UP News: ललिता गौतम हत्याकांड: जातिगत विरोध-प्रदर्शन में कैसे बदला सियासी गणित? समझिए पूरा मामला – INA

मेरठ में एक दलित युवती की हत्या के मामले में खूब बवाल मचा है. हत्या के विरोध में प्रदर्शन, पुलिस से टकराव और अब विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रिया ने इस मामले को प्रदेश की सियासत के केंद्र में ला दिया है. बुधवार को इस मामले को लेकर दलित संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया. घंटों पुलिस के साथ उनकी टकराव की स्थिति बनी रही.प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पीटने और लाठीचार्ज का भी आरोप लगाया.इस मामले में पुलिस ने 6 नामजद समेत 30 से अधिक लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है.

मेरठ के टीपी नगर क्षेत्र में गगन एंक्लेव में रहने वाली 20 वर्षीय ललिता गौतम बीए की पढ़ाई कर रही थी. 15 मई को वह घर से कॉलेज के लिए एग्जाम देने निकली थी. लेकिन देर शाम तक नहीं लौटी. घबराए परिजनों ने बदहवासी की स्थिति में उसकी तलाश करनी शुरू की , लेकिन ललिता तक नहीं पहुंच पाए. परिजनों ने 16 मई को ललिता की गुमशुदगी टीपी नगर थाने में दर्ज कराई.

गुमशुदगी की रिपोर्ट के बाद पुलिस ने जांच-पड़ताल शुरू की. आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाले. इस दौरान ललिता गांव कल्याणपुर निवासी अंकुश नाम के युवक के साथ दिखाई दी. पुलिस ने अंकुश को हिरासत में लेकर लेकर पूछताछ शुरू की, तो उसे ललिता की हत्या की बात कबूल ली.

Lalita Hatyakand

पुलिस की क्या थ्योरी है??

  • पुलिस की थ्योरी के मुताबिक ललिता और अंकुश के बीच प्रेम संबंध था.घटना वाले दिन दोनों साथ थे.
  • इसी दौरान अंकुश की नजर ललिता के मोबाइल की कुछ चैट्स और फोटो पर गई.
  • इससे उसे शक हुआ कि ललिता का संबंध किसी अन्य युवक से है.
  • ऐसे में उसने ललिता की हत्या कर शव को मेरठ के रोहटा थाना क्षेत्र के उपसिया जंगल स्थित गन्ने के खेत में फेंक दिया.

पीड़िता के परिजनों की क्या मांग है?

फिलहाल, पुलिस ने इस मामले में एक आरोपी अंकुश को ही गिरफ्तार किया है. वहीं,परिजनों ने इस मामले में अंकुश समेत दो अन्य युवकों पर मुकदमा दर्ज कराया था. ललिता गौतम के परिजनों का कहना है कि कोई एक युवक ऐसे हत्याकांड को अंजाम नहीं दे सकता है. इसमें और लोग भी शामिल हैं.

परिवार ने मांग की है कि इस मामले की FIR में जिन-जिन आरोपियों के नाम दिए गए हैं, उन्हें गिरफ्तार किया जाए. मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में की जाए. दोषियों को फांसी से कम की सजा नहीं दी जाए.पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता दी जाए. साथ ही परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए.

परिवार काफी समय से पुलिस से तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी और आर्थिक सहायता की मांग कर रहा है. ललिता गौतम दलित समाज से थीं, तो उनकी हत्या के बाद इन संगठनों ने भी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए.लेकिन मामला सबसे ज्यादा बुधवार यानी 08 जुलाई को किए गए विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़क गया.

विरोध-प्रदर्शन के दौरान कैसे मच गया बवाल

08 जुलाई को बड़ी संख्या में लोग कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन करने पहुंचे. प्रदर्शनकारी, जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपना चाहते थे. उन्हें इसकी इजाज़त भी थी. लेकिन इस बीच पश्चिमी यूपी के अन्य जिलों से बड़ी संख्या में दलित समाज से लोग मेरठ कलेक्ट्रेट पहुंचने लगे.

पुलिस ने भारी भीड़ को देखते हुए मेरठ कलेक्ट्रेट के मेन गेट को बंद कर दिया.फिर प्रदर्शनकारी गेट के बाहर धरने पर बैठ गए. इससे सड़क पर जाम लग गया. इस दौरान तकरीबन 3 घंटे तक प्रदर्शनकारी गेट के बाहर ही बैठे रहे. पुलिस ने काफी मान-मनौवल के बाद भी नहीं माना.

सूचना पर एसएसपी अविनाश पांडे भी मौके पर पहुंचे. प्रदर्शनकारियों का दावा है कि उन्होंने प्रदर्शन कर रहे लोगों को थप्पड़ मारे. फिर पुलिस वैन में घुसकर लोगों को पीटा. इस दौरान एक वकील ने फंदा लगाकर जान देने की भी कोशिश की.इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज करते हुए 50-60 लोगों को हिरासत में ले लिया.

इस मामले में राजनीति की कैसे हुई एंट्री

फिलहाल, यह मामला अब आपराधिक नहीं रह गया है. यह मामला अब दलित उत्पीड़न, कानून-व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है. दरअसल, ललिता दलित समाज से ताल्लुक रखती थी. वहीं, मुख्य के साथ-साथ अन्य आरोपी दूसरे समाज से है. इस बीच नगीना के सांसद चंद्रशेखर आजाद पीड़ित परिवार से मिलने मेरठ निकले. रास्ते में पुलिस से उनकी बहस भी हुई. लेकिन वह पीड़िता के गांव नहीं पहुंच सका.

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने मेरठ की ललिता गौतम हत्याकांड को लेकर हुए प्रदर्शन पर बड़ा बयान दिया है. मायावती ने समाज से कानून हाथ में न लेने की अपील की और कहा कि अन्याय के खिलाफ लड़ाई कानून के दायरे में रहकर ही लड़नी चाहिए. मायावती ने कहा कि कुछ संगठन राजनीति चमकाने के लिए पीड़ित परिवारों को भड़काकर सड़कों पर उतार देते हैं जिससे हिंसा और सड़क जाम जैसी घटनाएं होती हैं और बाद में उनके नेता घटनास्थल पर पहुंचकर राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं. कहा जा रहा है उन्होंने यह निशाना बिना नाम लिए नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद पर साधा है.

यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि लोकतंत्र में न्याय की आवाज़ को कैद नहीं किया जा सकता. मृतका ललिता गौतम के परिजनों से मिलने जा रहे कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के अधिकांश सदस्यों को देर रात से ही उनके घरों में हाउस अरेस्ट कर दिया गया.आखिर सरकार और प्रशासन किस बात से डर रहे हैं? क्या पीड़ित परिवार से मिलना भी अब अपराध हो गया है?

अगर न्याय मांगने वालों को ही रोका जाएगा, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि दमन का प्रतीक है.कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस का प्रत्येक कार्यकर्ता हर अन्याय के खिलाफ मजबूती से खड़ा था, खड़ा है और खड़ा रहेगा.न्याय और संविधान की रक्षा के लिए हमारा संघर्ष निरंतर जारी रहेगा.चाहे जितनी बंदिशें लगाई जाएं, न्याय और संविधान की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता.

दलित राजनीति की एंट्री क्यों हुई?

सबसे पहली वजह यह थी कि पीड़िता दलित समुदाय से थी. दलित संगठनों का आरोप है कि दलितों से जुड़े मामलों में कार्रवाई अपेक्षित गति से नहीं होती. दूसरी वजह पश्चिमी उत्तर प्रदेश लंबे समय से दलित राजनीति का मजबूत क्षेत्र रहा है. ऐसे मामलों पर दलित संगठन तेजी से लामबंद होते हैं. इसी वजह से यह मामला केवल हत्या तक सीमित नहीं रहा बल्कि दलित सम्मान, न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा बन गया.

पश्चिमी यूपी में दलित कितने प्रभावशाली हैं?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी ठीक-ठाक है. एक अनुमान के आधार पर पश्चिमी यूपी के अधिकांश जिलों में दलित आबादी 20% से 30% के बीच है. 2011 के जनगणना के आधार पर मेरठ जिले में अनुसूचित जाति (SC) की आबादी लगभग 2425% है. यहां जाटव, वाल्मीकि, खटीक, धोबी और अन्य अनुसूचित जातियां बड़ी संख्या में हैं. ऐसे में चुनावों कई सीटों पर जहां हार-जीत का अंतर कम रहता है, वहां दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं. ललिता गौतम हत्याकांड, इस क्षेत्र में दलित राजनीति को प्रभावित कर सकता है. अगर विपक्ष इस मुद्दे पर लगातार आवाज उठाता है.सरकार की जांच पर सवाल बने रहते हैं, तो इसका असर कुछ विधानसभा क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है.

ललिता गौतम हत्याकांड: जातिगत विरोध-प्रदर्शन में कैसे बदला सियासी गणित? समझिए पूरा मामला


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