World News: डिएगो गार्सिया बेस पर नहीं रखे जाएंगे परमाणु हथियार, मॉरीशस ने ऐसा क्यों कहा? – INA NEWS


चागोस द्वीप समूह को लेकर ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच होने वाले समझौते ने नई बहस छेड़ दी है. मॉरीशस के उप-प्रधानमंत्री पॉल बेरेंजर ने कहा है कि अगर यह समझौता लागू होता है, तो डिएगो गार्सिया स्थित ब्रिटेन और अमेरिका के जॉइंट मिलिट्री बेस पर परमाणु हथियारों को स्टोर नहीं किया जा सकेगा. डिएगो गार्सिया हिंद महासागर में स्थित एक बेहद रणनीतिक सैन्य बेस है, जिसका इस्तेमाल अमेरिका और ब्रिटेन कई दशकों से करते आ रहे हैं.
पॉल बेरेंजर ने स्पष्ट किया कि मॉरीशस अफ्रीकी न्यूक्लियर वेपन-फ्री जोन ट्रीटी का सिग्नेटरी है. इसे पेलिंडाबा संधि भी कहा जाता है. इसके तहत किसी भी सदस्य देश की जमीन पर परमाणु हथियारों का भंडारण, नियंत्रण, तैनाती या परीक्षण प्रतिबंधित है. हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि यह संधि परमाणु हथियारों की अस्थायी मौजूदगी या ट्रांजिट को नहीं रोकती. इसका मतलब है कि परमाणु हथियार ले जाने वाले विमान या जहाज कुछ समय के लिए वहां रुक सकते हैं, लेकिन हथियारों को लंबे समय तक वहां रखा नहीं जा सकता.
ब्रिटिश सरकार के दावों पर सवाल?
बेरेंजर के इस बयान से ब्रिटेन की लेबर सरकार के दावों पर सवाल उठ गए हैं. ब्रिटिश सरकार का कहना था कि चागोस समझौते के बाद भी डिएगो गार्सिया बेस के फुल ऑपरेशन पर की आजादी बनी रहेगी. ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय के मंत्री स्टीफन डौटी पहले संसद में कह चुके हैं कि पेलिंडाबा संधि से बेस के मौजूदा सैन्य अभियानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत काम जारी रहेगा.
इस मुद्दे पर ब्रिटेन की विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी ने कड़ा विरोध जताया है. शैडो विदेश मंत्री प्रीति पटेल ने कहा कि डिएगो गार्सिया बेस पर परमाणु हथियारों के भंडारण पर रोक से ब्रिटेन और उसके सहयोगियों की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि मॉरीशस सरकार इस समझौते में शर्तें तय कर रही है और इससे अमेरिका भी असहज हो सकता है. पटेल के मुताबिक, चीन, रूस और ईरान जैसे देश, जिनके मॉरीशस से रिश्ते हैं, इस डील का स्वागत कर चुके हैं, जिससे सुरक्षा चिंताएं और बढ़ गई हैं.
डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी बॉम्बर तैनात
डिएगो गार्सिया बेस का इस्तेमाल अमेरिका लंबे समय से सैन्य अभियानों के लिए करता रहा है. यहां से बी-52 जैसे परमाणु क्षमता वाले बॉम्बर विमान उड़ान भरते रहे हैं. पिछले साल अमेरिका का बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर यहां केवल ईंधन भरने के लिए उतरा था. साल 2022 में परमाणु क्षमता वाली अमेरिकी पनडुब्बी USS वेस्ट वर्जीनिया भी यहां रुकी थी.
डिएगो गार्सिया को लेकर क्या समझौता हुआ है?
डिएगो गार्सिया, हिंद महासागर में स्थित चागोस आइलैंड्स का हिस्सा है. ब्रिटेन ने 1814 में नेपोलियन को हराकर यहां कब्जा किया था. 1968 में मॉरीशस को आजादी मिली थी. तब ब्रिटेन ने तय किया कि जब इन द्वीपों की जरूरत रक्षा के लिए नहीं रहेगी, तो इन्हें मॉरीशस को लौटा दिया जाएगा. 1971 में डिएगो गार्सिया पर अमेरिका और ब्रिटेन ने जॉइंट मिलिट्री बेस बनाया.
अक्टूबर 2024 में UK सरकार ने घोषणा की थी कि वो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चागोस द्वीपों की संप्रभुता मॉरीशस को सौंप देगी. ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने मई 2025 में डिएगो गार्सिया लौटाने को लेकर मॉरीशस के साथ समझौते पर साइन किए. हालांकि ब्रिटेन डिएगो गार्सिया को 99 साल की लीज पर अपने पास रखेगा. इसके लिए ब्रिटेन भुगतान भी करेगा.
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने मई 2025 में समझौता साइन किया था, लेकिन अभी तक इसे संसद से मंजूरी नहीं मिली है. हाल ही में सरकार को इस पर संसद में लाया जाने वाला बिल वापस लेना पड़ा, क्योंकि आशंका जताई गई कि यह अमेरिका के साथ करीब 60 साल पुराने रक्षा समझौते का उल्लंघन कर सकता है.
डिएगो गार्सिया बेस पर नहीं रखे जाएंगे परमाणु हथियार, मॉरीशस ने ऐसा क्यों कहा?
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