UP News: अंग्रेजों के लिए तोप, एक बार में 8 राउंड फायर, नहीं निकलता था धुआं… चंद्रशेखर की ‘बमतुल बुखारा’ अब हुई ‘आजाद’ – INA


आजादी का नायक, एक ऐसा निशानेबाज, जिसकी बंदूक से निकली गोली कभी अपना निशाना नहीं चूकती थी. उसकी कद-काठी ही ऐसी थी कि देखते ही अंग्रेजों के पसीने छूट जाते थे. उसने कसम खाई थी कि वह अपनी आखिरी सांस तक आजाद रहेगा और हुआ भी ऐसा ही. जिस ‘आजाद’ को मारने के लिए अंग्रेजों ने दिन-रात एक कर दिया, वह मरा भी तो अपनी ही गोली से… अंग्रेज उसकी सांस तक नहीं छीन पाए. हम बात कर रहे हैं चंद्रशेखर आजाद की. आज उनकी जयंती है. देश की स्वतंत्रता के लिए हंसते हुए अपनी कुर्बानी देने वाले भारत माता के इस सपूत की 119वीं जयंती पर देश उन्हें नमन कर रहा है.
वहीं चंद्रशेखर आजाद की कोल्ट पिस्टल एक बार फिर चर्चा में है. इसे वे प्यार से ‘बमतुल बुखारा’ कहते थे. चंद्रशेखर आजाद 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजी फौज से अकेले इसी पिस्टल से लोहा लेते हुए कंपनी गार्डेन में वीरगति को प्राप्त हुए थे. आजाद की निशानियों में सबसे अधिक कौतूहल का विषय मानी जाने वाली उनकी यह पिस्टल ‘बमतुल बुखारा’ को आज कैद से रिहाई मिल गई. प्रयागराज के इलाहाबाद म्यूजियम के सेंट्रल हॉल ‘बमतुल बुखारा’ को दर्शकों के लिए आज उनकी जयंती पर रखा गया. म्यूजियम देखने आए लोगों ने ‘बमतुल बुखारा’ के साथ सेल्फी भी ली. अभी तक यह पिस्टल म्यूजियम में एक लॉकर में सुरक्षित रखी गई थी.
बता दें कि 22 महीने बाद ‘बमतुल बुखारा’ को आज कैद से बाहर निकाला गया. चंद्रशेखर आजाद की इस स्पेशल कोल्ट पिस्टल को 2023 में आजाद गैलरी बनने के बाद सेंट्रल हॉल में दो दिन के लिए रखा गया था. म्यूजियम के जिस सेंट्रल हाल में पिस्टल को रखा गया था, वहां सुरक्षा के उतने प्रबंध नहीं थे. इस वजह से दोबारा इसे लॉकर में रख दिया गया.
पिस्टल नहीं तोप को टक्कर देती थी ‘बमतुल बुखारा’
चंद्रशेखर आजाद की सबसे खास दोस्त ‘बमतुल बुखारा’ ही थी. इतिहासकार प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी बताते हैं कि इस पिस्टल को यह नाम खुद आजाद ने दिया था. इतिहास में स्वतंत्रता सेनानियों के साक्षात्कार पर, लेकिन लिखी कई पुस्तकों में इसका संदर्भ मिलता है. ‘बमतुल’ और ‘बुखारा’… ये शब्द फारसी/उर्दू मूल के हैं. ‘बमतुल’ का अर्थ होता है बम जैसी या बम के समान, यहां बम का तात्पर्य है विस्फोटक जैसी चीज से. ‘बुखारा’ मध्य एशिया का एक ऐतिहासिक नगर है. इतिहास में यह बुखारा शस्त्र और इस्लामी विद्या का प्रसिद्ध केंद्र रहा है. कई आधुनिक हथियार यहां बनते थे. यानी कि बम जैसी ताकत वाली पिस्टल. इसीलिए इसे ब्रिटिश आर्मी आजाद की तोप भी कहती थी.
कौन है ‘बमतुल बुखारा’ की सौतन, जो पाकिस्तान में है?
आजाद की पिस्टल ‘बमतुल बुखारा’ की खूबियां अपने में अलग थीं. इलाहाबाद म्यूजियम के उप संग्रहालय अध्यक्ष और पुरातत्व के जानकार राजेश मिश्रा बताते हैं कि बमतुल बुखारा बाकायदा अमेरिका से खरीद कर लाई गई थी, जो कोल्ट कंपनी की 32 बोर की पिस्टल है. ये एक बार में आठ राउंड फायर करती है. इसकी एक खासियत यह है कि फायर के बाद धुंआ नहीं छोड़ती. इसलिए इसे चलाने वाले तक पहुंचना मुश्किल होता है. इसी कंपनी और इतने ही बोर कोल्ट की पिस्टल आजाद के दोस्त शहीद भगत सिंह के पास भी थी. मॉडल नंबर यही था, लेकिन नंबर आजाद से एक अधिक था. इसे बमतुल बुखारा की सौतन भी कहा जाता था, जो आज पाकिस्तान के हुसैन वाला में रखी हुई है.
बमतुल बुखारा को प्राप्त है A+++ की सुरक्षा
सुरक्षा केवल VIP लोगों को ही नहीं मिलती, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के प्रतीकों को भी मिलती है, जो किसी न किसी म्यूजियम में होते हैं. जेड प्लस की श्रेणी की सुरक्षा राष्ट्रीय महत्व के प्रतीकों में A+++ के नाम से दी जाती है. इलाहाबाद म्यूजियम के निदेशक राजेश प्रसाद बताते हैं कि ‘बमतुल बुखारा’ को प्रोटोकॉल में A+++ की सुरक्षा मिलती है, क्योंकि इसे किसी दूसरी जगह ले जाने की मनाही है. तीन सुरक्षा घेरे में इसे रखा जाता है. इसलिए इसकी सुरक्षा एक संवेदनशील मामला है.
‘बमतुल बुखारा’ की सुरक्षा में फंसा पेंच
आजाद की इस निशानी को ‘ए ट्रिपल प्लस’ का दर्जा प्राप्त है. यानी इसके लिए पांच पुलिस कर्मियों की तैनाती नियमित रूप से होनी चाहिए. संग्रहालय के निदेशक राजेश प्रसाद का कहना है कि ‘बमतुल बुखारा’ के लिए 2 सशस्त्र सुरक्षाकर्मी और तीन सुरक्षा गार्ड का प्रोटोकॉल होना चाहिए. इसके अलावा CCTV कैमरे अलग से. इस धरोहर की सुरक्षा के लिए कुछ दिनों पहले यह प्रोटोकॉल पूरा नहीं हो पाया, जिसके चलते बमतुल बुखारा को सेंट्रल हॉल से हटा लिया गया और यह लॉकर में सघन सुरक्षा में रखी गई.
केवल आजाद की जयंती के दिन 24 घंटे के लिए यह जनता के दर्शन के लिए सेंट्रल हॉल में रखी गई है. जैसे ही प्रशासन की तरफ से इस प्रोटोकॉल को पूरा कर लिया जाएगा, ‘बमतुल बुखारा’ पूरी तरह आजाद हो जाएगी. ‘बमतुल बुखारा’ की एक रिप्लिका म्यूजियम में आजाद गैलरी में रखा रहता है, जिसे दर्शक कभी भी देख सकते हैं.
अंग्रेजों के लिए तोप, एक बार में 8 राउंड फायर, नहीं निकलता था धुआं… चंद्रशेखर की ‘बमतुल बुखारा’ अब हुई ‘आजाद’
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