UP News: ‘राजनीतिक इस्लाम की कहीं चर्चा नहीं होती, जिसने आस्था पर कुठाराघात किया’ सीएम योगी के बयान के क्या हैं मायने – INA


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर खूब वायरल हो रहा है. इसमें वे कह रहे हैं कि ब्रिटिश उपनिवेश वाद की चर्चा होती है, फ्रेंच उपनिवेशवाद की भी पर आज तक राजनीतिक इस्लाम की चर्चा नहीं होती. उनके अनुसार राजनीतिक इस्लाम ने भारत की आस्थाओं पर कुठाराघात किया. योगी आदित्यनाथ ने यह बात गोरखपुर में RSS के एक कार्यक्रम ‘दीपोत्सव से राष्ट्रोत्सव तक’ में कही. उनका यह वीडियो बिहार में विधानसभा चुनाव के समय निश्चय ही अपना असर डालेगा. मगर भारत में चली आ रही सदियों की सामाजिक समरसता पर यह जरूर कुठार चलाएगा. मगर उनकी बात एक हद तक सही है. भारत में इस्लाम का राज्य भले कई शताब्दियों तक रहा हो पर इस्लामी शासकों के अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष भी निरंतर चलता रहा.
ध्वस्त मंदिरों के घाव
मुस्लिम हमलावरों ने जितनी बार भी मंदिर, देवालय को तोड़ा उतनी ही बार हिंदू राजाओं ने उनका पुनर्निर्माण भी करवाया. महमूद गजनवी ने 1024 ईस्वी में जब सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त कर लूट पाट की तो उसके बाद गुजरात के राजा भीम देव चालुक्य और मालवा नरेश भोज ने उसको फिर से बनवाया. इसी तरह अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1297 में सोमनाथ मंदिर को तोड़ा और लूटपाट की तब सौराष्ट्र के राजा महीपाल ने मंदिर को फिर उसी स्थान पर खड़ा किया. 1706 में बादशाह औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को ज़मींदोज़ कर दिया और वहां एक मस्जिद बनवाई. करीब ढाई सौ वर्ष बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसे बनवाया. आज का सोमनाथ मंदिर सरदार पटेल के प्रयासों से निर्मित हुआ है. जब योगी आदित्य नाथ इस तरह की बातें करते हैं तो हिंदुओं के मन में बसे घाव फिर से हरे हो जाते हैं.
मंदिर तोड़े गए और हिंदू राजाओं ने उनका पुनर्निर्माण किया
भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों का इतिहास बहुत लंबा है और उनके अत्याचारों का विरोध करने वालों का भी. राणा सांगा, महाराणा प्रताप, छत्रपति महाराज शिवाजी, ग़ुरु गोविंद सिंह आदि सब ने दिल्ली के मुग़ल शासकों से निरंतर लोहा लिया. मुगल बादशाह औरंगजेब मंदिर तुड़वाता और मस्जिदें बनवाता. लेकिन कुछ ही वर्षों बाद हिंदू राजे उसे फिर से खड़ा करते. काशी के विश्वनाथ मंदिर को होलकर वंश की महारानी अहिल्या बाई ने बनवाया. इसी तरह मथुरा में राजा मान सिंह ने कई मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया. लेकिन कृष्ण जन्म स्थान मंदिर को ओरछा नरेश राजा वीर सिंह बुंदेला ने 1618 में बनवाया था. परंतु औरंगज़ेब के आदेश पर 1670 में इसे तोड़ दिया गया. यहाँ उसने शाही मस्जिद बनवाई. आज का श्रीकृष्ण जन्म स्थान मंदिर बिड़ला द्वारा बनवाया गया.
सबसे लंबा शासन मुस्लिम शासकों का
हालांकि, योगी आदित्य नाथ द्वारा राजनीतिक इस्लाम का विवाद खड़ा करने की पहल को सिरे से ख़ारिज नहीं किया जा सकता. इस्लाम सामी (अब्राहमिक) दर्शनों में सबसे नया है. यहूदी, ईसाई और उनके बाद इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ. इसमें एक ऐसे सामाजिक और राजनीतिक दर्शन की अवधारणा है, जिसमें गैर अब्राहमिक दर्शनों को नकारा गया है. जिस समाज का जिक्र अहले किताब में नहीं हैं, उनको काफिर कहा गया है. ऐसे लोगों को इस्लामिक राज में सदैव दोयम दर्जे की नागरिकता मिलती है, वह भी जज़िया (एक तरह का कर) देने के बाद. भारत में 1192 से 1757 तक इस्लामिक राज रहा. यद्यपि मुसलमानों के पूर्ण साम्राज्य का पतन तब हुआ जब 1857 के विद्रोह को पूरी तरह कुचल दिया गया. 600 वर्षों से अधिक के इस इस्लामिक राज में हिंदू शासक भी छिटपुट जगहों पर रहे लेकिन केंद्र की सत्ता इस्लाम को मानने वाले विदेशियों के हाथ ही रहा.
मुगलों का हिंदू प्रेम भी दिखावटी
हालांकि 1526 में समरकंद के मुग़ल शासक बाबर ने सुल्तान इब्राहिम लोदी को हरा दिया और इस तरह वह दिल्ली का पहला मुग़ल शासक हुआ. उसके बाद उसके वंश के जो भी शासक बने वे पूरी तरह भारतीय रहे. लेकिन अपने राज-काज के लिए ये मुगल बादशाह भी अधिकांश नियुक्तियां अरब, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से आए मुस्लिम अमीरों की ही करते थे. यह सच है कि उन्होंने राजपूताने के हिंदू राजाओं को भी मनसबदारियां बख्शीं किंतु उनके भरोसेमंद वही विदेशी मुसलमान रहे. देश में ही धर्मांतरित हुए मुसलमानों के साथ उनका व्यवहार कोई बहुत प्रीतिकर नहीं था. अकबर और जहांगीर को छोड़ कर ज़्यादातर बाकी मुगल बादशाहों ने हिंदुओं पर भरोसा नहीं किया. उनकी आस्थाओं पर चोट पहुंचाई. गो वध को शुरू कराया और जजिया भी लगाई.
‘भीषणता पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं हुई’
राज्यसभा के सदस्य रहे प्रसिद्ध साहित्यकार रामधारी सिंह ने दिनकर ने अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में हिंदू-मुस्लिम प्रश्न की भूमिका में लिखा है- ”स्वर्गीय मानवेंद्रनाथ राय ने लिखा है कि संसार की कोई भी सभ्य जाति इस्लाम के इतिहास से उतनी अपरिचित नहीं है जितने हिंदू हैं. दिनकर जी की इस पुस्तक की प्रस्तावना स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखी थी. वे दिनकर जी के निष्कर्षों से कहीं न कहीं सहमत थे. दिनकर जी यह भी कहते हैं कि भारत के किसी भी मुसलमान विद्वान ने मुसलमानी अत्याचारों को उचित बताने अथवा भीषणता पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं की. भारतीय इतिहास का परिचय पुस्तक में प्रो. राजबली पांडेय ने लिखा है कि आधुनिक मुसलमान लेखक डॉ. हबीब ने महमूद गजनवी के अत्याचारों पर टिप्पणी की है कि गजनवी की सेना ने भारतीय मंदिरों का जो घोर विध्वंस किया उसको किसी ईमानदार इतिहास को छिपाना नहीं चाहिए. अपने धर्म से परिचित कोई भी मुसलमान उसके अत्याचारों का समर्थन नहीं करेगा. इन सबके बावजूद आज भी भारत का उच्च वर्गीय मुसलमान मानता है कि मुसलमानों के आने के पूर्व भारत की संस्कृति कोई ऊंची नहीं थी.
शिष्ट मुसलमानों ने हिंदुओं को काबिल नहीं माना
हिंदू-मुस्लिम संबंधों को घनिष्ठ बनाने की कोशिश आजादी के बाद से कभी भी नहीं हुई. हिंदुओं को सदैव लगता रहा कि कांग्रेस की सरकारों ने अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते इतिहास की सच्चाई कभी सामने आने नहीं दी. अंग्रेजों ने 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में कांग्रेस के विरुद्ध मुसलमानों को एक करना शुरू किया था. उस समय के बारे में पंडित अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने सैयद इंसा अल्ला ख़ाँ की पुस्तक ‘दरिया-ए-लताफत’ के हवाले से बताया है कि मुंशी इंसा अल्ला खां कहते थे- ”बुद्धिमानों से यह बात छिपी नहीं है कि हिंदुओं ने बोल-चाल, चाल-ढाल और खाना-पहरना आदि सब बातों का स्लीक मुसलमानों से सीखा है. किसी बात में भी इनका कोई फेल ऐतबार काबिल नहीं.” वाजपेयी जी के अनुसार यह कुछ वैसी ही गाली है, जैसी गाली लॉर्ड मैकाले ने बंगाली जाति को दी थी.
अरबों के बीच भारतीय ज्ञान-विज्ञान की प्रतिष्ठा
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी इसी पुस्तक में लिखा है कि इंसा अल्ला खां के समय के मुसलमान भारत की महिमा को भले भूल गए हों, लेकिन इस्लाम के अभ्युदय के समय तथा उसके जन्म के पूर्व अरब और ईरान के लोग भारत की सभ्यता और संस्कृति से खूब परिचित थे. जेरूशलम के हमीदिया पुस्तकालय में हारूं रशीद के महामंत्री फजल बिन याहिया की मुहर लगी एक ताम्र पत्र मिला है, जिस पर 128 शेर लिखे हैं. इनमें भारतवर्ष, वेदों और आर्य ज्ञान-विज्ञान की बड़ी प्रशंसा की गई है. हजरत मोहम्मद के जन्म के 500 वर्ष पहले के कवि जरहम बिन ताई की कविता में गीता के परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम आदि श्लोकों के माध्यम से कृष्णावतार की चर्चा और प्रशंसा है. इसी ग्रंथ में महादेव की आराधना को ईष्ट फलदायिनी बताया गया है.
हमले किए, लूटा और आस्था के केंद्रों को ध्वस्त किया
इस्लाम के उदय के बाद भी ख़लीफ़ा मंसूर के समय (हिजरी 154, ईस्वी 701) भारतीय विद्या अरब देशों में ख़ासी प्रचलित थी. ख़लीफ़ा हारूँ रशीद ने अपने इलाज़ के लिए भारत से वैद्य बुलवाये थे. भारतीय ज्योतिष, गणित और वैद्यक के क़ायल कई ख़लीफ़ा रहे हैं. भारत पर अरबों का पहला हमला 712 ईस्वी में मोहम्मद बिन क़ासिम ने किया था. लेकिन सिंध के अलावा वह आगे नहीं बढ़ा. किंतु ढाई सौ वर्ष बाद महमूद गजनवी ने कई बार भारत पर हमला किया. उसने सौराष्ट्र के प्रसिद्ध मंदिर और हिंदुओं की आस्था के केंद्र सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त किया. गौर के शासक मोहम्मद गौरी ने दिल्ली के राजा पृथ्वी राज चौहान पर 1191 में चढ़ाई की. एक बार पराजित हुआ किंतु दूसरी बार 1192 में तराइन की लड़ाई में उसने पृथ्वी राज चौहान को पराजित कर दिया. इसके बाद दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया.
मराठा, सिख और जाटों का उदय
मुहम्मद गौरी ने अपने ग़ुलाम क़ुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का गवर्नर बना दिया और वापस गौर (अफ़ग़ानिस्तान) लौट गया. 1206 में मुहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने खुद को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया. ग़ुलाम वंश से लेकर लोदी वंश तक दिल्ली इन मुस्लिम सुल्तानों के अधीन रही. लेकिन 1526 में पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी को समरकंद से आए बाबर ने हरा दिया. बाबर मुग़ल था और 1707 तक दिल्ली केंद्र से पूरे हिंदुस्तान में मुग़लों की तूती बोलती रही. परंतु औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल शासक कमजोर पड़ने लगे. 1757 में लॉर्ड क्लाइव ने मुर्शिदाबाद के नवाब सिराजुद्दौला को हरा दिया. इसके बाद 1764 में बक्सर की लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुग़ल बादशाह को अपना पिट्ठू बना लिया. उधर औरंगज़ेब के अत्याचारों के विरुद्ध मराठे, सिख और जाट दिल्ली को घेरे थे.
जातीय पंचायतों ने कन्वर्जन को रोका
इसमें कोई शक नहीं कि भारत में इस्लाम की तलवार के आगे सब कुछ समाप्त हो गया था. महमूद गजनवी के साथ हिंदुस्तान आए अलबरूनी ने लिखा है कि महमूद (महमूद गजनवी) ने हिंदुओं को धूल की तरह उड़ा दिया. किंतु भारत में वे अपने सारे अत्याचारों के बावजूद पूरी प्रजा को मुस्लिम नहीं बना सके. जैसा कि उन्होंने ईरान में कर दिया था. आज का तुर्किये भी पहले ईसाई था परंतु मुस्लिम शासकों ने वहाँ पर अपना राज क़ायम किया तथा बड़ी संख्या को इस्लाम में कन्वर्ट कर लिया. लेकिन भारत में यह संभव नहीं था. भारतीय समाज के अंदर की जातीय पंचायतों ने मुस्लिम कों को सिर्फ राज चलाने तक सीमित रखा. यह उनकी बहुत बड़ी जीत थी. इतनी लंबी ग़ुलामी के बाद भी भारत में 80 प्रतिशत जनता हिंदू बनी रही.
मुस्लिम जनता अत्याचारी मुस्लिम शासकों को ख़ारिज करे
पर यह भारत की विविधता है कि भारत में आज 18 से 20 करोड़ के बीच मुसलमान हैं. भारत के सेकुलर ढांचे में उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती. वे भी भारत के नागरिक हैं. क्योंकि इनकी 90 प्रतिशत से अधिक आबादी तो उनकी है जो कभी हिंदू या बौद्ध धर्म छोड़ कर इस्लाम में धर्मांतरित हुए थे. इसलिए बेहतर हो कि इतिहास के गड़े मुर्दे न उखाड़े जाएं. यहां के मुसलमानों को भी स्पष्ट कहना चाहिए, कि जिन्होंने हिंदुओं की आस्था पर चोट पहुंचाई वे कोई हमारे पूर्वज नहीं थे. वे विदेशी थे, लुटेरे थे. पाकिस्तान के अधिकांश बुद्धिजीवी अब मोहम्मद बिन क़ासिम या महमूद गजनवी अथवा मोहम्मद गौरी को अपना पुरखा नहीं मानते. वे कहते हैं, राजा दाहिर उनका पुरखा था. यही भारतीय संस्कृति की जीत होगी और हमारे भाईचारे की भी.
‘राजनीतिक इस्लाम की कहीं चर्चा नहीं होती, जिसने आस्था पर कुठाराघात किया’ सीएम योगी के बयान के क्या हैं मायने
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