World News: आपके घर में जो वर्ल्ड का मैप है, उसे लेकर दुनिया भर में क्यों मचा है बवाल? – INA NEWS


हम बचपन से जिस वर्ल्ड मैप को देखकर देश-विदेश पहचानते आए हैं, वही अब बड़ी बहस के केंद्र में है. अफ्रीका, जो हकीकत में दुनिया के सबसे विशाल महाद्वीपों में से एक है, उस नक्शे में इतना छोटा दिखाया जाता है कि यूरोप या ग्रीनलैंड उससे बराबर यहाँ तक कि बड़ा नजर आता है. यूरोपीय संघ को अफ्रीका जितना बड़ा दिखाने वाला मर्केटर वर्ल्ड मैप असल में अफ्रीका से सात गुना छोटा है.
इसे सुधारने के लिए एक नई मुहिम ‘करेक्ट द मैप’ शुरू हुई है, जिसका नेतृत्व स्पीक अप अफ्रीका और अफ्रीका नो फिल्टर कर रहे हैं. आइए जानते हैं कि यूरोप से सात गुना और अमेरिका, कनाडा से तीन गुना बड़ा है अफ्रीका, फिर भी छोटा क्यों दिखता है?
क्यों नक्शे पर छोटा दिखता है अफ्रीका
1569 में बेल्जियम के नक्शानवीस गेरार्डस मर्केटर ने समुद्री यात्रा के लिए यह नक्शा बनाया था. इसका फोकस सही कोण और आकृतियों पर था, लेकिन इसमें महाद्वीपों का असली आकार बिगड़ गया. नतीजा ये कि उत्तरी गोलार्ध की जगहें जैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका काफी बड़ी दिखाई देती हैं, जबकि अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका सिकुड़े हुए नजर आते हैं.
उदाहरण के तौर पर, नॉर्वे के ओस्लो के आसपास का 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र नैरोबी (केन्या) के उसी क्षेत्रफल से चार गुना बड़ा दिखाई देता है. ग्रीनलैंड भी नक्शे पर अफ्रीका जितना दिखता है, जबकि हकीकत में अफ्रीका उससे 14 गुना बड़ा है.
अफ्रीका असल में कितना बड़ा है?
हकीकत में अफ्रीका का आकार बहुत बड़ा है. यह कनाडा से तीन गुना और रूस से डेढ़ गुना से ज्यादा है. अमेरिका या कनाडा की तुलना में भी अफ्रीका लगभग तीन गुना विशाल है. फिर भी मर्केटर प्रोजेक्शन के कारण छात्रों को लगता है कि ये देश अफ्रीका के बराबर या उससे बड़े हैं. यही नहीं, ग्रीनलैंड, जो अक्सर नक्शे में अफ्रीका जितना दिखता है, असल में उससे लगभग 14 गुना छोटा है. यही वजह है कि अफ्रीकी संघ ने करेक्ट द मैप अभियान को अपना समर्थन दिया है.
बराबरी का नक्शा की मांग
20वीं सदी में कई विकल्प सामने आए. 1921 का विंकेल प्रोजेक्शन, 1963 का रॉबिन्सन प्रोजेक्शन, और 1970 के दशक का गॉल-पीटर्स, जिसने क्षेत्रफल सही दिखाया लेकिन आकृतियाँ खींच दीं. 2018 में कार्टोग्राफर्स टॉम पैटरसन, बोयान सावरिक और बर्नहार्ड जेनी ने इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन लॉन्च किया. इसमें अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया असली अनुपात में दिखते हैं। अफ्रीकी संघ ने इसे आधिकारिक समर्थन भी दिया है. अब लक्ष्य है कि अफ्रीकी स्कूल, मीडिया और प्रकाशक इसे अपनाएँ और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संस्थानों तक इसकी पहुँच बनाई जाए.
विवाद और आलोचना पर भी एक नजर
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मर्केटर नक्शे को पक्षपाती कहना गलत तर्क है. अमेरिका के प्रोफेसर मार्क मोंमोनियर का कहना है कि अगर आपको देशों के आकार की तुलना करनी है तो बार ग्राफ या तालिका का इस्तेमाल करें, नक्शा नहीं. वहीं, गूगल के पूर्व तकनीकी विशेषज्ञ एड पार्सन्स के मुताबिक, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मर्केटर इसलिए उपयोगी है क्योंकि इससे दिशा आसानी से तय की जा सकती है. घाना के नीति विश्लेषक ब्राइट सिमन्स का कहना है कि सिर्फ नक्शे पर बड़ा दिखने से अफ्रीका को सम्मान नहीं मिलेगा, बल्कि आर्थिक ताकत से ही दुनिया मान्यता देगी.
आपके घर में जो वर्ल्ड का मैप है, उसे लेकर दुनिया भर में क्यों मचा है बवाल?
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