UP News: मुरादाबाद दंगा: सिर फोड़ा-पसलियां तोड़ीं, 3 दिन तक बेहोश रहे DIG… जख्म देख डॉक्टर भी सिहर उठे थे; अब 16 को उम्रकैद – INA

6 जुलाई 2011…इस तारीख को मुरादाबाद के लोग भूल नहीं पाते हैं. मुरादाबाद के मैनाठेर में इस तारीख को हिंसा भड़क उठी थी. यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि यह कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाली एक सुनियोजित साजिश थी. उस दिन उग्र भीड़ ने पुलिस पर ऐसा हमला किया, जिसने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया. अब मुरादाबाद अदालत में पेश तत्कालीन डीआईजी अशोक कुमार सिंह की मेडिकल रिपोर्ट ने उस भयावह सच्चाई को फिर उजागर कर दिया है. रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि उग्र भीड़ का उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि एक अधिकारी की जान लेना था.
डॉक्टर प्रीतम बाला की गवाही के अनुसार, जब डीआईजी को अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में लाया गया, तब उनकी हालत बेहद गंभीर थी. उनके सिर पर कई गहरे घाव थे, जो किसी भारी और कुंद हथियार से किए गए प्रतीत होते थे. चेहरे, सीने और शरीर के अन्य हिस्सों पर चोटों के निशान इस बात का प्रमाण थे कि उन पर बेरहमी से हमला किया गया.
‘कान का पर्दा फट गया था’
मेडिकल जांच में सामने आए तथ्यों ने इस घटना की भयावहता को और स्पष्ट किया. डीआईजी के सिर पर मौजूद लेसरेटेड घाव यह दर्शाते हैं कि हमलावर उनके मस्तिष्क को गंभीर नुकसान पहुंचाना चाहते थे. सबसे गंभीर चोट उनके दाहिने कान पर लगी, जिससे कान का पर्दा फट गया. इसे चिकित्सा विज्ञान में गंभीर चोट की श्रेणी में रखा जाता है. आंखों के ऊपर और चेहरे पर गहरे घाव यह संकेत देते हैं कि हमला सीधे सामने से किया गया था. डॉक्टरों की रिपोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि यह हमला जान लेने के इरादे से किया गया था.
‘पसलियां टूट चुकी थीं’
घटना के बाद डीआईजी की हालत इतनी नाजुक थी कि उन्हें होश में आने में तीन दिन लग गए. इस दौरान डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी निगरानी और इलाज में जुटी रही. एक्स-रे और सीटी स्कैन की रिपोर्ट ने भी हमले की गंभीरता को उजागर किया. उनकी दाहिनी ओर की छठी और सातवीं पसलियां टूट चुकी थीं, जिससे फेफड़ों पर खतरा पैदा हो गया था. इसके अलावा बाएं कंधे की स्कैपुला हड्डी और हाथ की उंगलियों में भी फ्रैक्चर पाया गया. ये चोटें इस बात का संकेत थीं कि उन्होंने खुद को बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन भीड़ का हमला लगातार जारी रहा.
पेट में गंभीर दर्द की शिकायत के बाद डॉक्टरों ने आंतरिक अंगों की जांच के लिए अल्ट्रासाउंड कराया और विशेषज्ञों की टीम तैनात की. सप्लीमेंट्री मेडिकल रिपोर्ट ने अदालत में यह साबित कर दिया कि ये चोटें किसी सामान्य झड़प का परिणाम नहीं थीं, बल्कि एक सुनियोजित और जानलेवा हमले का नतीजा थीं.
झूठी अफवाह फैलाई गई
वर्ष 2011 में मैनाठेर थाना क्षेत्र के डींगरपुर गांव में अचानक हिंसा भड़क उठी थी. यह उपद्रव उस समय शुरू हुआ, जब पुलिस एक लूट के आरोपी की तलाश में इलाके में पहुंची थी. इसी दौरान धार्मिक ग्रंथ के अपमान की झूठी अफवाह फैलाई गई, जिसने माहौल को तेजी से तनावपूर्ण बना दिया. देखते ही देखते भीड़ उग्र हो गई और हालात बेकाबू हो गए. उपद्रवियों ने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को भी निशाना बनाया. हालात संभालने पहुंचे तत्कालीन डीआईजी और जिलाधिकारी पर भी भीड़ ने जानलेवा हमला कर दिया. अदालत ने सभी साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर 16 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई.
मुरादाबाद दंगा: सिर फोड़ा-पसलियां तोड़ीं, 3 दिन तक बेहोश रहे DIG… जख्म देख डॉक्टर भी सिहर उठे थे; अब 16 को उम्रकैद
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