UP News: डकैती का झूठा गुनाह, मैनपुरी के ‘आजाद’ 24 साल जेल में रहे कैद… अब हाई कोर्ट ने कहा- आप निर्दोष हैं – INA

UP News: डकैती का झूठा गुनाह, मैनपुरी के ‘आजाद’ 24 साल जेल में रहे कैद… अब हाई कोर्ट ने कहा- आप निर्दोष हैं – INA

उत्तर प्रदेश में मैनपुरी जिले के थाना अलाऊ क्षेत्र के ज्योति कतारा गांव के रहने वाले आजाद खान की जिंदगी के 24 साल जेल की सलाखों में गुजर गए. वह भी एक ऐसे आरोप के चलते, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेबुनियाद करार दे दिया. हाईकोर्ट से दोषमुक्त होने के बाद भी आजाद को तुरंत आजादी नहीं मिल सकी. महज 7 हजार रुपये के जुर्माने और तकनीकी औपचारिकताओं ने उसकी रिहाई रोक दी. मीडिया की पहल और एक सामाजिक संस्था की मदद से आजाद को आजादी की उम्मीद दिख रही है.

आजाद खान के जीवन का सबसे काला दिन वर्ष 2000 में आया था, जब अचानक पुलिस आजादे घर पहुंची और यहीं से आजाद की आजादी पर ब्रेक सा लग गया. पुलिस जैसे ही उसके घर पहुंची और उसे डकैती के गंभीर मामले में आरोप मानते हुए गिरफ्तार कर लिया. हालांकि आजाद ने ये सपने में भी नहीं सोचा था कि बेगुनाही साबित करने में उसे अपनी जिंदगी का करीब आधा हिस्सा ही लग जाएगा.

भाई ने लड़ी आजाद के लिए कानूनी लड़ाई

मैनपुरी की अदालत में चले मुकदमे के बाद अपर सत्र न्यायाधीश ने आजाद को कानून के तहत दोषी मानते हुए उम्र कैद की सजा सुना दी. कोर्ट के इस फैसले ने न सिर्फ आजाद की आजादी छीन ली, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़कर रख दिया.

लेकिन आजाद के भाई मस्तान ने तमाम मुश्किलों के बाद भी हार नहीं मानी. उसने मजदूरी करके पैसे जोड़े, ताकि वो अपने भाई आजाद के लिए अच्छे वकील कर सके. मस्तान ने भाई के लिए परिवार की सारी जमा-पूंजी पैरवी में लगा दी. आर्थिक तंगी से जूझता परिवार हार मानने को तैयार नहीं था. वर्षों की मेहनत के बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां जाकर परिवार के लोगों के लिए उम्मीद की एक किरण जगी.

HC की सख्त टिप्पणी के बाद मिली आजादी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जेजे मुनीर ने आजाद के मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए. 19 दिसंबर 2025 को दिए गए फैसले में कोर्ट ने साफ कहा कि महज इकबालिया बयान के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस के पास आजाद के खिलाफ कोई ठोस सबूत या विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सकी. हाईकोर्ट ने आजाद को डकैती के सभी आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया.

हालांकि, हाईकोर्ट से बरी होने के बावजूद मुश्किलें ने आजाद का पीछा नहीं छोड़ा. रिहाई के लिए धारा 437-ए के तहत जमानत के लिए दो लोगों की आवश्यकता थी. इसके अलावा, आजाद पर धारा 307 का एक पुराना मामला भी दर्ज था, जिसमें वह 10 साल की सजा पूरी कर चुका था, लेकिन 7 हजार रुपये का जुर्माना था जो अभी भी बकाया था. सीनियर जेलर नीरज कुमार ने बताया कि यदि जुर्माना नहीं दिया जाता तो आजाद को एक साल और जेल में रहना पड़ता. गरीबी का आलम यह था कि 24 साल की लंबी कानूनी लड़ाई लड़ चुका परिवार 7 हजार रुपये भी जुटाने की सामर्थ नहीं रखता था.

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प्राइवेट संस्था बनी उम्मीद

जब मामला मीडिया में आया तो प्रशासन और सामाजिक संस्थाएं एक्टिव हो गईं. जेल अधीक्षक अविनाश गौतम ने तत्परता दिखाते हुए न्यायालय को प्रार्थना पत्र लिखा और ईमेल के जरिए जरूरी कागजी कार्रवाई पूरी कराई. इस बीच सामाजिक संस्था छोटी सी आशा की ओर से पारुल मलिक आजाद के परिवार की मदद के लिए आगे आईं. उन्होंने आजाद खान की स्थिति को देखते हुए 7 हजार रुपये का जुर्माना खुद से जमा कराया. औपचारिकताएं पूरी होते ही मैनपुरी सत्र न्यायालय से रिलीज ऑर्डर ईमेल के जरिए बरेली सेंट्रल भेज दिया गया.

24 साल बाद आजाद को मिली रिहाई

बीते दिन बुधवार देर रात जेल प्रशासन ने आजाद खान को उसके भाई मस्तान के सुपुर्द कर दिया. 24 साल बाद जेल की सलाखों से बाहर कदम रखते समय आजाद की आंखों में आंसू थे. दर्द के भी और आजादी के भी. यह कहानी न सिर्फ एक व्यक्ति की पीड़ा है, बल्कि न्याय व्यवस्था की उन खामियों को भी उजागर करती है, जिनकी कीमत गरीब और बेबस लोगों को अपनी पूरी जिंदगी देकर चुकानी पड़ती है.

डकैती का झूठा गुनाह, मैनपुरी के ‘आजाद’ 24 साल जेल में रहे कैद… अब हाई कोर्ट ने कहा- आप निर्दोष हैं




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