World News: रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत को नुकसान देने वाला अमेरिका भूल गया 70 सालों का खून-खराबा – INA NEWS

World News: रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत को नुकसान देने वाला अमेरिका भूल गया 70 सालों का खून-खराबा – INA NEWS

रूस-यूक्रेन युद्ध में अमेरिका ने भारत को घसीटना शुरू कर दिया है. पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया कि भारत रूस से तेल खरीदकर युद्ध को फंड कर रहा है. इतना ही नहीं, उन्होंने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ भी ठोक दिया. अब उनके करीबी सहयोगी और व्हाइट हाउस के सलाहकार पीटर नवारो ने तो हद ही कर दी. उन्होंने रूस-यूक्रेन संघर्ष को ही मोदी का युद्ध कह डाला और आरोप लगाया कि रूस से तेल खरीदकर भारत इस जंग को हवा दे रहा है.

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो अमेरिका दुनिया भर में खुद को लोकतंत्र और आजादी का रखवाला बताता है, क्या उसका इतिहास सचमुच ऐसा है? सच्चाई ये है कि पिछले 70 सालों में अमेरिका ने बार-बार तानाशाहों का साथ दिया है और लोकतांत्रिक सरकारों को गिराया है. कभी सीआईए ने चुनी हुई सरकारों को उलट दिया, कभी तख्तापलट करवाया और कभी सीधे युद्ध छेड़कर लाखों निर्दोष लोगों की जिंदगी तबाह कर दी. ईरान से लेकर इराक, चिली से लेकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लेकर लीबिया तक… जहाँ-जहाँ अमेरिका पहुंचा, वहाँ लोकतंत्र नहीं बल्कि खून-खराबा और अस्थिरता ही फैली.

ईरान से ही शुरुआत करते हैं

1953 में ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से चुना था. लेकिन अमेरिका को उनकी नीतियाँ पसंद नहीं आईं क्योंकि वे तेल उद्योग पर विदेशी कब्ज़ा खत्म करना चाहते थे. नतीजा यह हुआ कि सीआईए की मदद से मोसादेग को हटा दिया गया और शाह की तानाशाही वापिस लाई गई. यह लोकतंत्र पर अमेरिका का पहला बड़ा हमला माना जाता है. हालांकि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाग शाह को ईरान छोड़ना पड़ा. अमेरिका ईरान के रिश्ते आज भी तल्ख है. 2025 में हुए इजराइल-ईरान की जंग में अमेरिका सीधे एंटर कर गया था और ईरान के परमाणु ठिकानों पर भी हमले किए.

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में दखल

1960 के दशक में कांगो के पहले प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा को हटाने और उनकी हत्या में भी अमेरिका की भूमिका रही. अमेरिका ने वहाँ विद्रोही गुटों और तानाशाह नेताओं को समर्थन दिया. 1973 में चिली में राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे की सरकार को भी सैन्य तख्तापलट में हटाया गया. इस तख्तापलट के पीछे अमेरिकी समर्थन था और इसके बाद जनरल ऑगस्तो पिनोशे ने चिली में लंबी तानाशाही चलाई, जिसमें हजारों लोग मारे गए.

पाकिस्तान में भी दिया दखल

1980 और 1990 के दशक में पाकिस्तान में अमेरिका ने जनरल ज़िया-उल-हक जैसी सैन्य सरकारों का समर्थन किया. ज़िया का शासन तानाशाही और इस्लामीकरण की नीतियों से भरा था, लेकिन अमेरिका ने उन्हें Cold War और बाद में War on Terror के लिए उपयोगी समझा. मानवाधिकार उल्लंघन की तमाम शिकायतों के बावजूद अमेरिकी मदद जारी रही.

अब 2025 का ही हाल देखिए. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान पर बड़े मेहरबान नजर आ रहे हैं. आर्मी चीफ को व्हाइट हाउस में डिनर पर बुलाया गया. टैरिफ भी भारत के मुकाबले कम किया गया है. उसके साथ कई समझौते भी किए हैं वो भी तब जब पाकिस्तान में आज भी 80 से ज्यादा आतंकी संगठन एक्टिव है.

इजराइल और गाजा संघर्ष पर चुप्पी

रिपोर्ट के मुताबिक 2008 से 2021 तक गाजा पट्टी में जब-जब संघर्ष हुआ, अमेरिका ने खुलकर इजराइल का साथ दिया. इस दौरान हजारों नागरिक मारे गए, लेकिन अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के खिलाफ आने वाले कई प्रस्तावों को वीटो कर दिया. अभी 2023 से इजराइल गाजा युद्ध जारी हैं. गाजा पूरी तरह तबाह हो चुका है, लोग भूख, बीमारी से मर रहे हैं. मगर इजराइल के साथ अमेरिका मजबूती के साथ खड़ा है.

वो देश जहां अमेरिका सीधे युद्ध में घुसा

तानाशाही सरकारों को समर्थन देने के अलावा, अमेरिका ने कई देशों में सीधे युद्ध भी लड़े.

1. कोरिया (1950-53): युद्ध के नाम पर लाखों नागरिक मारे गए और कोरियाई प्रायद्वीप आज तक बंटा हुआ है.

2. वियतनाम (1955-75): इस युद्ध में लाखों लोग मारे गए और अंत में अमेरिका को हारकर वापस जाना पड़ा.

3. अफगानिस्तान (2001-2021): आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर 20 साल तक युद्ध चला. लेकिन नतीजा यह रहा कि अंत में अफगानिस्तान फिर से तालिबान के हाथों चला गया. अब तालिबान के शासन में लोगों का, खासकर महिलाओं के बुनियादी अधिकार भी उनसे छीन लिए गए हैं.

4. इराक (2003): अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए हमला किया. लेकिन इसके बाद देश में गृहयुद्ध, आतंकवाद और अस्थिरता फैल गई.

5. लीबिया (2011): गद्दाफी की सरकार को हटाने में अमेरिका और नाटो ने हस्तक्षेप किया. लेकिन सरकार गिरने के बाद लीबिया पूरी तरह अराजकता में डूब गया.

6. सीरिया: यहाँ अमेरिका ने सीधे युद्ध तो नहीं किया, लेकिन आईएसआईएस के खिलाफ हस्तक्षेप और बागी गुटों को समर्थन देकर लंबे गृहयुद्ध को और भड़काया.

इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने जहां भी हस्तक्षेप किया वहां आम जनता को लोकतंत्र नहीं मिला बल्कि युद्ध, हिंसा और अस्थिरता ही मिली. अमेरिका का मकसद हमेशा अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित करना रहा है.

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत को नुकसान देने वाला अमेरिका भूल गया 70 सालों का खून-खराबा

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