UP News: कलम को बनाया हथियार, अंग्रेज अफसरों को पेड़ से उल्टा लटकाया… अमर सपूत रामचंद्र तिवारी की कहानी – INA


जंगे आजादी में उत्तर प्रदेश के सेनानियों का अभूतपूर्व योगदान रहा है. जंगे आजादी के सेनानिनियों में ही पंडित रामचंद्र तिवारी का नाम भी शामिल है. रामचन्द्र तिवारी का जन्म यूपी के रायबरेली (अब अमेठी) जनपद के तिलोई तहसील से खनईपुर गांव में साल 1910 में पंडित भगवान दत्त तिवारी के यहां हुआ. उनका बचपन बेहद सादगी और संघर्ष में बीता. जन्म से विद्रोही तेवर के रहे पंडित रामचंद्र तिवारी ने होश संभालते ही अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.
पढ़ाई में कुशाग्र होने के नाते उन्होंने कलम से इस लड़ाई को लड़ने का संकल्प किया. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उन्होंने ऐसी जंग लड़ी और मैदान में उतरकर अपनी बहादुरी के ऐसे किस्से लिखे, जो आज भी प्रेरणा देते हैं. पहले प्रोफेसर और फिर पत्रकार रहे रामचंद्र तिवारी ने निडर होकर अंग्रेजी साम्राज्य की जड़ें हिला दीं. उनके साहस, संघर्ष और बलिदान की गाथा स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है.
देश के प्रति थी गहरी निष्ठा
गांव की गलियों से लेकर पाठशाला तक, उनका व्यक्तित्व तेजस्वी और विद्रोही स्वभाव का था. शिक्षा के साथ-साथ उनमें अपने देश के प्रति गहरी निष्ठा थी. यही कारण रहा कि जब स्थानीय स्तर पर अंग्रेजों के जुल्म और सितम बढ़े तो उन्होंने बगावती तेवरों के साथ आने वाली नस्लों में स्वराज्य की भावना की अलख जगाने का फैसला लिया. इसके लिए उन्होंने यूपी से लाहौर तक का सफर तय किया.
लाहौर में वो साल 1930 से 1942 तक वो लाहौर में रहे. इस दौरान वो लाहौर के ‘नव दुर्गा डिग्री कॉलेज’ में हिंदी के प्रोफेसर रहे. उन्होंने ग्रेजुएशन के स्टूडेंट्स को पढ़ाया. विशेष तौर पर वो हिंदी के शोध छात्रों को पढ़ाते थे. इस दौरान महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ आहवाहन हुआ. पूरे देश में स्वतंत्रता की ज्वाला भड़क उठी. पंडित रामचंद्र तिवारी ने इस आंदोलन को गांव-गांव में पहुंचाने का बीड़ा उठाया.
लाहौर से घर वापसी करने में सफल रहे
इसी दौरान उन्होंने साहसिक कदम उठाते हुए लाहौर कोतवाली में अंग्रेजों के खिलाफ पर्चा चस्पा कर दिया. यह कदम अंग्रेजी प्रशासन के लिए खुली चुनौती था, लेकिन न उनके इरादे डिगे, न ही आजादी के प्रति उनकी आस्था कमजोर हुई. इस दौरान पुलिस उनकी तलाश में छापेमारी कर रही थी और दबिश दे रही थी पर वो लाहौर से घर वापसी करने में सफल रहे.
लौटने के बाद कलम को बनाया हथियार
लाहौर से लौटने के बाद प्रोफेसर रामचंद्र तिवारी ने पत्रकारिता को अपना पेशा चुना. उन्नाव और रायबरेली दोनों जनपद में उन्होंने अपना प्रेस खोला. यहां आदर्श और किसान प्रेस के नाम से उन्होंने लोगों में देशभक्ति की अलख जगाना शुरू किया. पत्रकारिता उनके लिए सिर्फ रोजगार का साधन नहीं थी, बल्कि एक मिशन थी. वो अंग्रेजी हुकूमत की नीतियों और अत्याचारों के खिलाफ पर्चे और समाचार प्रकाशित करते थे.
उस समय अंग्रेजों के खिलाफ लिखना और सच उजागर करना मौत को दावत देने जैसा था. वो गुप्त रूप से पर्चे छापते और ग्रामीण क्षेत्रों में बांटते , ताकि लोग ब्रिटिश साम्राज्य की असलियत जान सकें. उनके शब्दों में आग होती थी और उनकी कलम अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाती थी.
अंग्रेज अधिकारियों को पेड़ पर उल्टा लटकाया
रायबरेली के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संगठन के जिला अध्यक्ष रहे पंडित मदन मोहन मिश्रा के संस्मरण के अनुसार, पंडित तिवारी की बहादुरी का एक किस्सा आज भी लोगों की जुबान पर है. एक बार उन्होंने योजना बनाकर तीन क्रूर अंग्रेज अधिकारियों को पकड़ लिया. फिर उन्हें गांव के बाहर एक बड़े पेड़ पर उल्टा लटका दिया. यह घटना अंग्रेजी प्रशासन के लिए गहरा संदेश थी कि भारतीय अब डरने वाले नहीं हैं.
इस साहसिक कार्य के चलते अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर कठोर कारावास की सजा सुनाई. जेल में भी उन्होंने अपने साथियों का मनोबल ऊंचा रखा और संघर्ष का संदेश फैलाया. जेल में प्रोफेसर तिवारी को रोजाना शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी जाती थीं. भोजन की कमी, गंदा पानी, ठंड में नंगे बदन रहना ये सब ब्रिटिश जेल की आम बातें थीं, लेकिन इन यातनाओं के बावजूद उन्होंने अपने विचारों और आत्मबल को अडिग रखा.
पंडित तिवारी की पुरानी तस्वीरें, दस्तावेज और पर्चे सुरक्षित
वो अक्सर अपने साथियों को आजादी की कविताएं सुनाते और प्रेरणादायक किस्से बताते. स्वतंत्रता सेनानी प्रोफेसर रामचंद्र तिवारी के बेटे पंडित केदारनाथ तिवारी अब लखनऊ में रहते हैं. वो अपने पिता की स्मृतियों और संघर्ष के किस्सों को संजोकर रखते हैं. उनके घर में आज भी पंडित तिवारी की पुरानी तस्वीरें, दस्तावेज और पर्चे सुरक्षित हैं.
स्वतंत्रता के बाद ऐसा रहा जीवन
उन्होंने बताया कि देश की आजादी के बाद प्रोफेसर तिवारी अपने गांव लौट आए. उन्होंने राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन सत्ता की लालसा कभी उनके दिल में नहीं आई. उनका जीवन सादगी और सेवा को समर्पित रहा. वो गांव में युवाओं को शिक्षा और देशभक्ति का संदेश देते रहे. स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां सुनाकर वो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते थे.
दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के 78 साल बाद भी पंडित रामचंद्र तिवारी जैसे असंख्य वीर सपूतों की कहानियां इतिहास की किताबों में बहुत कम मिलती हैं. उनकी स्मृतियों को संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी है.
ये भी पढ़ें:झांसी पुलिस के हत्थे चढ़े 4 शातिर ट्रैक्टर चोर, भागने की कोशिश कर रहे थे कि तभी मुठभेड़ में अरेस्ट
कलम को बनाया हथियार, अंग्रेज अफसरों को पेड़ से उल्टा लटकाया… अमर सपूत रामचंद्र तिवारी की कहानी
देश दुनियां की खबरें पाने के लिए ग्रुप से जुड़ें,
[ad_1] #INA #INA_NEWS #INANEWSAGENCY
Copyright Disclaimer :-Under Section 107 of the Copyright Act 1976, allowance is made for “fair use” for purposes such as criticism, comment, news reporting, teaching, scholarship, and research. Fair use is a use permitted by copyright statute that might otherwise be infringing., educational or personal use tips the balance in favor of fair use.
Credit By :-This post was first published on https://www.tv9hindi.com/, we have published it via RSS feed courtesy of Source link,










