World News: भारत-रूस के इस डील से चीन को क्यों परेशान होना चाहिए? – INA NEWS

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रूस की संसद ड्यूमा ने हाल ही में भारत-रूस के बीच एक अहम सैन्य समझौते को मंजूरी दी है. इसका नाम RELOS (रिसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट) एग्रीमेंट है. इसके मुताबिक, दोनों देशों की सेनाएं जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की जमीन, एयरबेस, समुद्री बंदरगाह और सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकेंगी. यह डील चीन के लिए एक बड़ी रणनीतिक चिंता है.

RELOS समझौते का सबसे अहम पहलू यह है कि भारत अब रूस के मध्य एशियाई सैन्य ठिकानों तक पहुंच सकता है. रूस के पास तजाकिस्तान, किर्गिस्तान और कजाकिस्तान में कई सैन्य ठिकाने हैं. ये ठिकाने चीन के तीन सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों अक्सु, कासगर और यिनिंग के बेहद करीब हैं. इन इलाकों में चीन का सबसे ज्यादा तेल और हथियार का उत्पादन होता है.

चीन के 3 संवेदनशील इलाके

  1. अक्सु (Aksu): चीन का प्रमुख तेल उत्पादन क्षेत्र
  2. कासगर (Kashgar): शिंजियांग प्रांत का रणनीतिक शहर, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का एंट्री पॉइंट
  3. यिनिंग (Yining): डिफेंस प्रोडक्शन का केंद्र

भारत की इन इलाकों तक पहुंच चीन के लिए एक बड़ा खतरा है. आइए जानते हैं भारत कैसे चीन की घेराबंदी कर सकता है.

1. रणनीतिक संतुलन

अब तक चीन ने पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार में अपनी उपस्थिति बढ़ाकर भारत को घेरने का प्रयास किया है. RELOS समझौते से भारत भी चीन के पश्चिमी सीमा क्षेत्र में अपनी पहुंच बना सकता है, जिससे चीन दोहरी चुनौती का सामना करेगा.

चीन पर शिंजियांग प्रांत में उइगुर मुस्लिमों के उत्पीड़न के आरोप लगते हैं. यह अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है. मध्य एशिया में भारत की उपस्थिति से चीन को यह चिंता रहेगी कि भारत इस क्षेत्र पर नजर रख सकता है.

2. भारत CPEC पर नजर रख सकेगा

चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) कासगर से शुरू होकर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जाता है. मध्य एशिया में भारत की मौजूदगी से CPEC के स्टार्टिंग पॉइंट पर नजर रखना संभव हो जाएगा. अब चीन को भारत के साथ कई मोर्चों पर निपटना होगा. पहले यह पूर्वी सीमा (अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम) और पश्चिमी सीमा (लद्दाख) से था. लेकिन RELOS से भारत अब मध्य एशिया से भी चीन पर दबाव बना सकता है.

3. क्या ये स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का जवाब है?

चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति भारत को हिंद महासागर में घेरने के लिए थी. RELOS को इसका जवाब माना जा रहा है. भारत अब यूरेशियाई जमीन से चीन पर नजर रख सकता है. स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स चीन की वह रणनीति है, जिसके तहत वह हिंद महासागर के देशों में बंदरगाहों और ठिकानों का नेटवर्क बनाकर भारत की घेराबंदी कर रहा है.

RELOS समझौता भारतीय नौसेना को रूसी आर्कटिक बंदरगाहों तक पहुंच देता है. भारत व्लादिवोस्तोक से मरमंस्क तक पहुंच रख सकता है. एक तरफ चीन आर्कटिक में पोलर सिल्क रोड बनाना चाह रहा है. दूसरी ओर भारत की आर्कटिक में उपस्थिति चीन की फ्यूचर प्लानिंग के लिए चुनौती साबित हो सकती है.

भारत-रूस के इस डील से चीन को क्यों परेशान होना चाहिए?

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