World News: टूट जाएगा NATO? अमेरिका की रडार पर क्यों है दुनिया का सबसे मजबूत सैन्य संगठन – INA NEWS

World News: टूट जाएगा NATO? अमेरिका की रडार पर क्यों है दुनिया का सबसे मजबूत सैन्य संगठन – INA NEWS

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की अमेरिकी सैनिकों द्वारा गिरफ्तारी के बाद दुनिया की राजनीति में भूचाल आ गया है. इस कार्रवाई के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुलकर आक्रामक अंदाज में सामने आ गए हैं. ट्रंप ने न सिर्फ वेनेजुएला बल्कि कोलंबिया, मैक्सिको, क्यूबा, ईरान और यहां तक कि नाटो के अहम सदस्य डेनमार्क को भी खुली चेतावनी दे डाली है.

सबसे ज्यादा हलचल ट्रंप के ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों से मची है. ट्रंप लंबे समय से खनिजों से भरपूर ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत बताते रहे हैं. हाल ही में एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि
हमें ग्रीनलैंड चाहिए, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से. हम 20 दिन में इस पर बात करेंगे. उनके इस बयान के बाद ही नाटो के सदस्य देशों ने ट्रंप का विरोध किया है.

ग्रीनलैंड पर हमला यानी NATO का खात्मा- डेनिश PM

ट्रंप के इस बयान के बाद डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने साफ कहा कि अगर अमेरिका ने किसी नाटो देश पर सैन्य हमला किया, तो यह नाटो के अंत की शुरुआत होगी. फ्रेडरिकसन ने चेताया कि अगर अमेरिका ने नाटो के किसी सदस्य पर हमला किया, तो नाटो और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी पूरी सुरक्षा व्यवस्था खत्म हो जाएगी.

यूरोप का खुला समर्थन, अमेरिका से दूरी के संकेत

ट्रंप की धमकियों से यूरोप में डर और नाराजगी दोनों दिख रही है. नॉर्डिक देशों से लेकर ब्रिटेन तक ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया है. यूरोपीय नेताओं को डर है कि वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई के बाद ट्रंप ग्रीनलैंड पर भी वैसा ही कदम उठा सकते हैं. ग्रीनलैंड भले ही काफी हद तक स्वायत्त हो, लेकिन वह डेनमार्क का हिस्सा है और इस वजह से नाटो का भी अंग है. ऐसे में उस पर हमला सीधे नाटो पर हमला माना जाएगा.

नाटो क्या है और क्यों अहम है

नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन यानी नाटो की स्थापना 1949 में हुई थी. शुरुआत में इसमें 12 देश थे, जिनमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल थे. इसका मूल सिद्धांत यह है कि अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो बाकी देश उसकी रक्षा के लिए आगे आएंगे.

Nato Graphic

नाटो का गठन मुख्य रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में सोवियत रूस के प्रभाव को रोकने के लिए किया गया था. जवाब में 1955 में सोवियत संघ ने वॉरसा पैक्ट बनाया, जो 1991 में सोवियत संघ के टूटने के साथ खत्म हो गया. इसके बाद कई पूर्व साम्यवादी देश नाटो में शामिल हो गए.

ग्रीनलैंड पर हमला NATO पर हमला क्यों है?

अमेरिका और डेनमार्क, दोनों ही नाटो के सदस्य देश हैं. ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त इलाका है, लेकिन अपनी रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी अहमियत की वजह से वह लंबे समय से अमेरिका की नजर में बना हुआ है. अगर डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को जबरन अमेरिका में मिलाने की कोशिश करते हैं, तो यह नाटो के मूल सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन होगा. नाटो के चार्टर के आर्टिकल 5 के मुताबिक, अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है. ऐसे में बाकी देशों को मिलकर उस खतरे का जवाब देना होता है. यानी ग्रीनलैंड पर हमला डेनमार्क ही नहीं, पूरे नाटो से टकराव जैसा होगा.

अमेरिका नाटो से क्यों चिढ़ता है?

इसी बीच अमेरिका के भीतर भी नाटो को लेकर बगावती सुर तेज हो गए हैं. रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी ने अमेरिकी संसद में 2025 के दिसंबर में एक बिल पेश किया था जिसमें अमेरिका को नाटो से बाहर निकालने की मांग की गई है. उनका तर्क है कि शीत युद्ध खत्म हो चुका है और नाटो अब अमेरिका के लिए बोझ बन गया है. यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी राजनीति में नाटो की उपयोगिता पर खुली बहस हो रही हो.

नाटो के रक्षा बजट में अमेरिका का योगदान करीब 16 फीसदी है. ट्रंप पहले भी कई बार यह मुद्दा उठा चुके हैं कि अमेरिका अकेले नाटो का बड़ा खर्च उठा रहा है. पिछले साल यानी 2025 में उन्होंने बाकी सदस्य देशों से अपनी GDP का 5 फीसदी रक्षा खर्च पर लगाने की मांग की थी, जिसे कई देशों ने अव्यवहारिक और ज्यादा बताया था.अपने पहले कार्यकाल और अब दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में भी ट्रंप नाटो से दूरी बनाने के संकेत दे चुके हैं.

टूट जाएगा NATO? अमेरिका की रडार पर क्यों है दुनिया का सबसे मजबूत सैन्य संगठन

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