हरिद्वार में सवालों के घेरे में व्यवस्था: आरोपों के ‘आर्किटेक्ट’ को ही नक्शों की कमान

हरिद्वार। हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण (HRDA) में एक अजीबोगरीब और चिंताजनक प्रशासनिक घटनाक्रम सामने आया है, जो न केवल नियमों की धज्जियां उड़ाता है, बल्कि जवाबदेही के पूरे ढाँचे को मज़ाक बना देता है। जिस सहायक अभियंता प्रशांत सेमवाल पर गलत नक्शे पास करने, अवैध निर्माणों को बढ़ावा देने और स्वीकृति प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं, और जिनके विरुद्ध दण्डात्मक कार्रवाई की संस्तुति की गई थी, उन्हें HRDA उपाध्यक्ष ने सीधे मैप सेल की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अधिकारी से जुड़ा पूरा मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
जब ‘दोषी’ ही बन गया नियामक
मामला हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण (HRDA) की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है। प्रशांत सेमवाल पर आरोप हैं कि उन्होंने भवन उपविभाग में रहते हुए नियमों के विरुद्ध काम किया। जांच समिति की रिपोर्ट इन आरोपों को हल्के में नहीं लेती। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि नक्शा स्वीकृति के लिए आवश्यक एस्टीमेट, रोड वाइडनिंग, सेटबैक, पूर्वनिर्मित स्ट्रक्चर और अन्य दस्तावेजों की संख्या में गंभीर विसंगतियाँ पाई गईं।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत सेमवाल ने गलत तरीके से आवश्यक दस्तावेजों की संख्या बदली, नियमविरुद्ध उपविभागीय अनुमोदन दिया, और पूरी स्वीकृति प्रक्रिया को प्रभावित किया। इस लापरवाही का सीधा परिणाम यह हुआ कि राजस्व को नुकसान पहुंचा और क्षेत्र में अवैध निर्माणों को बढ़ावा मिला।
हैरानी की बात यह है कि यह केवल HRDA की आंतरिक रिपोर्ट नहीं है। मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) के सचिव द्वारा भेजी गई एक रिपोर्ट में भी प्रशांत सेमवाल को मुख्य दोषी माना गया था और उनके विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही की सिफारिश की गई थी।
जाँच रिपोर्ट का अंतिम हिस्सा सीधे-सीधे यह साबित करता है कि सेमवाल की लापरवाही सिद्ध होती है, और विभिन्न मानचित्रों में गंभीर विरोधाभास थे। इन सब साक्ष्यों और अनुशासनात्मक कार्रवाई की स्पष्ट संस्तुति के बावजूद, HRDA उपाध्यक्ष ने उन्हें न केवल पद पर बनाए रखा, बल्कि नक्शों के अनुमोदन से जुड़ी सबसे संवेदनशील जगह—मैप सेल—की जिम्मेदारी सौंप दी।
यह प्रशासनिक निर्णय केवल एक तबादला या ज़िम्मेदारी में बदलाव नहीं है; यह प्रशासनिक शुचिता की हत्या है।
जवाबदेही का अंत: जब एक जांच रिपोर्ट में सिद्ध हो चुके दोषी और एक हाईकोर्ट में लंबित मामले के आरोपी को ठीक उसी क्षेत्र की मुख्य कुर्सी पर बैठा दिया जाता है, तब यह संदेश स्पष्ट जाता है कि आंतरिक लॉबी और विभागीय शक्ति न्यायिक प्रक्रिया और नियमों की पारदर्शिता से कहीं ऊपर हैं। यह कार्रवाई प्राधिकरण के भीतर भ्रष्टाचार को संस्थागत बनाने का संकेत देती है।
जांच को कमज़ोर करने का प्रयास: इस तरह की ज़िम्मेदारी सौंपने से यह सवाल खड़ा होता है कि क्या HRDA जांच प्रक्रिया को प्रभावित या कमज़ोर करने की कोशिश कर रहा है? अब जब आरोपी ही नक्शों के नियमन का प्रमुख होगा, तो भविष्य के नक्शों की जांच और पुराने मामलों की पड़ताल कितनी निष्पक्ष होगी, यह बड़ा प्रश्न है।
जनता का भरोसा: जिस विभाग का काम सुनियोजित विकास सुनिश्चित करना है, अगर उसी की मुख्य व्यवस्था ऐसी हो, तो आम जनता का विकास प्राधिकरणों पर से भरोसा उठना स्वाभाविक है। अवैध निर्माणों और राजस्व हानि के आरोप झेल रहे अधिकारी को संरक्षण देना, नागरिकों के लिए यह सुनिश्चित करता है कि नियम केवल कमज़ोरों के लिए हैं, शक्तिशाली के लिए नहीं।
आइए, इस पूरी व्यवस्था को कुछ सवालों के आईने में देखें, क्योंकि कुछ घटनाएँ इतनी सीधी नहीं होतीं कि केवल खबर बनकर रह जाएं:
- क्या HRDA ने यह मान लिया है कि ‘गलत नक्शे’ पास करना अब एक योग्यता है? जिस अधिकारी पर नक्शों में अनियमितता के आरोप हैं, उसे ही नक्शों की कमान सौंपना क्या विभाग का एक ‘नव-प्रशासनिक प्रयोग’ है? क्या यह कहना चाहिए कि ‘गलत’ का अनुभव ही अब ‘सही’ को रेगुलेट करने के लिए जरूरी है?
- जब MDDA और HRDA की जांच रिपोर्ट में दंडात्मक कार्यवाही की सिफारिश है, तब ‘दण्ड’ की यह परिभाषा कौन सी है? क्या मैप सेल की जिम्मेदारी एक प्रकार का ‘प्रमोशन विद पेनल्टी’ है? या यह ‘सजा’ देने का वह आधुनिक तरीका है, जिसमें आरोपी को और अधिक शक्ति दे दी जाती है?
- हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन होने के बावजूद यह निर्णय किसके ‘दबाव’ में लिया गया? क्या HRDA को न्यायपालिका की प्रक्रिया में रत्ती भर भी विश्वास नहीं है, या फिर यह पूरी प्रशासनिक लॉबी नियमों को अपने हिसाब से मोड़ना जानती है?
और सबसे बड़ा सवाल: क्या व्यवस्था अब इतनी ‘बेबाक’ हो गई है कि वह कहती है, “हम जानते हैं कि वह दोषी है, और हम जानते हैं कि हम उसे ही जिम्मेदारी सौंपेंगे। क्या कर लोगे?”
HRDA का यह कदम जवाबदेही और प्रशासनिक नैतिकता के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। यह दर्शाता है कि उत्तराखंड जैसे राज्य में विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच रिपोर्टों के बावजूद भी किस तरह ‘बाहुबली’ अधिकारियों को संरक्षण दे सकते हैं।
जब नियम बनाने वाला ही नियम तोड़ने वाला सिद्ध हो जाए, और फिर भी उसे ही नियमन की जिम्मेदारी सौंप दी जाए, तो यह विकास का नहीं, बल्कि विसंगति का मॉडल है। यह निर्णय स्पष्ट रूप से कानून का मखौल है। उम्मीद है कि हाईकोर्ट इस प्रशासनिक नौटंकी का संज्ञान लेगा, क्योंकि अन्यथा यह मामला ‘आरोपों के आर्किटेक्ट’ को ही व्यवस्था का आर्किटेक्ट बनाने की घातक परंपरा स्थापित कर देगा।






