World News: टेररिज्म अथॉरिटी और 5-R मॉडल… हिंसा रोकने के लिए पाक का नया तुगलकी फरमान – INA NEWS
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पाकिस्तान में हाल के सालों में चरमपंथी हमलों में जबरदस्त इजाफा हुआ है. इसे रोकने के लिए सरकार ने कई बार नई नीतियां पेश कीं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका कोई ठोस असर देखने को नहीं मिला. अब पाकिस्तान ने एक नई नीति, नेशनल प्रिवेंशन ऑफ वायलेंट एक्सट्रीमिज्म (NPVE) पॉलिसी पेश की है, जिसमें सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ शिक्षा, धर्म, और सोशल मीडिया जैसे नॉन-काइनेटिक (गैर-सैन्य) तरीकों को भी अपनाने की बात कही गई है.
पाकिस्तान की यह नई नीति ऐसे समय में आई है जब देश के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों में चरमपंथी हमले लगातार बढ़ रहे हैं. इस नीति को पिछले साल प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की कैबिनेट ने मंजूरी दी थी और हाल ही में इसे सार्वजनिक किया गया है. इसमें 5-R मॉडल अपनाया गया है.
पहले समझ लेते हैं 5-R मॉडल
Revisit- स्कूलों के पाठ्यक्रम में सुधार और युवाओं को चरमपंथ से दूर रखने के उपाय.
Reach Out- सोशल मीडिया और मीडिया के जरिए चरमपंथी विचारधारा का मुकाबला.
Reduce- महिलाओं और युवाओं को शांति प्रक्रिया में शामिल करना.
Reinforce- कला, संस्कृति और वैज्ञानिक नवाचार को बढ़ावा देना.
Reintegrate- चरमपंथ से जुड़े लोगों के पुनर्वास और पुनःसमाजीकरण के प्रयास.
पुरानी नीतियों से कैसे अलग है यह नीति?
नेशनल काउंटर टेररिज्म अथॉरिटी (NACTA) के अनुसंधान निदेशक दैय्यब गिलानी का कहना है कि यह नीति पुरानी नीतियों से अलग है क्योंकि यह सिर्फ सैन्य कार्रवाई पर निर्भर नहीं करती. उनका कहना है, आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ सैन्य अभियान चलाना स्थायी समाधान नहीं है. हमें इसके मूल कारणों को खत्म करना होगा. इस नीति का लक्ष्य पाकिस्तान के सामाजिक ताने-बाने में व्याप्त कट्टरपंथ को जड़ से खत्म करना है.
इस नीति को अपनाएगी सेना?
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सुरक्षा नीतियों में हमेशा सेना का दबदबा रहा है. जबकि NACTA एक सिविलियन संस्था है, लेकिन पाकिस्तान में सैन्य प्रतिष्ठान की पकड़ इतनी मज़बूत है कि कोई भी नीति तभी सफल हो सकती है जब सेना उसे स्वीकार करे. इस संदर्भ में, सिंगापुर स्थित शोधकर्ता अब्दुल बासित कहते हैं, सैन्य दबदबे के चलते सिविलियन संस्थानों को फैसले लेने की पूरी आज़ादी नहीं होती. अगर सेना इस नीति के हर पहलू पर नियंत्रण रखेगी, तो इसकी सफलता संदिग्ध है.
नीति लागू करने की चुनौतियां
इस नीति की सफलता इसके सही तरीके से लागू होने पर निर्भर करेगी. हालांकि, पाकिस्तान में पहले भी कई चरमपंथ विरोधी नीतियां बनाई गईं, लेकिन वे प्रभावी साबित नहीं हुईं. 2014 में पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले के बाद नेशनल एक्शन प्लान (NAP) बनाया गया था, लेकिन उसे भी पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका. इसी तरह, NPVE नीति के लिए भी बजट, प्रशासनिक सहयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी.
पेशावर स्थित सुरक्षा विशेषज्ञ इफ्तिखार फिरदौस का कहना है, ‘चरमपंथ से लड़ने के लिए सैन्य और सिविल दोनों पक्षों की एकजुटता जरूरी है. लेकिन अगर इस नीति के क्रियान्वयन में ढील बरती गई या इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया, तो यह भी पिछली नीतियों की तरह विफल हो सकती है.’
जरूरी रणनीति की जरूरत
विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान को एक बहुआयामी रणनीति अपनाने की जरूरत है, जो क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों के हिसाब से काम करे. सुरक्षा मामलों के प्रोफेसर रोहन गुणरत्ना के अनुसार, ‘एक समान नीति पूरे देश के लिए कारगर नहीं हो सकती. हर क्षेत्र में चरमपंथ की अलग-अलग जड़ें हैं, जिनसे निपटने के लिए वहां की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनानी होगी.’
क्या यह नीति सफल होगी?
अगर पाकिस्तान वास्तव में चरमपंथ के खिलाफ एक दीर्घकालिक समाधान चाहता है, तो उसे सैन्य अभियानों से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक सुधारों पर ध्यान देना होगा. कट्टरपंथ को केवल बंदूकों से खत्म नहीं किया जा सकता. शिक्षा, रोजगार, धार्मिक सहिष्णुता और समुदायों की भागीदारी के बिना यह नीति सफल नहीं हो पाएगी.
हालांकि, NPVE नीति की सोच सकारात्मक है, लेकिन इसकी शुरुआत होने को लेकर सवाल बने हुए हैं. पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि अच्छी नीतियां अक्सर लागू करने में असफल हो जाती हैं. अब देखना होगा कि यह नई नीति सिर्फ कागजो तक सीमित रहती है या वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ कोई ठोस बदलाव लाने में सफल होती है.
टेररिज्म अथॉरिटी और 5-R मॉडल… हिंसा रोकने के लिए पाक का नया तुगलकी फरमान
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