UP News: प्रयागराज की फेमस ‘गहरेबाजी’, 3 चाल में रफ्तार भरते हैं घोड़े; 200 साल पुराना है इस ‘कदमताल’ का इतिहास – INA

UP News: प्रयागराज की फेमस ‘गहरेबाजी’, 3 चाल में रफ्तार भरते हैं घोड़े; 200 साल पुराना है इस ‘कदमताल’ का इतिहास – INA

सावन- उत्साह और उमंग का महीना है, जिसमें सावन की फुहारों के साथ एक तरफ जहां कुदरत की हरियाली हर तरफ बिखर जाती है तो वहीं दूसरी तरफ लोक परंपराओं के कई रूप इस महीने में सजीव हो जाते हैं. सावन में लोक परंपराओं का ऐसा ही एक रूप है प्रयागराज की ‘गहरेबाजी’ की परंपरा. सावन के हर सोमवार को यहां की शाम इक्कों और घोड़ों की टापों की टक-टक से गूंजने लगती हैं. शहर के बीचों-बीच इक्का दौड़ की इस लोक परंपरा ‘गहरेबाजी’ को देखने के लिए यूपी के कई जिलों से लोग प्रयागराज की सड़कों में जमा हो जाते हैं. स्फूर्ति और उमंग के इस लोक रंग से यहां की सड़कें सराबोर हो जाती हैं.

सावन का महीना आते ही कुदरत अपने अंदर से फूट पड़ती है. कहीं रिमझिम बारिश की बूंदें प्रकृति का श्रृंगार करती नजर आती हैं तो झूलों के साथ सावन की कजरी परवान चढ़ती है. सावन के महीने में प्रयागराज की सड़कों पर लोक परंपरा का एक ऐसा रूप देखने को मिलता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘गहरेबाजी’ कहा जाता है. इसका इतिहास 200 साल पुराना बताया जाता है. राजा हर्षवर्धन के समय से ही यह परंपरा चली आ रही है. राजा हर्षवर्धन खुद इसका आयोजन कराते थे.

मुगलकाल में वाजिद अली शाह के समय यह और परवान चढ़ी. धीरे-धीरे तीर्थ पुरोहित जब सावन के महीने में राजा-महाराजाओं को संगम में स्नान कराते और मंदिरों में पूजा कराते तो उन्हें घोड़े दक्षिणा स्वरूप मिलते थे. ‘गहरेबाजी’ संघ से जुड़े अभय अवस्थी बताते हैं कि सावन के महीने में अहियापुर, कीडगंज और दारागंज जैसी जगहों में रहने वाले पुरोहित शिव मंदिरों में जब जल चढ़ाते थे तो लौटते वक्त घोड़ों की दौड़ कराते थे. बाद में घोड़ों के शौकीन कुछ समृद्ध मुस्लिम परिवार भी इससे जुड़ गए और तब आया ‘गहरेबाजी’ का नया स्वरूप.

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रफ्तार नहीं, घोड़ों की चाल की नफासत की कद्र

प्रयागराज में इक्कों को खींच रहे इन घोड़ों की दौड़ ‘गहरेबाजी’ को हॉर्स रेस कहना बिल्कुल गलत होगा. गहरेबाजी के पुराने जानकार अभय अवस्थी बताते हैं कि रैंप पर कैट वॉक करती मॉडल की चाल की नजाकत की तरह घोड़ों के चलने के अंदाज का खेल है गहरेबाजी, न कि रफ्तार का. गहरेबाजी घोड़ों के पैरों में तीन तरह की लय पैदा करता है, जिससे तीन तरह की चाल बनती है सिंधी, चौटाला और ढोलकी. इसमें सिंधी चाल सबसे अच्छी मानी जाती है और इसी को अपने पैरों से सड़क पर उतारता घोड़ा विजेता माना जाता है.

गहरेबाजी में घोड़ों की तीन चाल कर देंगी हैरान

घोड़ों की चाल अर्थात उनके चलने के तरीके को कहते हैं. भारत में विशेष रूप से परंपरागत घुड़सवारी में तीन प्रमुख विशेष चाल हैं, जिनमें सिंधी चाल, चौटाला चाल और ढोलकी चाल प्रमुख हैं. ये चालें प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध हैं. सबसे अच्छी चाल ‘सिंधी चाल’ मानी जाती है, जिसमें कदमों का संतुलन, रफ्तार और क्रमिकता का संयोजन होता है. इस चाल में घोड़ा ऐसे चलता है कि सामने के एक पैर के साथ पीछे का विपरीत पैर एक साथ आगे बढ़ता है. इससे सवार को झटका कम लगता है और यात्रा आरामदायक होती है.

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इसके बाद चौटाला चाल होती है, जो बहुत लयबद्ध और आकर्षक होती है. यहां ‘चौटाला’ शब्द का प्रयोग खास चाल के पैटर्न को दर्शाने के लिए किया जाता है, जिसमें घोड़ा एक विशेष अनुक्रम से अपने चारों पैरों को उठाता है. घोड़ा एक तरह की दोहरी चाल में चलता है, जिससे वह जमीन को अधिक स्पर्श करता है, लेकिन फिर भी तेज गति बनाए रखता है. यह चाल चलते समय घोड़े का सिर-धड़ झूलते नहीं हैं.

‘ढोलकी चाल’ सबसे सामान्य स्तर की चाल होती है. इस चाल का नाम ‘ढोलकी’ नामक वाद्य से लिया गया है, क्योंकि यह चाल ऐसी लय में होती है कि चलते समय उसकी ताल ढोलकी की तरह प्रतीत होती है. इसमें घोड़े के कदमों की तालमेल ऐसे होती है कि ऐसा प्रतीत होता है, जैसे ढोल की ताल पर नृत्य कर रहा हो.

गहरेबाजी में शामिल होने वाले घोड़ों का डाइट प्लान

अहियापुर के रहने वाले बनवारी लाल शर्मा की तीन पीढ़ियां गहरेबाजी के शौक से जुड़ी रही हैं. बनवारी बताते हैं कि गहरेबाजी महज एक शौक नहीं, बल्कि एक जुनून है. एक घोड़े को पालना बहुत महंगा कार्य है. एक घोड़े का डाइट प्लान सुनकर आप हैरत में पड़ जाएंगे. बनवारी बताते हैं कि एक दिन में 3 किलो चना, एक पाव बादाम, 10 ग्राम मुनक्का, एक पाव मलाई, 10 ग्राम गुलकंद के अलावा सर्दियों में हफ्ते में दो दिन पांच ग्राम केशर एक घोड़े का डाइट प्लान है. इसकी लागत एक दिन में 900 से 1100 के बीच आती है. इस तरह 30 हजार का खर्चा केवल उसकी खुराक में आता है. मालिश के लिए नौकर अलग से रखना पड़ता है. डॉक्टर का खर्चा अलग.

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हिंदू-मुस्लिम साथ-साथ करते हैं शिरकत

इस लोक परंपरा का रोचक पहलू यह भी है कि हिंदुओं के साथ मुस्लिम भी इसमें प्रतिभाग करते हैं. बदरे आलम को गहरेबाजी की पिछले तीन वर्षों से बादशाहत हासिल है. बदरे आलम का घोड़ा ‘तूफान’ अपनी रफ्तार और चाल की नफासत से हर किसी का दिल जीत लेता है. इसके अलावा ओसामा, सुजान और मुन्ना बड़े गहरेबाज हैं. हिंदुओं में लाल जी यादव, बनवारी लाल शर्मा, लोटन पंडा और गिरधारी सब पर भारी पड़ते हैं. इनके घोड़ों के नाम आंधी, सिकंदर और तुरंग अपने दौर के हीरो रहे हैं.

सावन के आखिरी सोमवार को विजेता का ऐलान

गहरेबाजी की प्रतियोगिता शहर के अरैल इलाके में नए यमुना पुल के नीचे पांच किलोमीटर की लंबाई में हो रही है. इसमें इस बार 35 घोड़े हिस्सा ले रहे हैं. इसमें आधे से अधिक 19 घोड़े मुस्लिम गहरेबाजों के हैं. सावन के आखिरी सोमवार को विजेता घोषित होगा.

प्रयागराज की फेमस ‘गहरेबाजी’, 3 चाल में रफ्तार भरते हैं घोड़े; 200 साल पुराना है इस ‘कदमताल’ का इतिहास




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