World News: अल्लाह, आयात और फतवा…इस्लाम के इन शब्दों का बार-बार इस्तेमाल क्यों कर रहा है आसिम मुनीर? – INA NEWS


पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर अपने भाषण में लगातार अल्लाह और फतवा का जिक्र कर रहे हैं. हाल ही में मुनीर की एक स्पीच वायरल हो रही है. इस स्पीच में वो ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र कर रहे हैं. इस दौरान उन्होंने कहा कि भारतीय सेना का दबाव जब चरम पर था, तब पाकिस्तानी सेना को अल्लाह की मदद (Divine Help) ने बचाया. हमने अल्लाह की मदद को आते हुए देखा और इसको महसूस किया.
साथ ही आसिम मुनीर ने अपनी इस स्पीच के दौरान कुरान की एक आयत का हवाला देते हुए कहा, अगर अल्लाह तुम्हारी मदद करे, तो कोई तुम्हें हरा नहीं कर सकता और संकेत दिया कि संघर्ष के दौरान पाकिस्तान को अल्लाह से मदद हासिल हुई है. अब सवाल उठते हैं कि आखिर सेना प्रमुख लगातार क्यों अल्लाह और फतवा का जिक्र कर रहे हैं. आखिर इसके पीछे क्या रणनीति है?
लगातार दे रहे धार्मिक स्पीच
आसिम मुनीर ऑपेरशन सिंदूर के बाद से लगातार अपनी रणनीतिक विफलताओं को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं. इन विफलताओं को छिपाने के लिए वो दैवीय हस्तक्षेप (Divine Intervention) अंधविश्वास और दैवीय चमत्कार का सहारा ले रहे हैं. अब तक ऑपरेशन सिंदूर के बाद वो कई बार लोगों का ध्यान खींचने के लिए अपनी स्पीच में खुदा का नाम लेते सुनाई दिए हैं.
कब-कब लिया अल्लाह का नाम
इस साल भारत के साथ सैन्य तनाव, आंतरिक सुरक्षा हालात और राजनीतिक संकट के बीच मुनीर ने कई मौकों पर अपने भाषणों में अल्लाह का नाम लिया. भारत के साथ मई में हुए सैन्य टकराव के बाद उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अल्लाह की मदद मिली और उसको इसका फायदा हुआ.
सैन्य अधिकारियों और धार्मिक कार्यक्रमों में उन्होंने कुरान की आयतें पढ़ीं. जैसे अगर अल्लाह मदद करे तो कोई हरा नहीं सकता. आतंरिक अस्थिरता, आतंकवाद और बलूचिस्तान-खैबर पख्तूनख्वा जैसे इलाकों की स्थिति पर बोलते समय भी उन्होंने इसे ईमान की लड़ाई जैसे शब्दों से जोड़ा.
“ये अल्लाह की सेना”
पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने पिछले महीने भारतपाकिस्तान के बीच हुए टकराव का जिक्र करते हुए एक बार फिर धार्मिक भाषा का इस्तेमाल किया था. डॉन अखबार के अनुसार, मुनीर ने कहा था, भारत के साथ युद्ध के दौरान अल्लाह ने हमारी मदद की और हमें सिर ऊंचा रखने का हौसला दिया. जब कोई मुसलमान अल्लाह पर भरोसा करता है, तो वो दुश्मन की ओर फेंकी गई मिट्टी को भी मिसाइलों में बदल देता है.
उन्होंने आगे कहा, यह सेना अल्लाह की सेना है और हमारे सैनिक उसी के नाम पर लड़ते हैं.
आसिम मुनीर ने धार्मिक भाषा का इस्तेमाल अप्रैलदिसंबर 2025 के बीच कई बार किया है, खासकर भारत के साथ मई टकराव और राष्ट्रीय उलेमा सम्मेलन में. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अल्लाह की मदद (divine intervention) मिली.
धार्मिक भाषण पाकिस्तान में क्यों अहम?
पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है. इस देश में बड़ी तादाद में इस्लाम के मानने वाले रहते हैं. ज्यादातर लोगों का मानना है कि धर्म से लोग खास जुड़ाव महसूस करते हैं. जब बात धर्म की आती है तो लोग उस पर विश्वास करते हैं. साथ ही pewresearch की रिपोर्ट में सामने आया कि पाकिस्तान में 84% लोग ऐसे हैं जो चाहते हैं कि देश में शरिया कानून लागू हो जाए.
इसी के चलते मुनीर का बार-बार अल्लाह का जिक्र करना बताता है कि वो लोगों को सीधा संदेश देना चाहते हैं कि वो अल्लाह को मानने वाले हैं. साथ ही वो धार्मिक वोटबैंक को अपने हित में रखना चाहते हैं. वहीं, दूसरी तरफ पाकिस्तान में धार्मिक संगठन लब्बैक और टीटीपी का दबदबा बढ़ रहा है. इसी के चलते मुनीर बार-बार धार्मिक स्पीच दे रहे हैं ताकि वो भी लोगों को साधे रख सके.
साथ ही पाकिस्तान में धर्म सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि राजनीति और सत्ता का बड़ा औजार है. सेना खुद को लंबे समय से इस्लामी राष्ट्र का रक्षक बताती आई है. आम जनता के एक बड़े हिस्से पर धार्मिक भावनाओं का गहरा असर होता है. जब सेना या सरकार पर सवाल उठते हैं, तो धर्म का सहारा लेकर आलोचना को दबाना आसान हो जाता है.
क्या है मुनीर की रणनीति?
आसिम मुनीर एक इमाम के बेटे हैं. मुनीर ने मदरसे में इस्लामी शिक्षा ली और सऊदी अरब में तैनाती के दौरान कुरान हिफ्ज किया है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद लगातार वो धार्मिक स्पीच देते रहे हैं. लेकिन, इन भाषणों के पीछे रणनीति है.
पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर के बार-बार अल्लाह, खुदा की मदद और धार्मिक संदर्भों (जैसे फतवा जैसी भाषा) का इस्तेमाल करने के पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत कारण माने जा रहे हैं.
दरअसल, पाकिस्तान की ऑपरेशन सिंदूर के दौरान विफलताओं के चलते सेना की छवि गिर रही है और जनता में गुस्सा बढ़ रहा है. साथ ही गाजा में पाकिस्तानी सैनिक को अमेरिका के कहने पर तैनात करना है या नहीं इस पर भी आसिम मुनीर इस समय घिरे हुए हैं. एक तरफ उन पर अमेरिका से ऐसा करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. वहीं, दूसरी तरफ अगर वो गाजा में पाकिस्तानी सैनिकों को तैनात करते हैं तो उनकी अपनी ही आवाम जो इजराइल के खिलाफ है वो इसके खिलाफ आवाज उठा सकती है.
इमरान खान को लेकर हलचल तेज
इसी के साथ इस वक्त देश में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को लेकर भी हलचल तेज है. इमरान खान की गिरफ्तारी और सजा के बाद सेना पर राजनीतिक दखल के आरोप लगे हैं. ऐसे में धार्मिक भाषा से वो सेना को ईश्वर की राह पर चलने वाली संस्था के रूप में पेश करना चाहते हैं. वो ऐसा बार-बार कहते भी रहे हैं कि उनकी सेना अल्लाह के रास्ते पर चलती है. इससे आलोचकों को देश और धर्म विरोधी ठहराने में मदद मिलती है.
कुल मिलाकर, अपनी विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए और जनता को अपनी तरफ खींचे रखने के लिए मुनीर बार-बार धार्मिक स्पीच का सहारा लेते हैं.
मुनीर की मौजूदा मुश्किलें
आसिम मुनीर कई मोर्चों पर दबाव में हैं, इमरान खान समर्थकों का गुस्सा और लगातार विरोध दिखाई दे रहा है. इमरान खान की वजह से मुनीर के पास लोगों का जन आधार नहीं है. इसी के साथ देश की खराब आर्थिक हालात, महंगाई और IMF का दबाव बढ़ता जा रहा है. देश गले तक कर्ज में डूबा है और महंगाई चरम पर है.
आतंकवाद बन रहा मुश्किल
इसी के साथ अफगानिस्तान के साथ छिड़ा हुआ तनाव भी मुश्किल बढ़ा रहा है. पाकिस्तान में आतंकवाद और अलगाववादी हिंसा में बढ़ोतरी हो रही है. आए दिन देश में टीटीपी और बीएलए आतंक मचा रहे हैं. पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में शुक्रवार को बलूच विद्रोहियों ने आतंक मचाया. दो ट्रेनों जाफर एक्सप्रेस और बोलन मेल यात्री ट्रेन पर हमला किया.
ग्लोबल टेररिज़्म इंडेक्स 2025 के अनुसार पाकिस्तान में आतंकी हिंसा तेजी से बढ़ी है और इसमें तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी की बड़ी भूमिका है. साल 2024 में टीटीपी ने पाकिस्तान में 482 आतंकी हमले किए, जिनमें 558 लोगों की मौत हुई. यह पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी बढ़ोतरी है.
पूरे पाकिस्तान में 2024 के दौरान आतंकवाद से कुल 1,081 लोगों की जान गई, जो 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. इनमें ज्यादातर हमले खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में हुए, जहां टीटीपी के 96 प्रतिशत हमले दर्ज किए गए. इन हालात में धर्म एक ऐसा सहारा बन जाता है जिससे सेना खुद को मजबूत और नैतिक रूप से सही दिखा सके.
मुनीर का बार-बार अल्लाह और धार्मिक शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि सत्ता, राजनीति और संकट प्रबंधन का हिस्सा है. जब हालात हाथ से फिसलते दिखते हैं, तब पाकिस्तान की सत्ता संरचना अक्सर धर्म की ओर लौटती है — और इस साल मुनीर उसी रास्ते पर चलते दिखाई दे रहे हैं.
पहले भी लिया गया धर्म का सहारा
पाकिस्तान में सेना लंबे समय से धर्म का सहारा लेकर अपनी ताकत को जायज ठहराती रही है. जनरल जिया-उल-हक के समय से इस्लाम को राज्य और सेना की नीति से जोड़ दिया गया, ताकि सत्ता पर पकड़ मजबूत रहे. सेना को अल्लाह की सेना बताकर राजनीतिक फैसलों और दमन को धार्मिक रूप दिया गया. जिया भी अपने समय में सेना को अल्लाह की सेना बताते रहे हैं.
आज आसिम मुनीर भी उसी रास्ते पर चलते दिखते हैं. अपने भाषणों में बार-बार अल्लाह और धर्म का जिक्र करके वो सेना को धार्मिक रूप से श्रेष्ठ दिखाना चाहते हैं, ताकि जनता का समर्थन मिले और राजनीतिक विरोध को कमजोर किया जा सके.
अल्लाह, आयात और फतवा…इस्लाम के इन शब्दों का बार-बार इस्तेमाल क्यों कर रहा है आसिम मुनीर?
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