World News: शुभांशु धरती पर लौटे, ISS पर कैसे तय होता है कैप्सूल कहां उतरेगा, समुद्र ही सेफ साइट क्यों? – INA NEWS

World News: शुभांशु धरती पर लौटे, ISS पर कैसे तय होता है कैप्सूल कहां उतरेगा, समुद्र ही सेफ साइट क्यों? – INA NEWS

शुभांशु शुक्ला धरती पर लौट आए हैं. यह भारत के लिए बड़ी उपलब्धि इसलिए है, क्योंकि 41 साल बाद कोई भारतीय दोबारा स्पेस में गया था. इससे पहले 1984 में राकेश शर्मा ने यह कारनामा किया था. कैप्सूल से बाहर आते वक्त शुभांशु शुक्ला के चेहरे पर मुस्कान थी. वह कुल 18 दिन स्पेस में रहे हैं. एक्सियोम का ड्रैगन कैप्सूल उन्हें और उनके साथ गए 3 और एस्ट्रॉनॉट को लेकर कैलिफॉर्निया के समुद्र में उतरा.

दरअसल मिशन की शुरुआत से ही ये तय हो जाता है कि ISS से रवाना होने वाला कैप्सूल वापसी में कहां उतरेगा. इसके लिए बहुत सटीक विज्ञान, मैथमेटिक्स और प्लानिंग होती है. इस पर एक बहुत बड़ी टीम काम करती है और मिशन को लांच करने से पहले ही इसकी सफलता और असफलता के मायनों को परख लिया जाता है. सिमुलेटेड सिस्टम पर कई बार इसकी प्रैक्टिस होती है और ये तय किया जाता है कि किसी तरह की गलती न हो. अमेरिकन स्पेस एजेंसी NASA के मुताबिक अगर आईएसएस से अलग होते समय ड्रैगन कैप्सूल में एक पल की भी देरी हुई तो लैंडिंग साइट सैकड़ों किमी दूर हो सकती है.

ऑर्बिट से एंट्री पॉइंट तक सब तय

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन 28 हजार किमी की गति से धरती की परिक्रमा करता है. वैज्ञानिक पहले इसकी गणना करते हैं और ये तय करते हैं कि ISS किस समय पर कहां होगा. NASA के मुताबिक इसी के आधार पर एंट्री बर्न और डी ऑर्बिट बर्न का समय तय होता है. इसके बाद वह मिशन लांच करते हैं, जो तय समय पर वहां पहुंचता है जहां वैज्ञानिक ले जाना चाहते हैं. यही काम वापसी में भी होता है, आईएसएस के कैप्सूल से अलग होने और धरती के वायुमंडल में प्रवेश करने का समय निर्धारित होता है, यदि इसमें एक पल की भी देरी हुई तो तय लैंडिंग साइट बहुत दूर हो सकती है. इसके अलावा कैप्सूल को एक निश्चिंग एंगल में रखा जाता है, ताकि वह धरती के गुरुत्वाकर्षण से मुकाबला कर सके. नहीं तो कैप्सूल को नुकसान भी पहुंच सकता है.

Subhanshu Shukla

पहले से प्लान होता है लैंडिंग जोन

मिशन शुरू होने से पहले ही एक मुख्य लैंडिंग जोन और बैकअप लैंडिंग जोन तय किया जाता है. अब तक जितने भी ऐसे मिशन हुए हैं उनमें 1 को छोड़कर सभी कैप्सूल समुद्र में ही उतारे गए हैं. यह इसलिए क्योंकि समुद्र को सॉफ्ट लैंडिंग के लिए बेहतर माना जाता है. लैडिंग कहां होगी इसे तय करते समय मौसम की स्थिति पर एनालिसिस की जाती है. इसमें देखा जाता है कि हवा की गति क्या रहेगी, समुद्र की लहरें कैसी रहेंगीं. बारिश या तूफान की संभावना तो नहीं है, अगर ऐसा हैं तो लैंडिंग लोकेशन बदलकर बैकअप साइट का इस्तेमाल किया जाता है.

समुद्र में ही क्यों उतरता है कैप्सूल

ISS से लौटने वाला कैप्सूल समुद्र में उतारने का सबसे बड़ा कारण इसकी सुरक्षा होती है, दरअसल जब स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करता है, तो उसकी रफ्तार बहुत तेज होती है, NASA के मुताबिक यह 28 हजार किमी प्रति घंटा तक हो सकती है. इसलिए इसे ऐसी जगह लैंड कराने का प्लान होता है जो सुनसान हो और सुरक्षित भी रहे. इसके लिए समुद्र सबेस बेहतर है. इसका पानी कैप्सून को एक कुशन प्रदान करता है. इसे धरती पर उतरते ही लगने वाला झटका महसूस नहीं होता.

समुद्र में रिकवरी मिशन आसान होता है

समुद्र में कैप्सूल को उतारना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यहां रिकवरी मिशन आसान होता है. एस्ट्रॉनाट को कैप्सूल से बाहर निकालने के लिए तुरंत टीमें एक्टिव हो जाती हैं. कैप्सूल को सबसे पहले उस शिप तक लाया जाता है जिसे स्पेशली इसके लिए तैयार किया गया है. इसके बाद इस जहाज से ही हेलीकॉप्टर के जरिए एस्ट्रॉनॉट को समुद्र से बाहर लाया जा सकता है. यह पहले से परखी हुई तकनीक है, इसलिए वैज्ञानिक इसपर ज्यादा भरोसा करते हैं. हालांकि अब तक सिर्फ एक मिशन रेगिस्तान में भी उतर चुका है. यह रूस का Soyuz था. यह मिशन भी सफल रहा था, मगर इससे मुकाबले के बाद ज्यादातर स्पेस एजेंसियों ने यही माना कि समुद्र में वापसी ज्यादा सुरक्षित है.

शुभांशु धरती पर लौटे, ISS पर कैसे तय होता है कैप्सूल कहां उतरेगा, समुद्र ही सेफ साइट क्यों?

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