Nation- धराली में फटा बादल, गंगोत्री का रास्ता बंद, जलजले से विशालकाय झील बन गई भागीरथी!- #NA

धराली में तबाही.
गंगोत्री से 20 किमी पहले धराली में बादल फट (Cloud Burst) गया और यह सिलसिला रुका नहीं बल्कि हर्षिल, सुक्खी टॉप तक चला गया. भागीरथी नदी (गंगा) ने यहां अपना प्रलयंकारी रूप धारण कर लिया है और बाल कंढ़ार मंदिर तक नदी ने झील का आकार ले लिया है. असंख्य घर, होटल, होम स्टे, मंदिर आदि तबाह हो गए हैं. 4 अगस्त को सावन का आख़िरी सोमवार था इसलिए गंगोत्री की भीड़ अभी निकल नहीं पाई थी कि रात पौने दो बजे यह हादसा हो गया.
धराली का कल्प केदार मंदिर खत्म हो गया है. सैकड़ों वाहन फंसे पड़े हैं. यात्री लापता हैं. आपदा राहत कितनी भी त्वरित क्यों न हो गंगोत्री से उत्तरकाशी जाने वाला राजमार्ग आनन-फानन में दुरुस्त होने से रहा. हर्षिल का आर्मी बेस कैम्प भी बेहाल है. धराली और सुक्खी टॉप के बीच दो हेलिकॉप्टर के बेस प्लेटफ़ॉर्म (हेलीपैड) हैं, वे भी नष्ट हो गए हैं.
नदी की तलहटी में मकान-दूकान क्यों!
जब यह हादसा हुआ तब धराली में सैकड़ों की भीड़ रहने का अनुमान है. इसके अलावा हर्षिल घाटी में भी पर्यटक जुटते हैं. किसी को अवसर नहीं मिला कि वह ज़ान बचा कर भाग सके. बादल पहाड़ों के ऊपर फटते हैं अर्थात् ज़बरदस्त मूसलाधार बारिश होती है. बारिश का पानी अपने साथ मिट्टी और छोटे-छोटे पत्थरों को बहा लाता है. धरातल तक आते-आते इतना मलबा आ जाता है कि घर दूकान आदि सारी इमारतें ध्वस्त हो जाती हैं.
सरकार कह सकती है कि यह प्राकृतिक आपदा है अथवा हमने तो अलर्ट जारी कर दिया था. लेकिन मौसम विभाग का अलर्ट इतना कैजुअल होता है कि खुद सरकार का सुरक्षा तंत्र इस पर ध्यान नहीं देता. अन्यथा भटवारी से ही आवागमन पर रोक लगाई जा सकती थी. सबसे बड़ा प्रश्न है कि नदी की तलहटी में मकान-दूकान बनाने की अनुमति किसने दी.
2013 के बाद का सबसे बड़ा हादसा
यह सब निर्माण बिना सरकारी अमले की जानकारी के नहीं होता. उत्तरकाशी ज़िला मुख्यालय है और वहां से 100 किमी है गंगोत्री. इस पूरे मार्ग पर जगह-जगह तीखे मोड़ हैं. सड़क कई जगह बहुत संकरी है और अक्सर पहाड़ धसकते रहते हैं. इसकी वजह है कि यहां के पहाड़ खोखले हैं. लोहारी नाग पाला 600 मेगावाट की एक पन-बिजली परियोजना बनाई गई थी.
टिहरी की स्टाइल में यहां पहाड़ों को खोखला कर उनके अंदर बिजली बनाने के टरबाइन लगाए गए थे. जब पहाड़ खोखले हो चुके तो अचानक 2006 में पर्यावरण विभाग ने इस पर रोक लगा दी. लेकिन पहाड़ तो खोखले हो चुके थे. इसलिए इस पूरे क्षेत्र में पहाड़ धसकते ही रहते हैं. क्लाउड बर्स्ट की घटनाएं भी खूब होती हैं. 2013 में जब केदारनाथ हादसा था. तब कई महीनों तक यह रूट बंद रहा था.
एक भी चट्टान हिली तो आफत आई
बारिश में पहाड़ ख़तरनाक हो जाते हैं. अति वृष्टि के कारण जगह-जगह सड़क भी धंसती है और पत्थर गिरते हैं. इसके बावजूद पूरे सावन महीने में कांवड़िए इस रूट पर बहुत अधिक आते हैं. वे अपने साथ मैदानों के ट्रक में सामान और सवारियां भर कर लाते हैं. अधिक से अधिक सामान भरने के चक्कर में वे ट्रक की ऊंचाई निर्धारित मानक से ऊपर कर देते हैं.
पहाड़ की सड़कों पर गाड़ी चलाने का उनको न सलीका होता है न शऊर. वे खाई की तरफ़ जाने से डरते हैं इसलिए सड़क के बीच में चलने लगते हैं. और अक्सर साइड देने में वे ट्रक को पहाड़ से सटा देते हैं. ऐसे में यदि एक भी पत्थर गिरा तो वह लुढ़कते हुए पहाड़ के तमाम पत्थरों को अपने साथ लाता है. पेड़ भी टूटते हैं. पेड़ों का टूटना और पत्थरों का गिरना क्लाउड बर्स्ट का कारण बनता है.
संतुलन पर टिकी है प्रकृति
प्रकृति सदैव संतुलन से टिकी रहती है. एक भी पत्थर फिसला तो पूरा बैलेंस बिगड़ने लगता है. इसके अतिरिक्त हरियाणा, दिल्ली और वेस्टर्न यूपी तथा पंजाब से जो लोग डाक कांवड़ ले कर आते हैं. वे अपने ट्रकों में डीजे बजाते चलते हैं और मोटर साइकिलों का साइलेंसर निकाल देते हैं. इस वजह से शोर भी खूब होता है.
जगह-जगह गंदगी फैलाना, शोर और भीड़ द्वारा गंदगी फैलाने से जंगलों की अपनी शांति बाधित होती है. जंगल में रहने वाले जीव-जंतु इधर उधर भागते हैं. भीड़ में आए लोग अपनी ज़रूरत के लिए अंधाधुंध पेड़ों को काटते हैं. नतीजा पेड़ न बारिश के पानी को रोक पाते हैं न मिट्टी को धसकने से. पर्यावरण के संतुलन के इस खिलवाड़ से क्लाउड बर्स्ट तथा पहाड़ों का धसकने से रोका जाना असंभव है. इसके बाद जहां भी घाटी या चौड़ी जगह दिखी वहां होटल, रेस्तरां खोल लेना भी खिलवाड़ ही है.
धराली में रहती है भीड़-भाड़
उत्तरकाशी-गंगोत्री के बीच भटवारी और गंगनानी के बाद पर्यटकों का प्रिय स्थल धराली है. यहां से सीधी चढ़ाई शुरू होती है. लंका, भैरो घाटी के बाद गंगोत्री. यहां के बाद पहाड़ वनस्पति विहीन होने लगते हैं. इसलिए ज़्यादातर लोग यहीं ख़रीददारी कर लेते हैं. पीने के पानी की बोतलें, नाश्ते का सामान तथा फल फ़्रूट आदि. पर्यटक अपनी गाड़ियों की मरम्मत भी यहीं करवाते हैं क्योंकि इसके ऊपर फिर कुछ नहीं मिलता. इसलिए यहां हर समय भीड़ रहती है.
यहां तक कि जब गंगोत्री मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं तथा गंगोत्री मंदिर से गंगा की प्रतिमा के वस्त्राभूषण आदि धराली के उस पार ऊंचाई पर स्थित मुक़बा में लाए जाते हैं. उस समय भी धराली तक पर्यटकों की आवाजाही रहती है. यह जगह हर्षिल से तीन किमी की दूरी पर है. इसीलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि हादसे के समय यहां सैकड़ों लोग रहे होंगे.
सड़क बनने में समय लगेगा
गंगोत्री मंदिर के पुजारी पंडित जितेंद्र सैमवाल ने फ़ोन पर बताया कि धराली से गंगोत्री की तरफ़ आगे बढ़ते ही दाहिनी तरफ़ के पहाड़ों से खीर नदी पर एक सैलाब आया जो पुलिया के पास सीधे कल्प केदार के मंदिर को ध्वस्त करते हुए गंगा में जा गिरा. मलबे के कारण गंगा की धारा अवरुद्ध हो गई. इस वजह से हर्षिल के हेलीपैड पर पानी भर गया. सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें परंतु मृतकों की संख्या काफी है. इसके बाद सुक्खी टॉप निशाने पर आया. कोई 8000 फीट पर स्थित इस गांव की अतिवृष्टि से भी मलबा नीचे गिरा जा कर.
इसी रास्ते पर आगे बाल शिव (बाल कंढार) तक पानी और मलबा पहुंचा. सड़क मार्ग भी ध्वस्त हो गया. पंडित जी बताते हैं कि धराली में गंगोत्री मार्ग को अस्थाई रूप से दुरुस्त करने में 20 दिन का समय तो लग ही जाएगा. तथा पक्का मार्ग बनाने में दो-ढाई महीने.
सीमित हो पहाड़ पर आवाजाही
क्लाउड बर्स्ट भी भूकंप की तरह होता है. एक बार बदल फटने के बाद कई जगह ऐसी घटनाएं होती हैं. मगर सरकारें इस तरह की घटनाओं को हल्के में ले लेती हैं. हिमालय के पहाड़ कच्चे हैं. उनकी खुदाई और वहां सड़कें बनाने में सतर्क रहना चाहिए. चंबा से डुंडा तक फ़ोर लेन हाई वे बन चुका है. लेकिन जगह-जगह पहाड़ धसकने का कारण रास्ता रुक जाता है.
सरकार उत्तराखंड में पर्यटन को सुगम बनाने के लिए वही प्रयास कर रही है, जो कि वह मैदानों में करती है. इसीलिए मैदानी शहरों में अक्सर भूकंप आते रहते हैं और पहाड़ में क्लाउड बर्स्ट के हादसे. इन हादसों को पहाड़ के लोग तो समझते हैं किंतु मैदान से गये सैलानी नहीं. इसलिए जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, सैलानी अपने बचाव का रास्ता नहीं तलाश कर पाते.
धराली में फटा बादल, गंगोत्री का रास्ता बंद, जलजले से विशालकाय झील बन गई भागीरथी!
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