World News: मुनीर का कंधा और अमेरिकी बंदूक…पाकिस्तान की गद्दारी से छलनी होगा ईरान, ये रहे 4 फैक्ट्स – INA NEWS


ईरान और इजराइल के बीच युद्ध जैसे हालात बन चुके हैं, लेकिन अब इस पूरे समीकरण में अमेरिका और पाकिस्तान की नजदीकियां एक नए खतरे का संकेत दे रही हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की मुलाकात ने कई शक और साजिशों को जन्म दिया है.
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ हो गई है कि अगर अमेरिका खुलकर इस लड़ाई में कूदता है, तो वह पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करेगा और इससे सबसे बड़ा खतरा ईरान को होगा. इस रिपोर्ट में हम आपको 4 ठोस फैक्ट्स के ज़रिए बताते हैं कि कैसे पाकिस्तान की गद्दारी से ईरान मुश्किल में फंस सकता है.
1. जमीन से ईरान को घेरने की तैयारी
ईरान और पाकिस्तान की सीमा करीब 909 किलोमीटर लंबी है. यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है, खासकर बलूचिस्तान और सिस्तान-बलूचिस्तान क्षेत्र में. अमेरिकी रणनीति हमेशा पड़ोसी देशों के जरिए दुश्मन को घेरने की रही है. वहीं, इस बार पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन सकता है. अगर अमेरिका इस युद्ध में शामिल होता है, तो पाकिस्तान की इस 909 किमी लंबी सीमा से ईरान पर दबाव बनाना आसान होगा.
पहले भी अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में इसी तरह की रणनीति अपनाई थी. पड़ोसी देश की जमीन का इस्तेमाल कर सीधे हमले. यही वजह है कि अब जब ट्रंप और मुनीर की मुलाकात हुई है, तो विशेषज्ञों को यह आशंका सता रही है कि अमेरिका पाकिस्तान की जमीन का ‘लॉन्चपैड’ बना सकता है.
2. ईरान को नहीं मिलेगा पाकिस्तान का साथ
हाल के महीनों में ईरान ने कई बार मुस्लिम देशों से अपील की कि वे इज़राइल के खिलाफ आवाज उठाएं या समर्थन दें. पाकिस्तान से भी ईरान ने यह उम्मीद की थी, लेकिन अब तक पाकिस्तान ने सिर्फ ‘नैतिक समर्थन’ दिया है. हाल ही में एक कार्यक्रम में ईरानी अधिकारियों ने कहा था कि पाकिस्तान को खुलकर इजराइल के खिलाफ स्टैंड लेना चाहिए. लेकिन मुनीर-ट्रंप मुलाकात के बाद यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान अब अमेरिकी ब्लॉक में पूरी तरह खड़ा हो गया है.
इससे ईरान को यह संकेत मिल गया है कि पाकिस्तान की ओर से कोई सैन्य या राजनीतिक समर्थन नहीं मिलने वाला. यानी भविष्य में अगर इजराइल-अमेरिका की ओर से बड़ा हमला होता है, तो पाकिस्तान चुपचाप अमेरिका की मदद करता रहेगा और ईरान अकेला पड़ जाएगा.
ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ
3. पाकिस्तान बन सकता है अमेरिका का अगला बेस
मिडिल ईस्ट में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी पहले जितनी मजबूत नहीं रह गई है. इराक और सीरिया में अमेरिकी बेस पर ईरानी समर्थित गुटों ने हमले किए हैं, जिससे अमेरिका को कुछ ठिकाने खाली करने पड़े. अब सवाल उठता है कि अगर अमेरिका को ईरान पर बड़ा हमला करना हो तो वह कहां से ऑपरेशन चलाएगा? इसका जवाब है पाकिस्तान. पाकिस्तान में पहले से अमेरिकी लॉजिस्टिक्स, ड्रोन ऑपरेशन और इंटेलिजेंस नेटवर्क मौजूद हैं.
पहले भी पाकिस्तान ने अमेरिका को एयर बेस इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी. अगर जंग भड़कती है, तो अमेरिका कराची, क्वेटा या तुर्बत जैसे इलाकों में अस्थायी ठिकाने बनाकर हमले की योजना तैयार कर सकता है. ट्रंप और मुनीर की मुलाकात इसी दिशा में पहला संकेत मानी जा रही है.
4. 2001 में भी अमेरिका की ‘गुप्त’ मदद कर चुका है पाकिस्तान
यह कोई पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान अमेरिका की गोपनीय मदद करने जा रहा है. 2001 में जब 9/11 के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ जंग छेड़ी थी, तब भी पाकिस्तान ने खुलकर अमेरिकी सेना को लॉजिस्टिक और खुफिया मदद दी थी. अमेरिका के ड्रोन ऑपरेशन्स, सप्लाई चेन और हवाई मार्ग तक पाकिस्तान की जमीन से संचालित किए गए थे.
यहां तक कि ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान के एबटाबाद में छुपा बैठा था, और अमेरिका ने वहीं जाकर उसे मार गिराया. यह इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा सकता है. बस इस बार निशाना अफगानिस्तान की जगह ईरान होगा. इन 4 फैक्ट्स के साथ ही नीचे भी कुछ पॉइंट के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि पाकिस्तान कैसे अमेरिका की मदद करता है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
ट्रंप की नीतियों में पाकिस्तान की भूमिका पहले से तय
डोनाल्ड ट्रंप जब पहले राष्ट्रपति बने थे, तब भी उनकी विदेश नीति में पाकिस्तान को एक ‘टैक्टिकल पार्टनर’ के रूप में देखा गया था. अब फिर से ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है. ऐसे में पाकिस्तानी सेना के प्रमुख को व्हाइट हाउस में बुलाना और उनके साथ बंद कमरे में चर्चा करना यही संकेत देता है कि पाकिस्तान को एक बार फिर अमेरिकी रणनीति में जगह दी जा रही है.
पाकिस्तान ने हमेशा दोहरा खेल खेला है. एक तरफ वह मुस्लिम देशों के साथ खड़ा दिखता है, दूसरी तरफ अमेरिका से सैन्य और आर्थिक मदद लेता है. अब भी वही चाल चल रही है. लेकिन इस बार इसका नुकसान सीधे ईरान को हो सकता है, क्योंकि जंग की जमीन अब पश्चिम एशिया से दक्षिण एशिया तक खिंचती जा रही है.
ईरान को रणनीतिक नुकसान का अंदेशा
अगर पाकिस्तान की जमीन से अमेरिकी कार्रवाई शुरू होती है, तो ईरान के लिए यह डबल फ्रंट वॉर जैसी स्थिति बन सकती है. पश्चिमी सीमा पर इजराइल और अमेरिका, और ट्र सीमा पर पाकिस्तान. यह स्थिति ईरान के सैन्य संसाधनों को दो हिस्सों में बांट देगी और उसकी प्रतिक्रिया क्षमता कमजोर हो जाएगी.
ईरान लंबे समय से मुस्लिम देशों के बीच एकजुटता की बात करता रहा है. लेकिन अगर पाकिस्तान खुलकर अमेरिका का साथ देता है, तो इससे मुस्लिम एकता की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचेगा. यह खाड़ी देशों के समीकरण को भी उलझा देगा, और तुर्किये जैसे देश भी असमंजस में पड़ सकते हैं कि उन्हें किस ओर खड़ा होना है.
मुनीर का कंधा और अमेरिकी बंदूक…पाकिस्तान की गद्दारी से छलनी होगा ईरान, ये रहे 4 फैक्ट्स
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