कुल्हाड़ी से सिर फाड़ा, बुजुर्ग कोमा में पहुंचा; फिर भी पुलिस की पकड़ से बाहर मुख्य आरोपी

🔵खूनी हमले का मुख्य किरदार आजाद, कोमा में पड़ा पीड़ित न्याय को बेहाल
🔴विवेचक की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
🔵युगान्धर टाइम्स व्यूरो
कुशीनगर । किसी व्यक्ति के सिर पर कुल्हाड़ी से हमला हो, वह महीनों से कोमा में पड़ा हो, हमले का वीडियो मौजूद होने का दावा किया जा रहा हो और नामजद आरोपी खुलेआम घूम रहा हो, तो क्या इसे पुलिस की कार्रवाई माना जाए या कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति? यही सबब है कि कोतवाली पडरौना के जंगल अमवा गांव में हुए जानलेवा हमले के मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बतादे कि करीब तीन माह पूर्व 15 अप्रैल 2026 को हुए इस खूनी हमले में मुंसरीम नामक बुजुर्ग के सिर पर कथित रूप से कुल्हाड़ी से वार किया गया। गंभीर चोट के बाद वह आज भी कोमा में हैं और जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि मुख्य आरोपी उमर फारूक ने जान लेने की नीयत से हमला किया था, जबकि अन्य लोग भी लाठी-डंडों से प्रहार कर रहे थे। इसके बावजूद अब तक न तो मुख्य आरोपी उमर फारूक की गिरफ्तारी हुई और न ही सभी आरोपियों पर हत्या के प्रयास की समान धाराएं लगाई गईं।
पीड़ित अफजल अंसारी ने पुलिस अधीक्षक को दिये गये शिकायती पत्र में स्पष्ट आरोप लगाया है कि मामले के विवेचक विपक्षी पक्ष को लाभ पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि घटना का वीडियो फुटेज उपलब्ध होने के बावजूद जांच की दिशा सवालों के घेरे में है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब घायल व्यक्ति अब भी कोमा में है तो आखिर मुख्य आरोपी कानून की पकड़ से बाहर क्यो और कैसे है?सूत्रों की मानें तो गांव में इस मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। गांव में यह कानाफूसी चर्चाओं मे है कि क्या कानून सिर्फ कागजों पर चल रहा है? यदि किसी आम आदमी पर ऐसा आरोप होता तो क्या वह तीन माह तक खुलेआम घूमता रहता, जैसे उमर फारुख घूम रहा है? आखिर आरोपी पर इतनी मेहरबानी क्यो?
🔴 मिल रही धमकियां
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि हमले में शामिल अन्य लोग लगातार धमकियां दे रहे हैं। ऐसे में परिवार भय के साये में जी रहा है, जबकि पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही। यही वजह है कि अब पीड़ित ने विवेचना को कोतवाली पडरौना से हटाकर किसी अन्य थाने अथवा स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग की है।मामले में दर्ज मुकदमे में कुछ आरोपियों पर धारा 109 बीएनएस बढ़ाई गई है, लेकिन पीड़ित का कहना है कि जान लेने की नीयत से हमला करने वाले सभी लोगों पर समान रूप से कड़ी धाराएं लगनी चाहिए। उनका आरोप है कि जांच में चयनात्मक कार्रवाई की जा रही है।
🔴 सवाल पुलिस प्रशासन से
कहना ना होगा कि जब एक बुजुर्ग तीन माह से कोमा में है, मुख्य आरोपी नामजद है, वीडियो साक्ष्य होने का दावा किया जा रहा है और परिवार लगातार न्याय की गुहार लगा रहा है, तो मुख्य आरोपी उमर फारुख गिरफ्तारी कब होगी? क्या पुलिस किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है? विधि विशेषज्ञो का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक हमले तक सीमित नही रह गया है, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न भी बन गया है। यदि पीड़ित के आरोपों में सच्चाई है तो यह जांच और कार्रवाई दोनों पर बड़ा सवाल है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनपद न्यायप्रिय, ईमानदार छवि वाले पुलिस अधीक्षक इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और कोमा में पड़े बुजुर्ग के परिवार को न्याय दिलाने के लिए क्या रुख अपनाते है।
🔵 रिपोर्ट – संजय चाणक्य