UP News: 2500 वर्ष पहले क्या खाते थे वाराणसी के लोग, किस तरह की थी गोत्र व्यवस्था? कंकाल पर रिसर्च से खुलेगा प्राचीन काशी का रहस्य – INA

BHU Study Varanasi Skeleton: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) ने करीब 2,500 साल पुराने कंकाल पर स्टडी शुरू की है. यह कंकाल वर्ष 1958 में वाराणसी के राजघाट क्षेत्र में खुदाई के दौरान मिला था और तब से विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग में सुरक्षित रखा गया था. अब आधुनिक डीएनए तकनीक और वैज्ञानिक परीक्षणों की मदद से शोधकर्ता यह जानने की कोशिश करेंगे कि उस दौर के काशीवासी क्या खाते थे, उनकी आनुवंशिक पृष्ठभूमि क्या थी और वे स्थानीय निवासी थे या कहीं बाहर से आकर बसे थे.
वर्ष 1958 में काशी रेलवे स्टेशन के पास राजघाट क्षेत्र से कंकाल मिले थे. कंकाल के नमूने पर जूलॉजी विभाग के जीन वैज्ञानिक प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे और डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्वल (उज्ज्वल) प्रताप सिंह ने अध्ययन शुरू किया है. बीएचयू के कुलपति प्रोफेसर अजित कुमार चतुर्वेदी ने यह कहते हुए शोध की अनुमति दी कि “राजघाट के इस कंकाल का अध्ययन पुरातत्व, इतिहास और जेनेटिक्स के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करेगा.”
इस जांच के लिए बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (CDFD), हैदराबाद के वैज्ञानिक डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह की टीम ने वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के तहत संदूक खोला, कंकाल के नमूने एकत्र किए और अनुसंधान शुरू कर दिया.
बीएचयू के प्रोफेसर क्या बोले?
बीएचयू के पुरातत्व एवं इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. एम.पी. अहिरवार ने बताया कि इस महत्वपूर्ण अध्ययन से न केवल प्राचीन भारतीय सभ्यता के बारे में नई जानकारियां मिलेंगी, बल्कि यह भी स्पष्ट होगा कि उस समय के लोग किस प्रकार की जीवनशैली जीते थे. उन्होंने कहा कि बीएचयू के पुरातत्व विभाग के लिए यह ऐतिहासिक क्षण है, क्योंकि यह कंकाल भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को उजागर करने की क्षमता रखता है.
प्रो. अहिरवार के अनुसार, यह कंकाल राखीगढ़ी में मिले कंकाल जितना ही महत्वपूर्ण है और इससे मिलने वाले तथ्य गंगा घाटी के इतिहास को नई दिशा दे सकते हैं.
जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि यह कंकाल पिछले 68 वर्षों से पुरातत्व विभाग में सुरक्षित रखा था, लेकिन तकनीक के अभाव में इस पर शोध शुरू नहीं हो सका था. अब आधुनिक तकनीक उपलब्ध होने और कुलपति के मार्गदर्शन में इस पर वैज्ञानिक अध्ययन शुरू किया गया है.
उन्होंने बताया कि डीएनए अध्ययन से प्राचीन काशी के निवासियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है. साथ ही उस समय की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को समझने में भी मदद मिलेगी. फिलहाल यह भी जांच का विषय है कि यह कंकाल पुरुष का है या महिला का. हालांकि प्रारंभिक निरीक्षण के आधार पर यह पुरुष का कंकाल प्रतीत होता है. पसलियों की स्थिति और अन्य जैविक विशेषताओं को देखते हुए इसकी आयु लगभग 2,500 वर्ष पुरानी होने का अनुमान है.
प्रो. चौबे के अनुसार, इस शोध में लगभग तीन महीने का समय लगेगा. इसमें लखनऊ के बीरबल साहनी संस्थान और हैदराबाद के डीएनए अनुसंधान केंद्र के विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया जाएगा. यह अध्ययन मानवशास्त्र, समाजशास्त्र और भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में नई दिशा दे सकता है तथा भविष्य के शोध के लिए आधार तैयार करेगा.
सवाल: बनारस के लोगों का खान-पान कैसा था? यह कैसे पता चलेगा?
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे: हड्डियों और दांतों के डीएनए तथा ऑक्सीजन-कार्बन आइसोटोप विश्लेषण के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि ढाई हजार साल पहले का व्यक्ति शाकाहारी था या मांसाहारी. वह गेहूं खाता था या बाजरा, दूध पचा सकता था या नहीं. सी-3 और सी-4 पौधों पर आधारित आहार का भी पता लगाया जा सकता है. इससे उस समय की खान-पान शैली को समझने में मदद मिलेगी.
सवाल: उस समय की गोत्र व्यवस्था के बारे में कैसे जानकारी मिलेगी?
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे: गंगा के मैदानी क्षेत्र में गोत्र व्यवस्था पर आधुनिक आबादी के डीएनए आधारित कई अध्ययन हो चुके हैं.अभी तक ये एस्टेब्लिश्ड फैक्ट है कि गंगा प्लेन में 5 हज़ार साल से गोत्र व्यवस्था फ़ॉलो किया जा रहा है. मॉडर्न पॉपुलेशन में ये स्टडी ऑलरेडी हो चुकी है कि किस गोत्र का क्या वाई क्रोमोसोम टाइप है. यदि आप गर्ग गोत्र के हैं तो आप का वाई क्रोमोसोम का टाइप अलग है, जबकि गौतम या कश्यप गोत्र के हैं तो वाई क्रोमोसोम अलग होगा. आज के गोत्र के वाई क्रोमोसोम से इस कंकाल के वाई क्रोमोसोम से मैच कराएंगे. इससे इस ढाई हज़ार साल पहले वाले बनारसी का गोत्र पता चल जाएगा.
सवाल: यह व्यक्ति स्थानीय था या बाहर से आया था, इसका पता कैसे चलेगा?
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे:देखिए इंडिया का डीएनए हमको पता है. राखीगढ़ी से मिले कंकाल के एनालिसिस से ये एस्टेब्लिश्ड है. अब जो कंकाल मिला है, इसके पूरे डीएनए को अलग अलग रेस के डीएनए से मैच कराकर और आज के बनारसी के डीएनए से भी मैच कराकर ये पता किया जाएगा कि ये लोकल है या आर्यन इन्वेजन से प्रभावित है. यूरोपियन या फिर चायनिज है. आज के बनारसी के डीएनए से इसका कितना परसेंट डीएनए मैच कर रहा है
वर्ष 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के निर्माण के दौरान गंगा और वरुणा नदियों के संगम क्षेत्र राजघाट में पुरातात्विक गतिविधियां शुरू हुई थीं. इसके बाद 1957 से 1969 के बीच प्रो. ए.के. नारायण और टी.एन. रॉय के नेतृत्व में हुए खुदाई में कई महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अवशेष और मानव कंकाल मिले. इन्हें तब से बीएचयू में सुरक्षित रखा गया है.
2500 वर्ष पहले क्या खाते थे वाराणसी के लोग, किस तरह की थी गोत्र व्यवस्था? कंकाल पर रिसर्च से खुलेगा प्राचीन काशी का रहस्य
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