों जरूरी है?


  • हार्ट रेट की लगातार निगरानी से यूजर को अपनी एक्टिविटी और फिटनेस के बारे में जानकारी मिल सकती है। रेस्टिंग हार्ट रेट में होने वाले बदलावों से एक्टिविटी लेवल और स्ट्रेस जैसी चीजों का अंदाजा लगाने में मदद मिल सकती है। इसी डेटा का इस्तेमाल स्मार्टवॉच कई दूसरे हेल्थ और फिटनेस फीचर्स के साथ भी करती हैं।

  • यानी कलाई पर लगी स्मार्टवॉच सिर्फ आपकी धड़कन गिनने का काम नहीं करती, बल्कि पीपीजी और ईएसजी जैसी तकनीकों की मदद से शरीर से जुड़े कई डेटा को समझने की कोशिश करती है।

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