World News: परमाणु बम बनाने के बाद भी क्यों पछता रहा है ये देश? – INA NEWS

World News: परमाणु बम बनाने के बाद भी क्यों पछता रहा है ये देश? – INA NEWS

ईरान और इजराइल की जंग आज दुनिया के सामने है, लेकिन एक ऐसा देश भी है जिसने चुपचाप परमाणु बमों का प्रहार झेला और कभी दुनिया के मंच पर चिल्लाया भी नहीं. बात हो रही है कजाखिस्तान की, जहां सोवियत संघ ने 40 साल तक खुलेआम परमाणु परीक्षण किए.

ये वही जमीन है जहां 1949 से 1989 के बीच 450 से ज्यादा परमाणु बम फोड़े गए, और इसके निशाने पर था “सेमिपलाटिंस्क” एक ऐसा इलाका जो दुनिया का सबसे ज्यादा नुक्सान झेल चुका न्यूक्लियर जोन माना जाता है.

जहां इंसानों पर किए गए न्यूक्लियर एक्सपेरिमेंट

सेमिपलाटिंस्क टेस्ट साइट, जिसे ‘पोलिगॉन’ कहा जाता था, 7,000 स्क्वायर मील में फैला था. ये जगह सोवियत वैज्ञानिकों का परमाणु मैदान बन चुकी थी. यहां 60 साल पहले इतना ताकतवर बम गिराया गया था कि एक पूरा झील ही बन गई. इन धमाकों की तबाही इतनी ज्यादा थी कि इसे चेर्नोबिल से भी ज्यादा खतरनाक बताया गया. लेकिन इन परीक्षणों की जानकारी आम लोगों को तब तक नहीं दी गई, जब तक कि 1980 के दशक में इसकी सच्चाई लीक नहीं होने लगी.

हर घर में कैंसर, हर गांव में मातम

इन बमों के रेडिएशन का असर ऐसा था कि आज भी उस इलाके के लोग कैंसर, दिल की बीमारी, बांझपन और मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं. लाखों लोगों को रेडिएशन पासपोर्ट देकर सरकार ने माना कि वे विकिरण की चपेट में आ चुके हैं, लेकिन इलाज के नाम पर हालात आज भी शर्मनाक हैं.

यहां कैंसर हॉस्पिटल हमेशा भरे रहते हैं. बच्चों में जन्मजात बीमारियां, विकृति, डाउन सिंड्रोम और आत्महत्या की दरें बाकी दुनिया से कई गुना ज्यादा हैं. लोग अब इस तबाही के साथ जीने के आदी हो चुके हैं.

एक ऐसा शहर जहां हवा तक नापी जाती थी

सेमिपलाटिंस्क के पास ही एक सीक्रेट शहर बसाया गया था कुर्चाटोव, जिसे ‘सेमिपलाटिंस्क-21’ भी कहा जाता था. यहां परमाणु वैज्ञानिक, सेना और अधिकारी रहा करते थे. विस्फोटों की टाइमिंग तक इस हिसाब से तय होती थी कि हवा का रुख उनके शहर की तरफ न हो. बाहर के गांवों में लोग भूखे मरते रहे, लेकिन इस सीक्रेट टाउन में हर चीज राजधानी से सप्लाई होती थी. फर्क साफ था एक तरफ सेना का शहर, दूसरी तरफ बलि चढ़ते गांव.

मुआवजा भी ऐसा जैसे मज़ाक

1992 में एक कानून बना जिससे विकिरण झेल चुके लोगों को हर महीने 30 पाउंड (करीब 3,000 रुपये) देने की व्यवस्था की गई, लेकिन आज ये रकम इलाज तो दूर, दवा तक नहीं खरीद पाती. अगर कोई व्यक्ति इलाके से बाहर चला जाए तो उसकी मुआवजा राशि भी खत्म हो जाती है. कई परिवारों को अपने बच्चों के लिए यह रेडिएशन पासपोर्ट तक नहीं मिल पा रहा.

अब भी कई लोग ‘एटॉमिक लेक’ में मछलियां पकड़ते दिखते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अब खतरा टल चुका है. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि जमीन के भीतर आज भी रेडिएशन दबा हुआ है, और उसका असर आने वाली पीढ़ियों तक रहेगा.
नतीजा साफ है दुनिया जिन परमाणु ताकतों को शक्ति मानती रही, वहीं किसी और की ज़िंदगी के लिए मौत का फॉर्मूला बन गईं. कज़ाखिस्तान इसका सबसे कड़वा उदाहरण है.

परमाणु बम बनाने के बाद भी क्यों पछता रहा है ये देश?

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