World News: अमेरिकी कोस्ट गार्ड में ‘स्वास्तिक’ पर बवाल, जानें हिटलर ने आखिर इसे ही क्यों बनाया अपने झंडे का निशान – INA NEWS

कभी-कभी एक छोटी सी घटना बड़े सवाल खड़े कर देती है. अमेरिका के एक ट्रेनिंग सेंटर की दीवार पर बना एक निशान भी ऐसा ही एक सवाल छोड़ गया. देखने में यह सिर्फ एक निशान जैसा दिख रहा था, लेकिन उसका मतलब इतना गहरा था कि उसने पूरे सिस्टम को ही हिलाकर रख दिया. न्यू जर्सी के केप मे स्थित अमेरिकी कोस्ट गार्ड के ट्रेनिंग सेंटर में जब एक इंस्ट्रक्टर ने बाथरूम की दीवार पर एक निशान देखा तो उसे वह सामान्य नहीं लगा. वह निशान जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर के नाजी प्रतीक जैसा था.

बस यहीं से मामला गंभीर हो गया. यह कोई साधारण घटना नहीं थी. यह इतिहास, धर्म और समाज, सबको एक साथ छूने वाला मुद्दा बन गया. तुरंत उस निशान को मिटा दिया गया, जांच शुरू हुई और अधिकारियों ने सख्त बयान दिए. लगभग 900 रिक्रूट और स्टाफ से बातचीत की गई और साफ संदेश दिया गया कि नफरत या कट्टर सोच रखने वालों के लिए इस संस्था में कोई जगह नहीं है.लेकिन इस पूरी घटना ने एक और बड़ा सवाल सामने ला दिया, क्या यह सिर्फ नाजी प्रतीक था या इसे स्वास्तिक से जोड़कर देखा जा सकता है? क्योंकि वही निशान भारत में एक पवित्र चिन्ह माना जाता है. यही विरोधाभास इस कहानी को और भी जटिल बना देती है.

ये रिपोर्ट उसी उलझन को सरल भाषा में समझने की कोशिश है कि कैसे एक ही चिन्ह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बिल्कुल अलग मतलब रखता है और क्यों आज भी इसे लेकर बहस जारी है.

कोस्ट गार्ड ट्रेनिंग सेंटर में निशान से मचा हड़कंप

अमेरिकी कोस्ट गार्ड के ट्रेनिंग सेंटर में यह घटना अचानक सामने आई. एक ट्रेनर ने बाथरूम की दीवार पर यह निशान देखा. उसने तुरंत अधिकारियों को इसकी जानकारी दी. मामला इतना संवेदनशील था कि बिना देरी के कार्रवाई की गई.इस चिन्ह को तुरंत मिटाया गया और कोस्ट गार्ड इन्वेस्टिगेटिव सर्विस (CGIS) को जांच सौंपी गई. अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई साधारण मामला नहीं है, बल्कि नफरत फैलाने वाली सोच को दिखाने वाली घटना है. कोस्ट गार्ड के अधिकारियों ने साफ कहा है कि ऐसे प्रतीकों को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग नफरत या चरमपंथी विचारधारा को बढ़ावा देते हैं, उन्हें इस संस्था का हिस्सा बनने का अधिकार नहीं है.इस घटना के बाद वरिष्ठ अधिकारी खुद मौके पर पहुंचे और रिक्रूट्स से बातचीत की. यह दिखाता है कि पश्चिमी देशों में इस तरह के प्रतीकों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है.

नफरत से क्यों जुड़ा हुआ है नाजी प्रतीक

आज के समय में अगर कोई स्वास्तिक जैसी आकृति पश्चिमी देशों में बनाता है तो उसे तुरंत नाजी प्रतीक माना जाता है. इसका कारण इतिहास है. 20वीं सदी में एडॉल्फ हिटलर और उसकी नाजी पार्टी ने इस चिन्ह को अपने प्रतीक के रूप में अपनाया. 1920 में जब नाजी झंडा बनाया गया, तो उसमें लाल, सफेद और काले रंग के साथ स्वास्तिक जैसी आकृति को केंद्र में रखा गया. लेकिन यह सिर्फ एक डिजाइन नहीं थी. यह एक विचारधारा का प्रतीक था, नस्लवाद और घृणा की विचारधारा. हिटलर ने इसे आर्य नस्ल की जीत का प्रतीक बताया. इसके बाद जब नाजी शासन में लाखों यहूदियों का नरसंहार हुआ, द्वितीय विश्व युद्ध हुआ और अत्याचारों की लंबी कहानी सामने आई, तो यह चिन्ह हमेशा के लिए नफरत और हिंसा से जुड़ गया. इसलिए आज पश्चिमी देशों में यह सिर्फ एक आकृति नहीं, बल्कि दर्द और डर की याद दिलाने वाला प्रतीक है.

भारत में आस्था और सकारात्मकता का प्रतीक है स्वास्तिक

अब अगर हम इतिहास को और पीछे ले जाएं, तो कहानी पूरी तरह बदल जाती है. स्वास्तिक नाजी प्रतीक से हजारों साल पुराना है.स्वास्तिक शब्द संस्कृत से आया है, जिसका मतलब होता है, कल्याण, शुभ और मंगलकारी. यह चिन्ह भारत, चीन, जापान और एशिया के कई हिस्सों में प्राचीन समय से इस्तेमाल होता रहा है.हिंदू धर्म में इसे भगवान सूर्य, शुभ शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है. घर के दरवाजे पर स्वास्तिक बनाना शुभ माना जाता है. पूजा-पाठ, विवाह और त्योहारों में इसका विशेष महत्व होता है.जैन धर्म में यह तीर्थंकरों का प्रतीक है, जबकि बौद्ध धर्म में इसे बुद्ध के पदचिन्हों से जोड़ा जाता है. यानी जहां एक तरफ यह चिन्ह पश्चिम में नफरत का प्रतीक है, वहीं दूसरी तरफ भारत में यह आस्था और सकारात्मकता का प्रतीक है.

दुनिया भर में पाया जाता है स्वास्तिक का चिन्ह

स्वास्तिक सिर्फ भारत तक सीमित नहीं था. यह दुनिया की कई प्राचीन सभ्यताओं में पाया गया है.पुरातत्वविदों को यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में भी यह चिन्ह मिला है. प्राचीन ग्रीस और रोम में यह सजावट के रूप में इस्तेमाल होता था. अमेरिका की कुछ जनजातियों ने भी इसे अपनाया था. करीब 15,000 साल पुराने अवशेषों में भी यह आकृति पाई गई है. कई जगह इसे सूर्य का प्रतीक माना गया, तो कहीं इसे जीवन के चक्र का संकेत समझा गया. इससे यह साफ होता है कि स्वास्तिक मूल रूप से एक सकारात्मक चिन्ह था.

हिटलर ने आखिर क्यों चुना स्वास्तिक चिन्ह

अब सवाल उठता है कि हिटलर ने इसी चिन्ह को क्यों चुना? 19वीं सदी में कुछ यूरोपीय विद्वानों ने ‘आर्य नस्ल’ की एक थ्योरी दी थी. उनके अनुसार, एक प्राचीन श्रेष्ठ नस्ल थी, जिसने दुनिया के कई हिस्सों में सभ्यता फैलाई. यह थ्योरी बाद में गलत साबित हुई, लेकिन उस समय यह काफी लोकप्रिय हो गई थी.हिटलर और उसके समर्थकों ने इसी विचार को अपनाया. उन्हें लगा कि स्वास्तिक उस आर्य पहचान का प्रतीक है. इसलिए उन्होंने इसे अपने आंदोलन का हिस्सा बना लिया.हिटलर समझता था कि एक मजबूत प्रतीक लोगों को जोड़ सकता है. उसने स्वास्तिक को एक नई पहचान दी, लेकिन यह पहचान नफरत और विभाजन से भरी हुई थी.’आर्य’ शब्द को लेकर भी एक बड़ी गलतफहमी रही. संस्कृत में आर्य का मतलब होता है-सम्मानित, श्रेष्ठ आचरण वाला व्यक्ति. इसका किसी खास नस्ल से कोई संबंध नहीं था.लेकिन यूरोप में इसे एक नस्ल के रूप में समझ लिया गया. इसी गलत परिभाषा ने नाजी विचारधारा को जन्म दिया और स्वास्तिक को उससे जोड़ दिया.यानी एक गलत समझ ने एक पवित्र चिन्ह को नफरत का प्रतीक बना दिया.

अमेरिकी कोस्ट गार्ड में ‘स्वास्तिक’ पर बवाल, जानें हिटलर ने आखिर इसे ही क्यों बनाया अपने झंडे का निशान


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