World News: चीन ने लैब में बनाया चिकन जैसा प्रोटीन, क्या खत्म होने वाली है चिकन फार्मिंग? – INA NEWS

World News: चीन ने लैब में बनाया चिकन जैसा प्रोटीन, क्या खत्म होने वाली है चिकन फार्मिंग? – INA NEWS

चीन के वैज्ञानिकों ने एक खास प्रकार के फंगस में जीन एडिटिंग करके ऐसा प्रोटीन बनाया है, जो चिकन जैसे मांस का सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकता है. यह फंगस Fusarium venenatum कहलाता है. इसका इस्तेमाल पहले से ही मीट जैसे स्वाद वाले फूड आइटम्स बनाने में होता है. अब चीनी वैज्ञानिकों ने CRISPR तकनीक से इस फंगस को और बेहतर बना दिया है. खास बात यह है कि इसमें किसी दूसरे जीव का DNA नहीं डाला गया, बल्कि इसके अपने जीन बदले गए हैं.

इस फंगस से बनने वाले प्रोटीन को मायकोप्रोटीन कहते हैं. इसका टेक्सचर और स्वाद मांस जैसा होता है, लेकिन इसे बनाने में बहुत कम जमीन, कम पानी और कम ऊर्जा लगती है. यह चिकन की तुलना में बहुत कम प्रदूषण फैलाता है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम करता है. यही कारण है कि दुनिया भर में इसे एक सुरक्षित और टिकाऊ भोजन माना जा रहा है.

दुनिया को ऐसे प्रोटीन की जरूरत क्यों ?

चीनी रिसर्च टीम के वैज्ञानिक लियू शियाओ के अनुसार, दुनिया में तेजी से बढ़ती आबादी के कारण अब ऐसे प्रोटीन की जरूरत है, जो अधिक पौष्टिक हो और पर्यावरण को नुकसान भी न पहुंचाए. उनके अनुसार, जीन एडिटिंग ने इस फंगस को न सिर्फ अधिक पौष्टिक बनाया है बल्कि इसका उत्पादन भी बहुत कम संसाधनों में होने लगा है.

दुनिया भर में पशुपालन लगभग 40% कृषि भूमि घेरता है. इसमें बहुत सारा पानी लगता है. इस दौरान कुल ग्रीनहाउस गैसों का लगभग 14.5% उत्सर्जन होता है. यही कारण है कि वैज्ञानिक वैकल्पिक प्रोटीन के नए स्रोत ढूंढ रहे हैं.

एडिटेड फंगस के क्या फायदे हैं

  1. 44% कम पोषक तत्वों का उपयोग करता है
  2. मायकोप्रोटीन 88% तेज बनता है
  3. कुल मिलाकर पर्यावरण पर 61% तक कम असर
  4. चिकन फार्मिंग की तुलना में 70% कम जमीन की जरूरत
  5. जल प्रदूषण का खतरा 78% कम

मायकोप्रोटीन 3 देशों में पहले से मंजूर

मायकोप्रोटीन पहले से अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में खाने के लिए मंजूर है. Quorn नाम की ब्रिटिश कंपनी इसी फंगस से नकली चिकन नगेट्स और मीट जैसे उत्पाद बनाती है. वैज्ञानिकों ने फंगस के मेटाबॉलिज्म में बदलाव किए, जिससे कोशिकाओं में मौजूद अधिक प्रोटीन उपयोग में आने लगा. इससे उत्पाद की गुणवत्ता भी बढ़ी और उत्पादन में जरूरत पड़ने वाली शुगर लगभग 40% तक कम होने की संभावना है.

रिसर्च टीम ने छह देशों के ऊर्जा डेटा की तुलना करके बताया कि इस एडिटेड फंगस को अपनाने से पर्यावरणीय प्रभाव 4% से 61% तक कम हो सकता है. यह चिकन की तुलना में कम जमीन, कम उत्सर्जन और कम प्रदूषण पैदा करेगा. वैज्ञानिकों ने कहा कि CRISPR और मेटाबॉलिक इंजीनियरिंग भविष्य में ऐसे प्रोटीन बनाने के लिए सबसे शक्तिशाली तकनीक बन सकती है, जो स्वाद में मांस जैसा हो और प्रकृति के लिए सुरक्षित भी.

चीन ने लैब में बनाया चिकन जैसा प्रोटीन, क्या खत्म होने वाली है चिकन फार्मिंग?

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