World News: गुटनिरपेक्षता से मल्टी एलाइनमेंट तक… ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में जाने से क्यों झिझक रहा भारत? – INA NEWS

World News: गुटनिरपेक्षता से मल्टी एलाइनमेंट तक… ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में जाने से क्यों झिझक रहा भारत? – INA NEWS

आजादी के बाद से ही भारत गुटनिरपेक्षता (Non Alignment) की नीति पर चलता रहा. इसका लाभ यह हुआ कि शीत युद्ध (COLD WAR) के दौर में भारत अमेरिका (USA) और सोवियत संघ (USSR) दोनों से समान दूरी बनाए रखने में कामयाब रहा. हालांकि 1971 की जीत के बाद से इंदिरा गांधी ने USSR की तरफ झुकाव दिखाया लेकिन सोवियत खेमे से तब भी भारत ने दूरी रखी. 1991 में जब सोवियत संघ बिखरा तब एकमात्र महाशक्ति अमेरिका बना. भारत ने अमेरिका की LPG (Liberalisation, Privatisation, Globalisation) पॉलिसी को तो अपनाया किंतु वह अमेरिका का पिछलग्गू नहीं बना. लेकिन अब दुनिया में अमेरिका अकेली महाशक्ति नहीं है उसके समानांतर रूस, चीन और योरोपीय महासंघ नयी ताकत बनकर उभरे हैं. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने मझोली शक्तियों वाले देशों को भी एकजुट होने की अपील की है.

कूटनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता

ऐसे समय में भारत की मल्टी एलाइनमेंट की विदेश नीति उसकी रीढ़ सीधी किए हुए है. अन्यथा हमारे पड़ोसी देश जिस तरह से बोर्ड ऑफ़ पीस के ड्राफ़्ट पर दस्तख़त कर ट्रंप के पिछलग्गू बने हुए हैं, कमोबेश वही हाल हमारा भी होता. भारत सरकार ने इन सभी महाशक्तियों से व्यापार करने का रास्ता खोल रखा है. उसका मानना है कि कूटनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है न दुश्मन. अपने हितों को ऊपर रखना चाहिए. इसी नीति पर चलकर मोदी सरकार डोनाल्ड ट्रंप के इस ड्राफ़्ट पर दस्तख़त करने से बच रही है. डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद से अमेरिका हर तरह की क्रूरता और मनमानी कर रहा है. वह अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को भी नए रूप में गढ़ने के लिए बोर्ड ऑफ़ पीस जैसी संस्थाएं बना रहा है. दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में दख़ल कर रहा है. वह उन सब देशों को अपना हिस्सा मानता है, जिनमें प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं.

दोस्ती है लेकिन भारत किसी खेमे में नहीं

ट्रंप का कहना है कि दुनिया के तमाम देशों के बीच चल रहे झगड़ों को शांत करने के उद्देश्य से ही उन्होंने बोर्ड ऑफ पीस का गठन किया है. वे अब दुनिया के देशों से इस बोर्ड में शामिल होने की अपील कर रहे हैं. यूं तो उन्होंने इसका उद्देश्य गाजा में शांति समझौते को अमल में लाने को कहा है पर असल में इसके पीछे अमेरिकी वर्चस्व को स्थापित करने की कोशिश है. इसमें शामिल होने का अर्थ है, रूस को नाराज कर लेना क्योंकि अमेरिका चीन की निरंतर बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था को खुद के लिए चुनौती मान रहा है. भारत इतना तो समझता ही है कि भले चीन और भारत के बीच दोस्ती में कई किंतु-परंतु हों मगर यदि वह अमेरिका के साथ गया तो वर्षों पुराने दोस्त रूस को नाराज़ कर लेगा. दोस्ती और किसी के ख़ेमे में रहने में अंतर होता है. भारत की रूस से दोस्ती है, अमेरिका से भी दोस्ती है पर अभी तक वह किसी ख़ेमे में नहीं रहा.

इस्लामिक देशों का नाटो

इसीलिए अमेरिका ने जैसे ही विश्व के तमाम देशों को बोर्ड ऑफ़ पीस में आने का न्योता दिया, पाकिस्तान उसके साथ चला गया. अकेले पाकिस्तान ही नहीं कई इस्लामिक देश जैसे संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को, तुर्किये, कतर, अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, मलयेशिया, ज़ोर्डन, कजाकिस्तान, उज़बेकिस्तान, कोसोवो, पाकिस्तान, मंगोलिया, पराग्वे और सउदी अरब भी इस बोर्ड में चले गए. इन देशों के प्रमुख ने अमेरिकी चार्टर पर सहमति जता दी है. कुछ ने इस चार्टर पर दस्तख़त भी कर दिए हैं. पर भारत ने अभी तक दूरी बनाई हुई है. यूं इस बोर्ड में आने वाले अधिकतर देश मुस्लिम हैं. इसलिए इसे इस्लामिक राष्ट्रों नाटो भी कहा जा रहा है. अब सवाल उठता है कि क्या ये देश गाजा में अपनी सेनाएं भेजेंगे? गाजा में इन देशों की सेना जाएगी तो निशाने पर फ़िलिस्तीनी लड़ाके भी आएंगे.

बोर्ड ऑफ़ पीस में ट्रंप ही ट्रंप!

डोनाल्ड ट्रंप अपने बड़बोले अंदाज़ में यह कहकर भारत को चिढ़ाते हैं कि मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत और पाकिस्तान के बीच जो युद्ध शुरू हुआ था, उसे उन्होंने रुकवाया था. भारत ने आज तक ट्रंप की इस बात को लेकर जोरदार अंदाज में खंडन भले नहीं किया हो किंतु ट्रंप के इस दावे को स्वीकार भी नहीं किया. फिर भी ट्रंप विश्व मंच पर यह बात अक्सर कहते रहते हैं. ऐसे में पाकिस्तान का अमेरिकी चार्टर में शरीक होना भारत को उससे दूर रखेगा. इस बोर्ड ऑफ़ पीस में डोनाल्ड ट्रंप आजीवन अध्यक्ष होंगे और साथ ही टीम में उन्होंने अपने भरोसेमंद लोग रखे हैं. जारेड कुशनर, मार्को रूबियो, स्टीव विटकॉफ, टोनी ब्लेयर, अजय बंगा, मार्क रोवेन और रॉबर्ट गैब्रियल. वर्ल्ड इकोनामिक फ़ोरम (WEF) की दावोस बैठक में जारेड कुशनर ने ही गाजा के विकास का अमेरिकी मॉडल पेश किया. यह सब उनका बोर्ड ऑफ़ पीस करेगा.

UNSC की उपेक्षा

ट्रंप ने यह नहीं बताया कि क्या गाजा प्लान से फ़िलिस्तीन और इज़राइल के मध्य संघर्ष विराम रुक जाएगा, क्योंकि इस प्लान में फ़िलिस्तीन राज्य का उल्लेख तक नहीं है? वे यह भी नहीं बता सके कि जब संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद (UNSC) पहले से बनी हुई है और उसमें अमेरिका के साथ रूस, चीन, जर्मनी और फ़्रांस हैं तो इस बोर्ड ऑफ़ पीस की क्या ज़रूरत? भारत अपने को UNSC में आने की मांग वर्षों से कर रहा है पर उसे स्थायी सदस्यता नहीं मिली है. इसके अलावा भारत अब ग्लोबल साउथ देशों के नेता पर खुद को स्थापित कर चुका है, ऐसे में वह कैसे उस संगठन में शामिल हो जाए जिसमें ग्लोबल साउथ देशों (विकासशील देशों) के हितों के बारे में सोचा ही नहीं जा रहा हो. अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देशों तथा छोटे-छोटे एशियाई देशों के बाबत बोर्ड ऑफ़ पीस ने चुप्पी बरती हुई है.

ट्रंप के दामाद का अपरहैंड!

बोर्ड ऑफ़ पीस की 20 सूत्री कमेटी में जो लोग रखे गए हैं उनमें से टोनी ब्लेयर तो ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री हैं उनको मध्य पूर्व में शांति बहाली का श्रेय जाता है. जारेड कुशनर तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद हैं और उनके खाते में अब्राहम समझौते को पूरा करने का तमग़ा है. वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष हैं अजय बंगा तथा मार्को रूबियो अमेरिका के विदेश मंत्री हैं. स्टीव विटकॉफ और मार्को रोवेन उद्योगपति तथा कारपोरेट घरानों के मालिक हैं. रॉबर्ट गेब्रियल को सुरक्षा तथा रणनीतिक मामलों का जानकार बताया गया है. अब्राहम समझौते के तहत ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर ने UAE, बहरीन, इज़राइल और कई अन्य अरब देशों के बीच राजनीतिक तथा कूटनीतिक शांति स्थापित की थी. यह समझौता 2020 में हुआ था. तब डोनाल्ड ट्रंप का पहला कार्यकाल चल रहा था.

मल्टी एलाइनमेंट की नीति ही बेहतर

दावोस में जब जारेड कुशनर ने इस चार्टर को लॉन्च किया तब भी भारत इस मौक़े पर अनुपस्थित रहा. सिर्फ 35 देश लॉन्च के वक्त वहां थे. रूस और चीन भी ग़ैरहाज़िर रहे. भारत के समक्ष रूस की नाराज़गी भी एक मुद्दा है दूसरा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल मुनीर की इस समझौते में अतिरिक्त रुचि भी भारत को इस बोर्ड ऑफ़ पीस से दूर कर रही है. भारत ऐसे किसी भी संगठन में नहीं जाना चाहता जो संयुक्त राष्ट्र की शक्तियों को कमजोर करने वाला हो. डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल भारत के लिए शुभ नहीं है. ट्रंप ने न सिर्फ भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ़ लगाया है बल्कि वे बार-बार सार्वजनिक मंचों पर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपमानित भी करते रहते हैं. ऐसे में कैसे कोई स्वाभिमानी देश ट्रंप के अर्दब में आएगा. इसके अतिरिक्त भारत की सबसे समान दूरी बनाने का निश्चय भी उसे इस समझौते से दूर कर रहा है.

गुटनिरपेक्षता से मल्टी एलाइनमेंट तक… ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में जाने से क्यों झिझक रहा भारत?

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