UP News: अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर उठा सवाल, जानें कैसे होता है चुनाव और मिलती है पदवी – INA

UP News: अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर उठा सवाल, जानें कैसे होता है चुनाव और मिलती है पदवी – INA

प्रयागराज माघ मेला विवादों का अखाड़ा बना हुआ है. माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रथ विवाद अब स्वामी बनाम सिस्टम का युद्ध बन गया है. रथ विवाद में नया ट्विस्ट उस वक्त आया, जब देर रात प्रशासन शंकराचार्य के मठ में नोटिस लेकर पहुंचा. खबरों के मुताबिक, मेला प्रशासन की ओर से एक अफसर शंकराचार्य के मठ में देर रात ही नोटिस लेकर पहुंचा लेकिन रात होने के कारण नोटिस रिसीव नहीं हुआ. सुबह होते ही फिर अफसर नोटिस लेकर पहुंचे और इस बार नोटिस को शंकराचार्य के शिविर के बाहर चस्पा कर दिया गया. इस नोटिस में जो लिखा है उससे रथ विवाद स्वामी बनाम सिस्टम के संग्राम में बदल गया.

शंकराचार्य के शिविर के बाहर चस्पा नोटिस में अविमुक्तेश्वरानंद को खुद को शंकराचार्य साबित करने के लिए कहा गया है. इसके लिए सहारा लिया गया है सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का. नोटिस में कहा गया है, “माघ मेला प्रयागराज 2025-26 के अंतर्गत आपके शिविर में लगाए गए बोर्ड और फ्लैक्स में खुद को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में प्रचारित/प्रसारित किया जा रहा है, जो सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के विपरीत प्रतीत होता है. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में किसी भी प्रकार से स्वयं को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में बताना कानूनी रूप से मान्य नहीं है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के उल्लंघन की स्थिति में अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए आप इस पत्र की प्राप्ति के 24 घंटे के भीतर ये स्पष्ट करें कि किस आधार पर अपने नाम के साथ शंकराचार्य/ज्योतिषपीठ से संबंधित पदनाम का उपयोग/प्रचार-प्रसार किया जा रहा है”.

सातवें आसमान पर अविमुक्तेश्वरानंद का गुस्सा

इस नोटिस को देखकर पहले से ही नाराज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. फिर उन्होंने सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने इस नोटिस का जवाब देते हुए यूपी सरकार और मेला प्रशासन पर कई बड़े आरोप लगाए. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य हैं या नहीं, इस सवाल से पहले ये सवाल है आता है कि आखिर किस आधार पर ये सवाल हो रहा है.

पहला सवाल यही है कि क्या कोई प्रशासनिक अफसर किसी धर्मगुरु से उसकी पदवी के बारे में सवाल कर सकता है? सवाल ये है कि अगर वो शंकराचार्य नहीं हैं तो उन्हें मेले में जमीन शंकराचार्य की हैसियत से क्यों आवंटित की गई? पिछले साल कुंभ में अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य की हैसियत से जमीन आवंटन हुआ और उनके स्नान की व्यवस्था क्यों की गई? अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर सरकार के 6 सीनियर अफसर लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, तो क्या उन्हें जानबूझकर टारगेट किया जा रहा है? क्या अविमुक्तेश्वरानंद यूपी सरकार के खिलाफ अपने रूख के कारण निशाने पर हैं?

शंकराचार्य होने पर सवाल और विवाद की गहरी जड़ें

8 अप्रैल 1989 में ज्योतिषपीठ के वरिष्ठ संत बोधश्रम के निधन के बाद स्वरूपानंद सरस्वती ने खुद को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.
15 अप्रैल 1989 में ज्योतिष पीठ के वरिष्ठ संत शांतानंद ने वासुदेवानंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. अब एक ही पीठ के दो शंकराचार्य हो गए. विवाद चलता रहा और 11 सितंबर 2022 को संत स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया. उसके बाद अविमुक्तेश्वारानंद ने अगले दिन खुद को शंकराचार्य घोषित कर दिया. 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक और छत्र के इस्तेमाल पर रोक लगा दी.अब आपके लिए ये भी जानना जरूरी है कि आखिर शंकराचार्य का चयन कैसे होता है?

सबसे पहले योग्यता समझिए

  • शंकराचार्य बनने वाले व्यक्ति को त्यागी, दंडी संन्यासी, वेदांत ब्राह्मण होना जरूरी है.
  • चारों वेदों, 6 वेदांग, संस्कृत का पूर्ण ज्ञान होना अनिवार्य है. मुंडन और खुद का पिंडदान करना अनिवार्य है.

अब प्रक्रिया समझिए

  • वर्तमान शंकराचार्य अपने सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी चुनते हैं
  • उत्तराधिकारी नामित करने से पहले अगर मृत्यु होती है तो ‘काशी विद्वत परिषद’ और अन्य तीन मठों के शंकराचार्य मिलकर नाम तय करते हैं
  • अखाड़ा प्रमुखों और प्रतिष्ठित संतों की भी मंजूरी जरूरी होती है
  • भव्य समारोह के बाद नाम के साथ ‘सरस्वती’,’पुरी’ या ‘तीर्थ’ जैसी पदवी जुड़ती है

ये विवाद केवल धर्म तक सीमित नहीं रहा, इसमें सियासत की भी एंट्री हो गई. जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की वैधता पर सवाल उठे तो समाजवादी पार्टी के सांसद सनातन पांडे ने कुछ ऐसा कह दिया जिससे विवाद और गहरा गया. उन्होंने कहा, ये तो बात और आगे भी बढ़ जाएगी. मैं पूछूं कि आप अपने बाप के बेटे कैसे साबित होंगे? फिर तो DNA टेस्ट करवाना पड़ेगा.

प्रयागराज प्रशासन पर आरोप

प्रयागराज प्रशासन पर आरोप लग रहे हैं कि वो संतों के बीच भेदभाव कर रहा है. कहा तो ये भी जा रहा है कि एक तरफ पूरा प्रशासनिक अमला ‘सतुआ बाबा’ यानी संतोष दास की सेवा में नतमस्तक है. अधिकारी उनके शिविर में रोटियां सेंक रहे हैं, जबकि शंकराचार्य के साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है.

रिपोर्ट टीवी9 भारतवर्ष.

अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर उठा सवाल, जानें कैसे होता है चुनाव और मिलती है पदवी




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