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मस्जिद में अखिलेश यादव और शिव भक्तों के साथ इकरा हसन, सपा नेताओं की सद्भाव वाली पॉलिटिक्स के क्या हैं मायने?

अखिलेश यादव और इकरा हसन

उत्तर प्रदेश में 2 साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव सद्भाव वाली पॉलिटिक्स में जुटे हैं. एक ओर जहां उनकी सांसद इकरा हसन सहारनपुर में कावंड़ियों के कैंप में पहुंचती हैं तो वहीं अखिलेश खुद संसद मार्ग स्थित एक मस्जिद में हाजिरी लगाते हैं. उन्होंने यहां पर राजनीतिक बैठक की. अखिलेश का ये कदम बीजेपी को रास नहीं आया और उसने इसे असंवैधानिक करार दिया. बीजेपी ने सपा पर धार्मिक स्थल का राजनीतिक उपयोग करने का आरोप लगाया.

बीजेपी के आरोपों का अखिलेश ने जवाब भी दिया. सपा प्रमुख ने कहा कि आस्था जोड़ती है और जो आस्था जोड़ने का काम करती है, हम उसके साथ है. लेकिन बीजेपी चाहती है कि कोई जुड़े नहीं. दूरियां बनी रहें. हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं. बीजेपी का हथियार धर्म है.

कावंड़ियों के कैंप में इकरा हसन

कैराना से सपा सांसद इकरा हसन ने 19 जुलाई को अपने लोकसभा क्षेत्र में कांवड़ यात्रा के लिए आयोजित सेवा शिविरों का उद्घाटन किया. इस दौरान उन्होंने शिवभक्तों को भोजन परोसकर सामाजिक सौहार्द और एकता का उदाहरण पेश किया. इस मौके पर सांसद ने कहा कि श्रद्धा, सेवा और सहयोग ही हमारे समाज की सबसे बड़ी ताकत हैं और हमें शांति, भाईचारे व संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़ा होना चाहिए.

इस कार्यक्रम में सांसद इकरा हसन ने शिवभक्तों के बीच भोजन वितरित किया और उनकी सेवा में जुटे स्वयंसेवकों की सराहना की. इकरा ने इसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की थी. उन्होंने लिखा कि लोकसभा क्षेत्र में कांवड़ यात्रा के लिए सेवा शिविरों का उद्घाटन किया और शिवभक्तों को भोजन परोसने का सौभाग्य मिला. श्रद्धा, सेवा और सहयोग यही हमारे समाज की सबसे बड़ी ताक़त है. आज वक्त है कि हम सब मिलकर शांति, भाईचारे और संविधानिक मूल्यों के साथ खड़े हों.

सपा की सद्भाव वाली पॉलिटिक्स के क्या मायने?

मुस्लिम सपा का कोर वोटबैंक रहा है. उसे ये भी पता है कि सिर्फ मुस्लिम वोट के सहारे सत्ता तक नहीं पहुंचा जा सकता है. इसके लिए हिंदू वोट की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ेगी. कांवड़ यात्रा में हिंदुओं को खुश करने के लिए सपा ने अपने मुस्लिम सांसद को उतारकर ये संदेश देने की कोशिश की कि वो सिर्फ किसी एक धर्म की नहीं है, सभी धर्मों की है.

अखिलेश की यही सोशल इंजीनियरिंग 2024 के लोकसभा चुनाव में काम भी आई थी. पार्टी यूपी में 37 सीटों पर जीतने में सफल रही थी. सपा के पुनरुत्थान ने कई चुनाव विशेषज्ञों और विश्लेषकों को चौंका दिया था. बुंदेलखंड जो पहले बसपा का गढ़ था और जहां 2014 के बाद से बीजेपी ने अपनी पकड़ मज़बूत की थी, सपा ने अप्रत्याशित रूप से अच्छा प्रदर्शन किया. अखिलेश यादव के नेतृत्व में, पार्टी ने कन्नौज, इटावा और बदायूं में जीत हासिल करके यादव क्षेत्र पर भी कब्ज़ा जमा लिया था. उन्होंने प्रतिष्ठित कन्नौज सीट पर भी कब्ज़ा किया.

बीजेपी के किले में सेंध

फैजाबाद का नतीजा खास तौर पर चौंकाने वाला रहा था. उत्तर प्रदेश में बीजेपी की राजनीतिक रणनीति अयोध्या से अटूट रूप से जुड़ी रही है, फिर भी पार्टी को अयोध्या मंडल में पूरी तरह से हार का सामना करना पड़ा. सपा ने फैजाबाद, अंबेडकर नगर और सुल्तानपुर में जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस ने बाराबंकी और अमेठी पर कब्जा कर लिया. सपा के पुनरुत्थान का श्रेय सोशल इंजीनियरिंग पर उसके जोर और संविधान बचाओ की उसकी प्रतिज्ञा को दिया गया था.

पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक की छवि को तोड़कर, पार्टी ने गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के बीच महत्वपूर्ण पैठ बनाई. एक ऐसी उपलब्धि जिसे मुलायम सिंह यादव भी बसपा के सहयोग के बिना हासिल करने के लिए संघर्ष करते रहे. अखिलेश यादव की पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्याक) रणनीति कारगर साबित हुई, खासकर पारंपरिक मुस्लिम-यादव समर्थन के साथ-साथ जाटवों और कुर्मियों को आकर्षित करने में. जिस सोशल इंजीनियरिंग वाले फॉर्मूले को अपनाकर सपा ने 2024 के चुनाव में अपना जलवा दिखाया था वही फॉर्मूला 2027 के विधानसभा चुनाव में वो अपनाती दिख रही है.

मस्जिद में अखिलेश यादव और शिव भक्तों के साथ इकरा हसन, सपा नेताओं की सद्भाव वाली पॉलिटिक्स के क्या हैं मायने?

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