UP News: National Handloom Day 2026: क्या बदले बनारस के बुनकरों के हालात, किसे मिला फायदा और कहां रह गई कमी? – INA

“दिवस हमेशा कमजोर का ही मनाया जाता है—जैसे महिला दिवस, अध्यापक दिवस, मजदूर दिवस. पर कभी ‘थानेदार दिवस’ नहीं मनाया जाता.” ये पंक्तियां जाने-माने व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की हैं. उनकी इन पंक्तियों में यदि ‘बुनकर दिवस’ या ‘करघा दिवस’ भी जोड़ दिया जाए, तो यकीन मानिए इनका भावार्थ बिल्कुल भी नहीं बदलेगा. यह बात सरकार भी मानती है कि देश का हैंडलूम क्षेत्र कमजोर हुआ है.

वर्ष 2015 से सात अगस्त को नेशनल हैंडलूम डे मनाने की शुरुआत की गई. नेशनल हैंडलूम डे की शुरुआत करते हुए केंद्र सरकार ने कहा था कि बुनकरों की जिंदगी में खुशहाली लाने और स्वदेशी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह पहल की जा रही है.

तो क्या 2015 के बाद बुनकरों के हालात बदले?

जीआई एक्सपर्ट पद्मश्री डॉ. रजनीकांत कहते हैं कि 1990 से 2010 तक पूरे देश में हैंडलूम बुनकरों की जो स्थिति थी, उसमें अब जबरदस्त सुधार हुआ है. हैंडलूम का रिवाइवल बताता है कि नेशनल हैंडलूम डे मनाने की योजना सफल हुई. हमने बुनकरों और बनारसी साड़ी उद्योग पर लंबे समय से काम कर रहे पद्मश्री डॉ. रजनीकांत से भी सवाल किया.

सवाल: नेशनल हैंडलूम डे की शुरुआत 2015 में हुई. इन 11 वर्षों में हैंडलूम बुनकरों की स्थिति में क्या बदलाव आए?

जवाब: 1990 से 2010 तक हैंडलूम सेक्टर में त्राहिमाम जैसी स्थिति थी. सरकार का ढुलमुल रवैया, चीन का नकली रेशम और दम तोड़ता टेक्सटाइल उद्योग बुनकरों के पलायन और बुनकरी छोड़ने के बड़े कारण बने.

News (28)

आज नेशनल हैंडलूम डे के बाद हैंडलूम रिवाइवल की स्थिति में है. टाटा का तनैरा, बिड़ला का आनंदम और रिलायंस का स्वदेस जैसे ब्रांड हैंडलूम उत्पाद बना रहे हैं. अडानी भी अपना हैंडलूम ब्रांड बाजार में लाने की तैयारी में है.

कोविड के बाद से हैंडलूम पर काम करने वाले बुनकरों की संख्या करीब 40 प्रतिशत बढ़ी है. सालाना तीन से पांच हजार करोड़ रुपये के बीच रहने वाला बनारसी साड़ी उद्योग पिछले पांच वर्षों में करीब 20 प्रतिशत बढ़ा है.

हैंडलूम साड़ियों पर मुनाफा लगभग दोगुना हुआ है. इसका सीधा लाभ बुनकरों को मिला है. आज हैंडलूम का बुनकर 800 से 1000 रुपये प्रतिदिन से कम पर काम नहीं करता. कढ़ुआ और तीन-चार रंगों वाली साड़ियों की मजदूरी एक हजार रुपये से अधिक है, जबकि पांच वर्ष पहले यही मजदूरी करीब 400 रुपये थी.

आज 8000 रुपये से कम में ओरिजिनल हैंडलूम साड़ी मिलना मुश्किल है. बनारसी ब्रोकेड, ड्रेस मटेरियल और ओरिजिनल जरी की मांग भी लगातार बढ़ी है.

सवाल: क्या इस बदलाव का श्रेय केवल नेशनल हैंडलूम डे को दिया जा सकता है?

जवाब: डॉ. रजनीकांत के मुताबिक इसके पीछे कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण पूरे देश में जीआई (GI) को लेकर बना माहौल है. हालांकि बनारसी साड़ी को जीआई टैग 2009 में ही मिल गया था, लेकिन इसकी टैगिंग 2015 के बाद व्यापक स्तर पर शुरू हुई. इससे बनारसी साड़ी की जबरदस्त ब्रांडिंग हुई और उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ी. अब ग्राहक सिल्क खरीदते समय हैंडलूम तलाशते हैं.

News (29)

दूसरा बड़ा कारण सरकार द्वारा हैंडलूम का लगातार प्रमोशन है. हैंडलूम मेले, प्रदर्शनियां, बायर-सेलर मीट और इंटरनेशनल बायर्स मीट जैसे आयोजनों ने बनारसी साड़ी को नया बाजार दिया. पिछले दस वर्षों में सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने पर भी काफी काम किया है. इससे बनारसी ब्रोकेड, फैब्रिक और अन्य उत्पादों का विदेशों में निर्यात बढ़ा है.

होम फर्निशिंग में सिल्क-कॉटन के परदे, कुशन और बेड कवर के साथ-साथ लेटेस्ट फैशन में बनारसी हैंडलूम का इस्तेमाल भी बढ़ा है. रायबरेली के बाद बनारस में भी निफ्ट का केंद्र खोला गया और अब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (एनआईडी) की शाखा भी खुलने जा रही है.

“जीआई से उतना फायदा नहीं मिला”

हालांकि नेशनल हैंडलूम अवॉर्ड से सम्मानित अमरेश मौर्या इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं.

उन्होंने टीवी9 डिजिटल से कहा, “नेशनल हैंडलूम डे की शुरुआत से सरकार और प्रधानमंत्री की मंशा जरूर साफ होती है कि वे हैंडलूम और बुनकरों का भला चाहते थे. कुछ सुधार भी हुआ, लेकिन हैंडलूम और पावरलूम के बीच स्पष्ट अंतर बताने वाली व्यवस्था नहीं होने से सबसे ज्यादा नुकसान हैंडलूम को ही हो रहा है.”

उनका कहना है कि आज जीआई टैग लगाकर सूरत और बेंगलुरु में बने पावरलूम उत्पादों को भी हैंडलूम बताकर बेचा जा रहा है. इस पर न तो कोई प्रभावी नियंत्रण है और न ही शिकायतों की सुनवाई.

वे कहते हैं कि आज तक बुनकरों की न्यूनतम मजदूरी तय नहीं हुई. सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए, जिससे हैंडलूम बुनकर को कम से कम 600 रुपये प्रतिदिन मजदूरी सुनिश्चित हो.

मार्केटिंग के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अमरेश मौर्या के 220 हैंडलूम करघे चलते हैं. वे कहते हैं, “मैंने नीता अंबानी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता तक को बनारसी साड़ियां दी हैं, लेकिन अगर सरकार सचमुच हैंडलूम को बचाना चाहती है तो हैंडलूम और पावरलूम के बीच का फर्क लोगों को समझाना होगा.”

“सूरत से मुकाबला मुश्किल”

बुनकर हाजी ओकास अंसारी कहते हैं कि आज यदि महीने में 15-20 दिन भी काम मिल जाए तो बुनकर खुद को खुशकिस्मत समझता है.

वे कहते हैं, “हम खुद सूरत और बेंगलुरु से परेशान हैं. उनके मुकाबले कीमत नहीं दे पाते, इसलिए कई लोग मजबूरी में सूरत का माल बनारस का बताकर बेच रहे हैं. डिजाइन हमारी, तकनीक हमारी, लेकिन कीमत आधी. ऐसे में मुकाबला कैसे करें?”

हाजी अनवर अंसारी का मानना है कि बनारसी साड़ी और बुनकरों को बचाने के लिए बनारसी डिजाइनों की नकल पर प्रभावी रोक लगानी होगी.

उनके अनुसार, बनारस में सबसे ज्यादा बदहाली पावरलूम सेक्टर में है, जो कुल उद्योग का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा है. जबकि कढ़ुआ हैंडलूम का आज भी कोई मुकाबला नहीं है.वे यह भी कहते हैं कि शिक्षा की कमी, बैंकिंग सहयोग का अभाव और सरकारी योजनाओं की जानकारी न मिलना भी बुनकरों की बदहाली के बड़े कारण हैं.

News (29)

सरकार क्या कर रही है?

बुनकर सेवा केंद्र के सहायक निदेशक ऋषिकेश देसाई के अनुसार, सरकार ओरिजिनल धागों पर 15 प्रतिशत तक सब्सिडी दे रही है. साथ ही मेलों और प्रदर्शनियों के माध्यम से बुनकरों को बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है. किसी भी समस्या की स्थिति में बुनकर सीधे बुनकर सेवा केंद्र से संपर्क कर सकते हैं.

हैंडलूम को बचाना है तो हुनर बचाना होगा

हैंडलूम सेक्टर पर वर्षों से काम कर रहे शैलेश सिंह कहते हैं कि आज इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती हुनरमंद लोगों की कमी है. उनका कहना है कि आज एक हैंडलूम बुनकर को 700 रुपये प्रतिदिन तक मजदूरी मिल जाती है. यानी महीने में करीब 20 हजार रुपये की आमदनी संभव है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा के अभाव में नई पीढ़ी इस पेशे में नहीं आना चाहती.

वे कहते हैं, “बुनकर परिवार का युवा 12-14 हजार रुपये की नौकरी जियो या एयरटेल में कर लेगा, लेकिन पुश्तैनी काम नहीं करेगा.” सरकार ने उस्ताद और समर्थ जैसी योजनाएं शुरू कीं, लेकिन अधिकारियों की उदासीनता के कारण वे अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकीं.आज बनारस में करीब 30 हजार पावरलूम कनेक्शन हैं. एक कनेक्शन पर औसतन तीन बुनकर मानें तो 90 हजार से अधिक पावरलूम बुनकर हैं, जबकि हैंडलूम बुनकरों की संख्या आठ हजार से कुछ अधिक है.

शहर में सक्रिय हैंडलूम बुनकरों की संख्या एक हजार से भी कम है. अधिकांश बुनकर रामनगर, जंसा, गंगापुर, चोलापुर, चंदापुर, कोटवां और लोहता जैसे बाहरी इलाकों में रहते हैं.

शैलेश सिंह कहते हैं कि यह टेक्सटाइल उद्योग करीब पांच लाख लोगों की आजीविका से जुड़ा है. लेकिन योजनाओं के सही क्रियान्वयन और जागरूकता की कमी के कारण चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं.

सरकार को भी बड़ा दिल दिखाना होगा

पावरलूम क्षेत्र में वर्ष 2023 तक सरकार 143 रुपये प्रति हॉर्स पावर की दर से बिजली शुल्क लेती थी. लेकिन 1 अप्रैल 2023 से इसे बढ़ाकर 800 रुपये प्रति हॉर्स पावर कर दिया गया. वहीं, पांच हॉर्स पावर से अधिक के कनेक्शन पर 10 रुपये प्रति यूनिट की दर से शुल्क लिया जाने लगा.

बुनकरों का कहना है कि यदि सरकार इस क्षेत्र को बचाना चाहती है तो बिजली दरों पर भी राहत देनी होगी.

जिस शहर में हर दिन करीब दो लाख पर्यटक आते हों और उसी शहर की सबसे खूबसूरत पहचान गढ़ने वाले बुनकर मुश्किल में हों, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कमी कहां रह गई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

National Handloom Day 2026: क्या बदले बनारस के बुनकरों के हालात, किसे मिला फायदा और कहां रह गई कमी?


#INA #INA_NEWS #INANEWSAGENCY

Copyright Disclaimer :-Under Section 107 of the Copyright Act 1976, allowance is made for “fair use” for purposes such as criticism, comment, news reporting, teaching, scholarship, and research. Fair use is a use permitted by copyright statute that might otherwise be infringing., educational or personal use tips the balance in favor of fair use.
Credit By :-This post was first published on https://www.tv9hindi.com/, we have published it via RSS feed courtesy of Source link,

Back to top button