World News: मां की आजादी की कीमत और राजनीति से दूर रहने की शपथ… तारिक रहमान की वो कसम जिसने बदल दी बांग्लादेश की सियासत – INA NEWS

बांग्लादेश के चुनावी नतीजों ने देश की राजनीति को नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. इस बार के चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बीच जो सबसे बड़ी घटना रही, वो थे 17 साल का वनवास काटकर ढाका वापस लौटे ‘तारिक रहमान’. कभी अपने ही हाथों से साइन किए हुए शपथ पत्र के कारण राजनीति से दूर रहने को मजबूर हुए तारिक अब उसी कसम को तोड़कर देश की सत्ता के केंद्र में लौट आए हैं. इस बार के चुनाव में तारिक रहमान की सुनामी ऐसी आई कि उनकी बांग्लादेश नेश्नलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी ने 200 से अधिक सीटों पर कब्जा जमा लिया. तारिक रहमान की इस तरह से वापसी सिर्फ एक नेता की वापसी नहीं है बल्कि बांग्लादेश की राजनीति, उसकी दिशा और उसकी ‘जियोग्राफी’ यानी सत्ता के संतुलन को बदलने वाली घटना बन गई है.

तारिक रहमान की सफलता की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस दौर की है जिसमें लोकतंत्र, सत्ता संघर्ष, परिवारवाद, साजिश, वनवास और वापसी, सब एक साथ जुड़े हुए हैं.

17 साल का वनवास और वापसी की कहानी

तारिक रहमान का नाम बांग्लादेश की राजनीति में कोई नया नहीं है. वे पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं और लंबे समय तक उन्हें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) का ‘क्राउन प्रिंस’ माना जाता रहा. लेकिन 2007-08 के राजनीतिक संकट के दौरान हालात ऐसे बने कि उन्हें देश छोड़ना पड़ा. उन पर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और हिंसक घटनाओं में शामिल होने जैसे गंभीर आरोप लगे. गिरफ्तारी, हिरासत और कथित यातनाओं के बाद उन्हें इलाज के लिए लंदन जाने की अनुमति मिली. लेकिन यह अनुमति एक शर्त के साथ आई, उन्हें लिखित रूप में यह वादा करना पड़ा कि वे बांग्लादेश की राजनीति में वापस नहीं आएंगे. यही वह कसम थी जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी. लंदन में बिताए गए 17 साल उनके लिए राजनीतिक रूप से ‘वनवास’ जैसे थे. वे न तो खुलकर राजनीति कर सकते थे और न ही पूरी तरह उससे अलग हो सकते थे. वे पर्दे के पीछे से पार्टी को संभालते रहे लेकिन सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब रहे.

Bnp Tariq Rahman Pti

जब शपथ बनी राजनीतिक हथकड़ी

तारिक रहमान का वह शपथ पत्र सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं था, बल्कि एक तरह से उनकी राजनीतिक पहचान पर लगी रोक थी. उनकी मां खालिदा जिया की गिरफ्तारी और बीएनपी पर बढ़ते दबाव के बीच यह कसम उनके लिए मजबूरी बन गई थी. उस समय बांग्लादेश में ‘माइनस टू’ फॉर्मूला लागू किया जा रहा था, जिसका उद्देश्य था, देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों, शेख हसीना और खालिदा जिया, दोनों के प्रभाव को खत्म करना. इस माहौल में तारिक रहमान को देश से बाहर भेजा गया और राजनीति से दूर रहने की शर्त लागू की गई. कहते हैं न राजनीति में सबसे बड़ा खिलाड़ी होता है ‘समय’. 17 साल बाद वही शपथ अब अप्रासंगिक हो चुका है और परिस्थितियों ने उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बैठा दिया है.

माइनस टू फॉर्मूला और राजनीतिक उथल-पुथल

2006 के बाद बांग्लादेश में जबरदस्त राजनीतिक अस्थिरता देखने को मिली. चुनावी विवाद, विरोध प्रदर्शन और अंततः आपातकाल ने पूरे देश को हिला दिया.सैन्य-समर्थित अंतरिम सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया और बड़े पैमाने पर नेताओं को गिरफ्तार किया.इसी दौरान ‘माइनस टू’ फॉर्मूला सामने आया, जिसका मकसद देश की राजनीति से दो प्रमुख नेताओं (शेख हसीना और खालिदा जिया) को हटाना था.इसका असर सीधे तौर पर तारिक रहमान पर पड़ा. उन पर 20 मिलियन डॉलर की मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगा, साथ ही अन्य मामलों में भी उन्हें घेरा गया. 2004 के ढाका ग्रेनेड हमले में भी उन्हें मुख्य आरोपी बनाया गया और अदालत ने उन्हें सजा सुनाई. यह वह दौर था, जब बीएनपी लगभग टूटने की कगार पर थी और पार्टी के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए थे.

Tarique Khalida

मां की बीमारी और बेटे की कीमत

खालिदा जिया ने अपने बेटे की गिरफ्तारी को लेकर जो बयान दिए, वे उस दौर की संवेदनशीलता को दिखाते हैं.उन्होंने कहा था कि उनके बेटे को उनकी आंखों के सामने उठाया गया और हिरासत के बाद इतनी खराब हालत में भेजा गया कि उसे स्ट्रेचर पर विदेश ले जाना पड़ा.यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि एक मां और बेटे के रिश्ते की भी कहानी थी.तारिक की रिहाई और विदेश जाने की अनुमति के पीछे उनकी मां की बीमारी और अंतरराष्ट्रीय दबाव भी एक कारण माना जाता है.लेकिन इसकी कीमत वही शपथ थी, जिसने तारिक को हमेशा-हमेशा के लिए राजनीति से दूर कर दिया.

लंदन में फेसबुक राजनीति और परदे के पीछे नेतृत्व

बांग्लादेश से बाहर निकाले जाने के बाद तारिक रहमान ने खुद को पूरी तरह राजनीति से अलग नहीं किया. उन्होंने डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करते हुए फेसबुक राजनीति शुरू की. वे वर्चुअल रैलियां करते थे, स्काइप के जरिए उम्मीदवारों से बातचीत करते थे और पार्टी के फैसलों में शामिल रहते थे.2014 के चुनाव का बहिष्कार भी बीएनपी ने उनके नेतृत्व में किया.हालांकि वे सार्वजनिक रूप से सक्रिय नहीं थे, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी पकड़ बनी रही.दूर से राजनीति चलाने का ये एक नया प्रयोग था.

2024 की छात्र क्रांति और सत्ता परिवर्तन

बांग्लादेश की राजनीति में असली बदलाव 2024 में आया, जब छात्रों के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए. इन प्रदर्शनों ने धीरे-धीरे आंदोलन का रूप लिया और अंततः शेख हसीना की सरकार को सत्ता से हटना पड़ा.देश में अंतरिम सरकार बनी, जिसका नेतृत्व मोहम्मद यूनुस ने किया.नई सरकार ने कई पुराने मामलों की समीक्षा की और तारिक रहमान के खिलाफ दर्ज मामलों को खत्म कर दिया गया.
यह वही मोड़ था जिसने उनकी वापसी का रास्ता साफ किया.

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बैटल ऑफ बेगम और तीन दशक की राजनीति

बांग्लादेश की राजनीति को समझने के लिए बैटल ऑफ बेगम को समझना जरूरी है.यह संघर्ष था, शेख हसीना और खालिदा जिया के बीच का. 1991 से लेकर तीन दशकों तक दोनों नेताओं ने बारी-बारी से सत्ता संभाली. शेख हसीना अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान की राजनीतिक विरासत लेकर आईं, जबकि खालिदा जिया अपने पति जियाउर रहमान की विरासत को आगे बढ़ा रही थीं. दोनों के बीच यह संघर्ष सिर्फ सत्ता का नहीं था, बल्कि विचारधारा, नीति और राजनीतिक शैली का भी था. इसी संघर्ष के बीच तारिक रहमान एक नई पीढ़ी के नेता के रूप में उभरे.

Bangladesh Voting Today

2026 के चुनाव और बदली राजनीतिक जियोग्राफी

फरवरी 2026 के चुनावों ने बांग्लादेश की राजनीति को नई दिशा दी. जनता के रुझान और राजनीतिक समीकरणों से यह साफ दिखा कि बीएनपी फिर से मजबूत स्थिति में आ गई है.तारिक रहमान की वापसी ने इस बदलाव को और तेज कर दिया.ढाका की सड़कों पर लाखों लोगों का उनका स्वागत करना इस बात का संकेत था कि जनता बदलाव चाहती है.यह सिर्फ सरकार बदलने की बात नहीं थी, बल्कि सत्ता के पूरे संतुलन के बदलने की प्रक्रिया थी, यानी बांग्लादेश की राजनीतिक जियोग्राफी बदल रही थी.

देश लौटने के बाद तारिक रहमान ने अपने भाषण में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात की.उन्होंने कहा कि अब लोगों को अपने अधिकार वापस लेने होंगे. उन्होंने एक समावेशी बांग्लादेश की बात की, जहां सभी धर्मों के लोग सुरक्षित महसूस करें. उन्होंने युवाओं को देश के भविष्य का आधार बताया और उन्हें आगे आने के लिए प्रेरित किया. उनका संदेश साफ था,यह सिर्फ सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं, बल्कि देश को नई दिशा देने का प्रयास है.

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मां की आजादी की कीमत और राजनीति से दूर रहने की शपथ… तारिक रहमान की वो कसम जिसने बदल दी बांग्लादेश की सियासत


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