UP News: कानपुर में बेटे-बहू ने मां-बाप को बेघर किया, दर-दर की ठोकरें खाईं… फिर ये लोग बने ‘मसीहा’, 7 साल बाद कैसे हुई घर वापसी? – INA


उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां 7 पहले बेटे-बहू ने माता-पिता को घर से बाहर निकाल दिया था. हालांकि, अब दंपत्ति को बड़ी राहत मिली है. माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत नौबस्ता स्थित न्यू आजाद नगर के 75 वर्षीय संतोष कुमार द्विवेदी और उनकी पत्नी को सात साल बाद फिर से अपना आशियाना वापस मिल गया है.
साल 2018 में संतोष और उनकी पत्नी को बहू-बेटे ने घर से बेदखल कर दिया था, जिससे उन्हें दर-दर ठोकरें खानी पड़ी. इस दौरान वह कभी रिश्तेदारों, तो कभी किराए के मकानों में भटकते रहे थे. सोमवार को चकेरी पुलिस की मौजूदगी में वे सालों बाद अपने घर की दहलीज पार कर सके. जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह की अदालत में चले मुकदमे में बुजुर्ग दंपती ने आरोप लगाया था कि उनके बेटे और बहू ने उन्हें न केवल मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना दी, बल्कि उम्र भर की कमाई से बने मकान से भी बेदखल कर दिया.
हाईकोर्ट के निर्देश पर DM कोर्ट में सुनवाई
मामला पहले निचली अदालतों में सालों घिसटता रहा, आखिर में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट को स्वयं सुनवाई कर निर्णय देने का निर्देश दिया था. डीएम कोर्ट ने दोनों पक्षों को पूरा मौका देते हुए दस्तावेजों की गहन जांच की. रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि मकान नंबर 73, न्यू आजाद नगर का 100 वर्ग गज हिस्सा संतोष कुमार द्विवेदी के नाम है. 2017 के दर्ज दानपत्र से उनकी मालिकाना हक की पुष्टि हुई.
बुजुर्ग दंपत्ति को वापस मिला घर
अदालत ने पाया कि ग्राउंड फ्लोर पर दो कमरे, रसोई, शौचालय और बाथरूम पूरी तरह आवास योग्य हैं. आदेश में जिलाधिकारी कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम-2007 का मूल उद्देश्य बुजुर्गों को उनकी ही संपत्ति और निवास से वंचित होने से बचाना है. कोई भी संतान उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध घर से नहीं निकाल सकती. इसी आधार पर डीएम ने तत्काल प्रभाव से बुजुर्ग दंपत्ति को निवास का अधिकार दिया और चकेरी थाना प्रभारी को घर में प्रवेश कराने के सख्त निर्देश जारी किए.
सालों बाद मिला न्याय
सोमवार दोपहर पुलिस बल के साथ जब संतोष द्विवेदी दंपती अपने घर में प्रवेश कर रहे थे, तो मोहल्ले के लोगों की आंखें नम हो गईं. कई बुजुर्गों ने इसे ‘देर से मिला इंसाफ’ बताया. दंपती ने जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह का आभार जताते हुए कहा कि सात साल बाद लगा कि कानून सचमुच जीवित है. यह फैसला एक बार फिर साबित करता है कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम के तहत न केवल मासिक भत्ता, बल्कि संपत्ति से बेदखली के खिलाफ भी त्वरित कार्रवाई संभव है.
प्रशासन का यह सख्त रुख उन संतानों के लिए चेतावनी है, जो बुजुर्गों को उनकी ही छत से बेदखल करने की हिमाकत करते हैं. कानपुर डीएम और कई अन्य लोगों ने मसीहा बनकर बुजुर्ग दंपत्ति को 7 साल बाद उनका आशियाना वापस दिलवाया.
कानपुर में बेटे-बहू ने मां-बाप को बेघर किया, दर-दर की ठोकरें खाईं… फिर ये लोग बने ‘मसीहा’, 7 साल बाद कैसे हुई घर वापसी?
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