Nation- क्या पंजाब में होगा महाराष्ट्र जैसा हाल? अकाली दल में फूट के बाद संकट में सुखबीर बादल- #NA

क्या पंजाब में होगा महाराष्ट्र जैसा हाल? अकाली दल में फूट के बाद संकट में सुखबीर बादल

सुखबीर सिंह बादल और ज्ञानी हरप्रीत सिंह

पंजाब की सियासत की जन्मदाता और सिख पंथ की अग्रणी पार्टी शिरोमणि अकाली दल दोफाड़ हो चुकी है. पार्टी की नीतियों की खिलाफत करने के लिए खड़ा हुआ बागी गुट आज इतना मजबूत हो चला है कि अकाली दल के लिए ही चुनौती बनने जा रहा है. बागी गुट के अध्यक्ष का चुनाव हो चुका है और इसके अध्यक्ष बनाए गए हैं ज्ञानी हरप्रीत सिंह… वही ज्ञानी जी… जिनका विवादों के साथ गहरा नाता रहा है. कभी बीजेपी के साथ नजदीकियों का आरोप तो कभी आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा और बॉलीवुड एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा की सगाई में मेहमान बनकर जाना या फिर सुखबीर बादल को धार्मिक सजा सुनाए जाने वाले पांच सिंह साहिबानों में शामिल होना.

आगे बढ़ने से पहले बागी गुट के जन्म पर थोड़ी बात कर लेते है. शिरोमणि अकाली दल में फूट पड़ी तो बागी नेताओं ने अपना एक अलग गुट बना लिया और पार्टी प्रधान सुखबीर बादल के खिलाफ मिलकर आवाज बुलंद कर दी. पहले से ही बरगाड़ी गोलीकांड और गुरमीत राम रहीम की माफी को लेकर विवादों में घिरे सुखबीर बादल पर ये बगावत काफी भारी पड़ गई. बागियों ने बड़ी मजबूती के साथ एकजुट होकर उनके खिलाफ श्री अकाल तख्त पर शिकायत दी और उन्हें पांच सिंह साहिबानों की अदालत में ला खड़ा किया.

धर्म की कचहरी में सुखबीर बादल ने अपने सभी गुनाह कबूल कर लिए. जिसपर उन्हें धार्मिक सजा भी सुनाई गई. लेकिन उनके इस कबूलनामे से पहले से ही नाराज चल रहे सिख समुदाय की नाराजगी और भी ज्यादा बढ़ गई. उन्हें पार्टी अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया, हालांकि बाद में फिर से उन्हें सर्वसम्मति से उनके करीबी नेताओं ने अध्यक्ष चुना. लेकिन इन सबके बीच पार्टी में पड़ी फूट की खाई और भी ज्यादा गहरी होती चली गई. सुखबीर बादल ने हाथ जोड़ कर सभी बागियों को वापस आने की अपील भी की, लेकिन उनकी इस अपील में दम नहीं दिखाई दिया.

बादल को करना होगा चुनौती की कड़ी धूप का सामना!

सुखबीर बादल को सजा सुनाने का साथ ही सिंह साहिबानों ने बीते साल 2 दिसंबर को 7 सदस्यीय भर्ती कमेटी का भी गठन किया था, लेकिन बाद में एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी और पूर्व अध्यक्ष किरपाल सिंह बडूंगर के हटने के बाद इस कमेटी में पाच मैंबर रह गए. अब इसी कमेटी ने पंथक पार्टी का गठन किया है, जिसकी कमान ज्ञानी हरप्रीत सिंह को सौंपी गई है. तो वहीं बीबी सतवंत को इसका चेयरपर्सन नियुक्त किया है. पंथक पार्टी सुखबीर बादल वाली पार्टी के बराबर ही काम करेगी, जिससे जाहिर है कि आने वाले दिनों में बादल साहिब को चुनौती की कड़ी धूप का सामना करना पड़ सकता है.

इस पंथक पार्टी की टीम ने बीते 6 महीनों में 15 लाख मैंबर बनाने का दावा किया है, जो अपने आप में काफी बड़ा आंकड़ा है. अब इस पार्टी के गठन के बाद माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में बादल साहिब की राह आसान नहीं है. उन्हें कभी अपने रहे इन विरोधियों से कड़ा मुकाबला मिल सकता है. वहीं, उधर इस नवजात पार्टी को युवा रूप देने के लिए बैंकखाता खुलवाने, लैटर हैड बनवाने और चुनाव आयोग तक पहुंचने के भी कयास लगाए जा रहे हैं.

पंजाब में महाराष्ट्र वाला खेला!

अगर चुनाव आयोग के सामने ये पंथक पार्टी सुखबीर बादल की पार्टी के चुनाव चिन्ह तकड़ी पर अपना हक जमाने का दावा कर देती है तो उनके लिए अपनी पार्टी का आस्तित्व बचाने की सबसे बड़ी चुनौती आ सकती है. नवनिर्वाचित अध्यक्ष ज्ञानी हरप्रीत सिंह अगर बीते छह महीनों में बनाए गए 15 लाख सदस्यों के कागजात लेकर चुनाव आयोग के सामने असली अकाली दल होने का दावा करते हैं तो यहां भी महाराष्ट्र जैसा खेला देखने को मिल सकता है.

महाराष्ट्र में जब शिवसेना से शिंदे गुट अलग हुआ था तो उसने बाला साहब का असली वारिस होने का दावा कर धनुष वाला चुनाव चिन्ह उनके ही बेटे से ले लिया था. ऐसा ही अगर पंजाब में होता है तो सुखबीर बादल की स्थिति एकदम उद्धव ठाकरे जैसी हो सकती है.

पंजाब में 2027 की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में दोनों ही दल लोगों में अपनी पैठ बनाने की पुरजोर कोशिश करेंगी. अकाली दल की रीढ़ की हड्डी मानी जाने वाली ग्रामीण वोट अगर पंथक पार्टी के पक्ष में आ जाती है तो पंजाब की सबसे पुरानी और पांच बार सूबे पर राज कर चुकी शिरोमणि अकाली दल का क्या होगा. इसके बारे में कुछ भी कहने की शायद जरुरत नहीं है.

क्या पंजाब में होगा महाराष्ट्र जैसा हाल? अकाली दल में फूट के बाद संकट में सुखबीर बादल

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