UP News: बड़बोलेपन और अनुमान का कुंभ…भक्तों का जोर और VIP का शोर – INA
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महाशिवरात्रि के साथ ही कुंभ समाप्त हो गया. सनातन हिंदू संस्कृति में कुंभ मेला स्वतः आयोजित होते रहे हैं. इसके लिए कोई तिथि-मुहूर्त की घोषणा कभी किसी धर्माचार्य ने नहीं की. दूर-दराज के गांवों में रह रही जनता भी जानती थी कि कब अमावस्या है और कब पूर्णिमा. इसी आधार पर वह तीज-त्योहारों की गणना कर लेती थी. अतः यहां कभी भी कुंभ के आयोजन में न राज्य की कोई भूमिका रही न किसी धर्म की. कुंभ और गंगा अनादि हैं. चूंकि प्रयागराज में गंगा और यमुना का संगम है तथा मान्यताओं के अनुसार यहां सरस्वती नदी भी गंगा में मिलती है, इसलिए इसे त्रिवेणी नाम दिया गया और यहां स्नान को शुभ माना गया. हिंदू परंपरा में बहुत-सी बातें गूढ़ और रहस्यमयी हैं. उनको समझने के लिए उनके मूल की खोज करनी होगी.
कुंभ दरअसल आम जनता, राजन्य वर्ग, व्यापारी वर्ग और विद्वानों का मिलन-स्थल रहा है. यह इसलिए क्योंकि भारत में विद्वान ऋषि-मुनि कभी किसी राज्याश्रय में रह कर चिंतन-मनन नहीं करते थे. वे जंगलों में अपने आश्रम में रहा करते थे. हर साल माघ में ये तीनों समुदाय इसी प्रयागराज में मिलते, संगम स्नान करते और नैतिक मूल्यों एवं धर्म के बारे में जनता और राजन्य वर्ग से बतियाते. एक तरह से सूक्ष्म रूप से वे जनता को समाज के लिए उपयोगी नैतिक मूल्यों से परिचित कराते. माघ के इस मिलन को कल्प-वास कहा गया. इस दौरान पूरे महीने वे दिन में एक बार सूक्ष्म भोजन करते ताकि तन और मन निर्मल रहे. ये नैतिक मूल्य सभी के लिए थे. एक तरह से देश की सामाजिकता और परस्पर निर्भरता के लिए इस तरह का मिलन आवश्यक था.
राज्य की कुंभ में कोई दखल नहीं होती थी
ऐसा कोई उत्तर भारत में ही नहीं था, बल्कि तमिल परंपरा में संगमन परंपरा भी लगभग यही है. यह स्वतः स्फूर्त परंपरा है. इसमें किसी को निमंत्रित करना या राज्य द्वारा किसी तरह की दखल नहीं होती थी. यह पहली बार हुआ जब मेला प्रबंधन के नाम पर राज्य ने इस मेले को पूरी तरह अपने हाथों में ले लिया. नतीजा यह हुआ कि 2025 का कुंभ मेला लूट की मिसाल बन गया. त्रिवेणी स्नान के नाम पर दूर-दराज से आए यात्रियों को लूटा गया. चाहे हवाई जहाज हो या रेलवे सबने मनमाने पैसे वसूले और सुविधाएं सिफर. संगम के आसपास जो फूड कोर्ट थे, उनके स्टाल लाखों रुपए ले कर आवंटित हुए थे, इसलिए हर चीज के दाम अनाप-शनाप थे. यहां तक कि मेला स्थल से त्रिवेणी जाने-आने के लिए नाव वालों ने प्रति व्यक्ति हजार-हजार रुपए वसूले.
आम लोग कम VIP अधिक आए
कुंभ के सरकारी करण का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ा. 2025 के कुंभ में जनता की सहभागिता नहीं दिखी. इलाहाबाद के लोग पहले कुंभ के आयोजन में स्वयं भागीदारी करते थे. क्योंकि कुंभ में छोटे और मंझोले व्यापारियों का बिजिनेस फलता-फूलता था. पर इस कुंभ में कुछ बड़े ठेकेदारों को छोड़ कर और किसी की भागीदारी नहीं रही. तम्बुओं की व्यवस्था से ले कर रजाई-गद्दे का इंतजाम कुछ विशेष ठेकेदारों को दे दिया गया. हर तरह की सरकारी खरीद इन्हीं के माध्यम से हुई. खरीद भी कोई छोटी-मोटी नहीं बल्कि सैकड़ों करोड़ की. यह पहला कुंभ रहा, जिसमें धार्मिक आस्था कम और इवेंट मैनेजमेंट अधिक दिखा. इसमें कोई शक नहीं कि पिछले सभी कुंभ की तुलना में इसमें भीड़ अधिक आई पर इस कुंभ में आम लोगों की तुलना में अति विशिष्ट लोग छाये रहे.
यू ट्यूबर ने गुड़-गोबर किया
कुंभ में मेन स्ट्रीम मीडिया की बजाय यू ट्यूबर को प्राथमिकता दी गई. कुल मिला कर एक बार प्रेस कांफ्रेंस हुई. मौनी अमावस्या के दिन प्रशासन ने प्रेस से बात की थी. बाकी यदा-कदा किसी एक मीडिया के लोगों से मेला प्रशासन मिल लिया. मौनी अमावस्या को जब हादसा हुआ था, तब जरूर 30 के मरने की संख्या बताई गई थी. मेन स्ट्रीम मीडिया के पत्रकार खुद बस स्नान का पुण्य लाभ लेते रहे. उधर यू ट्यूबर ने ऐसा महिमा मंडन किया, मानो कुंभ आना जीवन की सबसे बड़ी कमाई है. उन्होंने कुंभ की ऐसी ग्लैमरस तस्वीर पेश की जिसमें बाबाओं और साध्वियों के रहस्यमयी क़िस्से थे. अघोरी बाबाओं की जीवन शैली का विचित्र भाषा में वर्णन था. करनाल की एक अघोरी साध्वी चंचल की रील्स थीं और किन्नर अखाड़ों की गाथाएँ थीं. विदेशी बालाओं की लुभावनी फोटो थीं और सेलेब्रिटी का कुंभ स्नान था. मीडिया के नाम पर जिन यू ट्यूबर को प्रचार का ठेका मिला, उन्होंने और गुड़ गोबर किया.
NGT ने संगम के जल को स्नान के उपयुक्त नहीं माना
केंद्र और राज्य सरकार ने इस कुंभ के लिए करीब 6600 करोड़ रुपयों की बारिश की. कुंभ को इवेंट बना देने से से कमाई भी खूब हुई. पर आम लोगों को क्या कमाई हुई या क्या हासिल हुआ, इसका कोई रिकार्ड सरकार के पास नहीं है. उलटे जिन लोगों ने जितना देरी से स्नान किया अथवा विशेष पर्व पर स्नान किया उतना ही अधिक कीचड़ में वे लोटे. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने जो रिपोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (NGT) को दी थी, उसके अनुसार संगम के जल में सीवेज का पानी पहुंच रहा है. फूल-मालाओं को संगम के जल में फेक दिए जाने से पानी लगातार मैला होता जा रहा है. इससे पानी में कई तरह के बैक्टीरिया घुल गये हैं. दरअसल त्रिवेणी स्नान के उद्देश्य से जो लोग संगम में पहुंचे, वहां गहराई बहुत कम थी, इसलिए पानी का बहाव भी बहुत कम था.
यमुना में प्रदूषण कम
हो सकता है कि जब भी कोई VIP या सेलेब्रिटी आई हो संगम में पानी को अतिरिक्त छोड़ा जाता रहा हो लेकिन आम लोग तो लगभग कीचड़ में ही लोटे. किंतु जो लोग यमुना के किनारों पर डुबकी लगा लिए वे तो नदी के जल में नहा लिए. यूं भी यमुना में जल काफी रहता है. इसलिए यमुना का जल अपेक्षाकृत कम प्रदूषित होता है. यमुना में दिल्ली, मथुरा और आगरा के बाद कोई बड़ा शहर नहीं है. इसके अलावा औरैया के समीप पंचनदा में पांच बड़ी नदियों का जल उसमें मिलता है. चम्बल, क्वारी, पहुज तो बड़ी तथा गहरी नदियां हैं इसके अलावा एक स्थानीय नदी सिंध भी है. यहां से यमुना और गहरी एवं उसका परवाह बहुत तेज हो जाता है. इसके बाद हमीरपुर शहर से थोड़ा आगे बेतवा नदी यमुना में मिलती है. इसलिए यमुना का रंग वेग और गहराई के कारण हरा हो जाता है.
कानपुर का मलबा
इसके विपरीत गंगा में देवप्रयाग से कई छोटी-मोटी नदियां तो मिलती ही हैं साथ में इसके किनारे बसे शहरों का मलबा भी. गंगा का बहाव मध्यम है. इसलिए इसमें मिला मलबा जल्दी साफ नहीं हो पाता. खासतौर पर कानपुर में गंगा में इतनी मैली हो जाती है कि इसके पानी से बदबू आने लगती है. इसकी सहायक नदियां भी इतना जल नहीं लातीं की वह स्वच्छ हो सके. इलाहाबाद में गंगा और यमुना नदियां आपस में मिलती हैं. यमुना का पाट भले कम हो किंतु वह अपार जल राशि लाती है. इसलिए संगम पर हरे रंग का यमुना का जल जब गंगा के सफेद पानी में मिलता है तब दोनों को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है. लोग इसी मिलन स्थल पर स्नान करना मोक्ष समझते हैं.
पुष्प वर्षा से भी बढ़ा प्रदूषण
हेलीकॉप्टर से जो पुष्प वर्षा होती रही, वे फूल भी इसी जगह गिरते रहे, जिससे यहां पानी खूब प्रदूषित हुआ. इसके अतिरिक्त अधिकतर VIP या सेलिब्रिटी, जो संगम स्थल पर हेलीकॉप्टर से आए, उनका प्रदूषण भी गंगा के उस पार फैला. साथ ही धूल-धक्कड, गाड़ियों की आवाजाही से भी इस स्थल के जल को देख कर वितृष्णा अधिक जगी. कई लोग तो ऐसे रहे, जिन्होंने संगम पर आ कर भी स्नान नहीं किया. वे तो गंदगी और भीड़ से घबरा गए. प्रचार की ऐसी धूम रही कि लोग कुंभ के बाद भी कुंभ में आते रहे. मालूम हो कि कुंभ बसंत पंचमी के बाद समाप्त हो जाता है. नागा अखाड़े प्रस्थान कर जाते हैं. उनके शाही स्नान मुख्य तौर पर तीन ही होते हैं. मकार संक्रांति और मौनी अमावस्या तथा बसंत पंचमी.
अनुमान का कुंभ
इस कुंभ को महा-शिवरात्रि तक बढ़ाया गया. जबकि पहले कभी ऐसा प्रयास नहीं हुआ. किसी भी आचार्य ने कुंभ को शिवरात्रि तक बढ़ाने का आग्रह नहीं किया था न ही यह कहा कि यह कुंभ 144 वर्ष बाद पड़ा है. कुंभ 12 वर्ष बाद पड़ता है. इसलिए हर बारहवां कुंभ 144 वर्ष बाद ही पड़ेगा. मगर इस कुंभ को इसी तरह प्रचारित किया गया. यही वजह रही कि इस कुंभ में जैसी भीड़ आई, वह एक रिकार्ड है. कुंभ के पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने 2025 के कुंभ में 45 करोड़ लोगों द्वारा स्नान करने का दावा किया था. मगर 25 फरवरी को बताया गया कि 67-68 करोड़ लोग डुबकी लगा चुके. ये सब अनुमान हैं. हो सकता है, यह आंकड़ा इससे और अधिक पहुंच जाए. कुंभ की समाप्ति की औपचारिक घोषणा भले कर दी जाए पर अभी सरकारी तंबू-कनात तने ही रहेंगे. न इतनी जल्दी यात्रियों का आना कम होगा.
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